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Published at :19 Nov 2015 6:43 PM (IST)
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प्रवचन : एकाग्रता केंद्रित करने से शारीरिक पीड़ा कम होती हैभारीपन तथा गर्मी से नाड़ी तथा श्वास की आंतरिक सजगता विकसित होती है. जब प्रशिक्षणार्थी कहता है- नाड़ी शांत तथा नियमित तो वह उसका अनुभव शरीर के किसी भी अंग में कर सकता है. उत्पन्न गर्मी के कारण उसकी नाड़ी-संवेदना बढ़ जाती है. जब वह […]

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प्रवचन : एकाग्रता केंद्रित करने से शारीरिक पीड़ा कम होती हैभारीपन तथा गर्मी से नाड़ी तथा श्वास की आंतरिक सजगता विकसित होती है. जब प्रशिक्षणार्थी कहता है- नाड़ी शांत तथा नियमित तो वह उसका अनुभव शरीर के किसी भी अंग में कर सकता है. उत्पन्न गर्मी के कारण उसकी नाड़ी-संवेदना बढ़ जाती है. जब वह कहता है-श्वास शांत तथा नियमित तो सहज श्वास के प्रति सजगता अपने आप गहरी होने लगती है. प्रत्येक प्रश्वास के साथ भारीपन की अनुभूति बढ़ती है, यह यौगिक श्वास-प्रश्वास की सजगता से मिलता-जुलता अभ्यास है. इसके बाद प्रशिक्षणार्थी अगला अभ्यास प्रारंभ करता है जिसका संबंध जीवनी शक्ति के केंद्र मणिपुर चक्र से है. यह वाक्यांश मेरा मणिपुर चक्र गर्म हो रहा है, प्रकाश की संवेदना कराता है. यहां एकाग्रता केंद्रित करने से दर्द, ऐंठन, आलस्य, कोष्ठबद्धता की अनुभूति होती है. इससे पीड़ित अंग शिथिल होता है तथा वहां की पीड़ा कम होती है. इससे मूत्राशय में सुधार आन्त्रशूल तथा मूत्र नली की बीमारियां दूर होती हैं.

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