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Published at :19 Nov 2015 6:59 PM (IST)
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छात्रों की संख्या तो बढ़ी, पर शोध में पिछड़े – हाल एसकेएमयू का कैसे बदलेगी संप में उच्च शिक्षा की तसवीर उच्च शिक्षा के मामले में यहां सकल नामांकन अनुपात महज 6 प्रतिशत राज्य का औसत 9 प्रतिशत पूरे देश का औसत 21 प्रतिशत आनंद जायसवाल, दुमकासंताल परगना के आदिवासी व पिछड़े तबके के युवाओं […]

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छात्रों की संख्या तो बढ़ी, पर शोध में पिछड़े – हाल एसकेएमयू का कैसे बदलेगी संप में उच्च शिक्षा की तसवीर उच्च शिक्षा के मामले में यहां सकल नामांकन अनुपात महज 6 प्रतिशत राज्य का औसत 9 प्रतिशत पूरे देश का औसत 21 प्रतिशत आनंद जायसवाल, दुमकासंताल परगना के आदिवासी व पिछड़े तबके के युवाओं को उच्च शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से सिदो-कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की स्थापना 10 जनवरी 1992 को दुमका में हुई. आज तक यह विश्वविद्यालय अपने उद्देश्य में कामयाब नहीं हो पाया है. अभी भी उच्च शिक्षा के मामले में यहां सकल नामांकन अनुपात महज 6 प्रतिशत ही है. जबकि राज्य का यह औसत 9 प्रतिशत और पूरे देश का औसत 21 प्रतिशत है. इसकी बड़ी वजह संताल परगना जनजातीय क्षेत्र में शैक्षणिक संस्थानों की भी कमी है. संताल परगना प्रमंडल में 26 कॉलेज है. यहां नामांकित छात्रों की संख्या 38 हजार 613 है. नामांकित छात्रों की संख्या में पिछले साल की तुलना में वृद्धि जरूर हुई है. पर यह आंकड़ा संतोषप्रद अब भी नहीं कहा जा सकता. वर्तमान में कॉलेजों में दो शिफ्ट में कक्षाएं आयोजित करने की पहल हुई है. पाकुड और साहिबगंज में महिला कॉलेज इसी वर्ष चालू किये जाने की संभावना है. जिससे नामांकन दर और सुधरेगा. ऐसा विश्वविद्यालय प्रशासन कयास लगा रहा है. 23 साल में महज 10 ही आदिवासी कर सके पीएचडी किसी भी विश्वविद्यालय का काम शोध कार्य को बढ़ावा देना भी है. सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय में पहले दो दशक में शोध के कार्य बेहद धीमे रहे हैं. आंकड़े बताते हैं और शोध शाखा के अधिकारी भी पुष्टि करते हैं कि जनजातीय शोधार्थियों के संबंध में जो आंकड़े हैं, वे संतोषप्रद नहीं है. सवा तीन सौ से अधिक शोध उपाधियां इस विश्वविद्यालय ने अब तक प्रदान की है, पर इसमें जनजातीय वर्ग से महज 10 ही हैं. विज्ञान में आज तक कोई आदिवासी नहीं कर सका पीएचडीसिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा कि 23 साल पुराने विश्वविद्यालय में विज्ञान विषय में एक भी आदिवासी शोधार्थी शोध नहीं कर सके हैं. केमिस्ट्री, मैथ, जूलोजी, बॉटनी, फिजिक्स, जियोलॉजी जैसे विषय पर आज तक किसी आदिवासी को पीएचडी डिग्री अवार्ड नहीं की जा सकी. यही नहीं अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, हिंदी, गणित और कॉमर्स भी भी पीएचडी डिग्री हासिल करने वालों की संख्या शून्य ही है. दस में से 6 ने संताली में, इतिहास, राजनीति विज्ञान, अंग्रेजी एवं दर्शनशास्त्र में एक-एक शोधार्थी को पीएचडी की डिग्री अब तक मिल सकी है. टॉपर्स में भी नहीं आ पाते आदिवासीएक-दो सत्रों को छोड़ दें, तो अधिकांश सत्र में आदिवासी छात्र टॉपर्स में अपना नाम दर्ज नहीं करा पा रहे. कुछ वर्ष पहले पीजी गणित में सुधा रानी देहरी नाम की पहाड़िया समुदाय की छात्रा टॉपर रही थी. पर बाद में उस तरह शीर्ष स्थान पाने में आदिवासी समाज के छात्र छात्रायें कामयाब नहीं हो सके. ऐसे छात्रों को मुख्यधारा में लाने के लिए भी जो प्रयास करने की जरुरत है, उसमें ईमानदार कोशिश दो दशक में नहीं हो सकी है………………………….अधिकांश आदिवासी छात्र फर्स्ट जेनरेशन लर्नर: वीसीवीसी डॉ कमर अहसन का कहना है कि स्थिति बदल रही है. सीमित मानव संसाधन व बेहद कम आधारभूत संरचना रहने के बावजूद छात्र छात्राओं की संख्या में इजाफा हुआ है. यह सुखद संकेत हैं. निश्चित तौर पर आदिवासी छात्रों की संख्या भी इसमें काफी है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल की तुलना में हमारे पास दस हजार अधिक छात्र हैं. दुमका, साहिबगंज, गोड्डा, पाकुड के संस्थानों में आदिवासी छात्रों की संख्या हर वर्ग में दिखेगी. दरअसल इस समाज में अधिकांश फस्ट जेनरेशन लर्नर हैं. जिसकी वजह से दृश्य बदलने में थोडा वक्त लगेगा. वे रोजगार से जुडी शिक्षा पर ज्यादा जोर दे रहे हैं. इसलिए बीएड में उनका झुकाव अधिक है, पर शोध में उतना नहीं. हम उनके लिए नि:शुल्क कोचिंग, कौशल विकास प्रशिक्षण तथा व्यवसायिक शिक्षा पर ध्यान दे रहे हैं. …………………………….छात्रों का आरोप प्रयोगशाला बनकर रह गया है एसकेएमयू, क्वालिटी एजुकेशन पर बल देने की जरुरतअखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के प्रदेश सहमंत्री तथा एसकेएमयू छात्र संघ के सचिव रहे गुंजन मरांडी का कहना है कि इस विश्वविद्यालय को प्रयोगशाला बनाकर अब तक रखा जाता रहा है. योजनाबद्ध तरीके से न तो यहां शिक्षा के लिए काम हो रहा है और न ही विकास का. यह क्षेत्र शैक्षणिक रुप से पिछडा है, लिहाजा जनजातीय छात्रों की शैक्षिक ग्राहृयता पर भी विशेष ध्यान देना होगा. वरना छात्रों के पास डिग्री तो होगी, पर विषय वस्तु का ज्ञान नहीं. परिणाम भविष्य पर पडेगा. झारखंड विकास छात्र मोरचा के सिदो कान्हू मुर्मू विवि इकाई केे अध्यक्ष श्यामदेव हेंब्रम का भी कहना है कि विवि के विभिन्न कॉलेजों में क्वालिटी एजुकेशन पर ध्यान देने की जरुरत है. विवि मुख्यालय के कुछ कॉलेज में क्लास तो होते हैं, पर दूसरे कॉलेजों की स्थिति अच्छी नहीं है. पुराने ढर्रे की ही पढायी चल रही है. बेरोजगारों की फौज नहीं, बल्कि बेहतर मानव संसाधन यह विश्वविद्यालय तैयार करे, तभी संताल परगना और संताल परगना में आदिवासियों की स्थिति सुधरेगी……………………………. क्या कहते हैं बुद्धिजीवी’ गरीबी और अशिक्षा की वजह से आदिवासी समाज के लोगा उच्च शिक्षा की ओर अग्रसर नहीं हो पाये हैं. यही वजह है कि आदिवासी समुदाय में समग्र विकास नहीं हो पाया है. उच्च शिक्षा हासिल करने में लंबा वक्त लगता है. इस लिहाज से विद्यार्थियों में भी धैर्य नहीं है. न ही गार्जियन में भी बरदास्त करने की क्षमता है. इसलिए आदिवासी समाज में उच्च शिक्षा के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने की आवश्यकता है. तभी हालात में सुधार संभव है’- डॉ सीताराम सिंह, प्रिंसिपल, देवघर कॉलेज, देवघर

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