झारखंड में खेल, खिलाड़ी और कोच पर हर साल 20.39 करोड़ खर्च, फिर भी नहीं आ रहे मेडल

Updated at : 22 Feb 2025 11:11 PM (IST)
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झारखंड में खेलों पर करोड़ों रुपये खर्च करती है सरकार.

Jharkhand News: झारखंड में 108 डे-बोर्डिंग सेंटर हैं. इसमें 2700 खिलाड़ी हैं. प्रत्येक खिलाड़ी को सरकार 6000 रुपये वार्षिक छात्रवृत्ति देती है. करोड़ों खर्च करने के बावजूद मेडल नहीं मिल रहे.

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Jharkhand News| रांची, राजेश तिवारी : झारखंड में खेल और खिलाड़ियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार करोड़ों खर्च कर रही है. इसके बावजूद कई खेलों की स्थिति ऐसी, जिनमें खिलाड़ियों का प्रदर्शन जीरो है. इसके बावजूद उन खेलों को सरकार की ओर से अच्छा खासा अनुदान मिलता है. फुटबॉल, हॉकी (पुरुष), एथलेटिक्स जैसे खेलों पर सरकार सालाना लाखों खर्च कर रही है. पर इनमें प्रदर्शन शून्य है. कुछ खेलों को छोड़ दें, तो ज्यादातर खेलों में खिलाड़ी नेशनल गेम्स में भी मेडल नहीं दिला पा रहे हैं. राज्य में महिला हॉकी की स्थिति कुछ हद तक ठीक है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पुरुष हॉकी की भागीदारी नगण्य है. यही हाल फुटबॉल का भी है. राज्य को उन खेलों में मेडल मिल रहे हैं, जिनमें सरकार की कोई भागीदारी नहीं है. लॉन बॉल, तीरंदाजी, वुशु, मॉडर्न पेंटाथलॉन जैसे खेलों को सरकार अनुदान तक नहीं देती है. इसके बावजूद इन खेलों में प्रदर्शन अन्य खेलों की अपेक्षा बेहतर है. सरकार द्वारा खेल सेंटरों व खिलाड़ियों को तैयार करने में किये जा रहे खर्च के ब्योरे पर नजर डालें, तो पायेंगे कि सेंटरों में रह रहे खेल, खिलाड़ियों व प्रशिक्षकों पर सरकार सालाना 20.39 करोड़ रु खर्च कर रही है.

सरकार विभिन्न सेंटरों में इस तरह कर रही है खर्च

पूरे राज्य में 108 डे-बोर्डिंग सेंटर हैं, जहां कुल 2700 खिलाड़ी हैं. प्रत्येक खिलाड़ी को सरकार की तरफ से 6000 रुपये वार्षिक छात्रवृत्ति दी जाती है. यानी इन पर 1.62 करोड़ रु खर्च किये जाते हैं. वहीं, 12 क्रीड़ा किसलय केंद्र में खिलाड़ियों पर एक साल में 20.16 लाख रुपये व 24 खेलो इंडिया सेंटर के प्रशिक्षकों पर सालाना 72 लाख रुपये खर्च होता है. इसके बावजूद प्रदर्शन के नाम पर कुछ नहीं है. यही हाल राज्य में चलने वाले सेंटर ऑफ एक्सलेंस की भी है. पूरे राज्य में 10 सेंटर ऑफ एक्सलेंस संचालित हैं. यहां भी खेल,खिलाड़ी, कोच और किट पर सरकार सालाना 4.74 करोड़ खर्च कर रही है. पर रिजल्ट नहीं आ पा रहा.

आवासीय सेंटरों पर खर्च हो रहे 11 करोड़ रुपये

राज्य में कुल 30 आवासीय सेंटर हैं. प्रत्येक सेंटर में 25 यानी कुल 750 एथलीट हैं. इन एथलीटों के केवल भोजन मद में सरकार लगभग 8.66 करोड़ खर्च कर रही है. वहीं, इनके किट पर सरकार 18.75 लाख रुपये सालाना खर्च कर रही है. इसके अलावा 30 प्रशिक्षकों पर सरकार सालाना 2.16 करोड़ खर्च कर रही है. कुल मिला कर सरकार इन सेंटरों पर खिलाड़ियों और कोच पर सालाना 11.01 करोड़ खर्च कर रही है.

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फुटबॉल के 55 सेंटर, नतीजा सिफर

राज्य में फुटबॉल के करीब 55 आवासीय सेंटर हैं. दोनों वर्गों (महिला-पुरुष) को मिला कर राज्य में 45 से 50 हजार फुटबॉलर हैं, लेकिन दोनों वर्गों की टीमों में से कोई भी नेशनल गेम्स के लिए क्वालीफाई नहीं कर पायी. वहीं, राज्य में साझा की ओर से संचालित 10 और सरकार द्वारा सीधे तौर पर चलाये जा रहे 25 आवासीय प्रशिक्षण केंद्र हैं. इनमें से अधिकतर सेंटरों की हालत ऐसी ही है.

खेल प्रशिक्षकों की कमी भी बड़ा कारण

झारखंड में आर्चरी, एथलेटिक्स, हॉकी, रेसलिंग को छोड़ दें, तो यहां अन्य खेलों के लिए खेल प्रशिक्षकों की भारी कमी है. यहां अनट्रेंड खेल प्रशिक्षकों को 15,000 रुपये प्रतिमाह पर नियुक्त किया जा रहा है. बैडमिंटन, बॉक्सिंग, हैंडबॉल, जूडो, स्विमिंग, ताइक्वांडो, वॉलीबॉल, वेटलिफ्टिंग, साइकिलिंग, बास्केटबॉल समेत ऐसे कई खेल हैं, जिनमें प्रशिक्षक नहीं हैं. किसी खेल में प्रशिक्षक रखे भी गये हैं, तो उन्हें अनुबंध पर काफी कम मानदेय देकर उनसे काम लिया जा रहा है. ऐसे खेल प्रशिक्षक स्टेट लेवल खेल कर ही राज्य के नेशनल खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं.

लॉन बॉल को मिले सर्वाधिक गोल्ड

लॉन बॉल में झारखंड के खिलाड़ी लगातार मेडल ला रहे हैं. उत्तराखंड राष्ट्रीय खेलों में झारखंड ने लॉन बॉल में पांच स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य समेत कुल नौ पदक जीते. इस मामले में दूसरे नंबर पर तीरंदाज रहे, जिन्होंने दो स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य पदक जीते. इससे पहले गोवा में हुए 37वें राष्ट्रीय खेलों में भी झारखंड के लॉन बॉल खिलाड़ियों का दबदबा दिखा था. गोवा नेशनल गेम्स में झारखंड के लॉन बॉल खिलाड़ियों ने चार गोल्ड और तीन ब्रांज समेत सबसे अधिक सात पदक जीते थे. वहीं, केरल में हुए 35वें राष्ट्रीय खेलों में लॉन बॉल में झारखंड ने दो गोल्ड, दो रजत और तीन कांस्य पदक जीते थे.

उत्तराखंड राष्ट्रीय खेल में झारखंड

खेलगोल्डसिल्वरब्रोंज
लॉन बॉल050202
तीरंदाजी020202
पेंटाथलॉन000103
वुशु000102
तैराकी000002
हॉकी000001

सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

  • कुल खर्च प्रतिवर्ष = 43800000 रुपये
  • सेंटरों की संख्या = 10 सेंटर
  • कुल खिलाड़ी = 300 (30 एथलीट/सेंटर)
  • भोजन मद में खर्च = 350 रुपये/प्रतिदिन
  • खिलाड़ियों के भोजन पर सालाना खर्च (330 दिन) = 300 एथलीट x 350 x 330 दिन = 34650000 रुपये
  • किट में खर्च = 300 एथलीट x 2500 रुपये/प्रति एथलीट = 750000
  • प्रशिक्षकों पर खर्च = 10 प्रशिक्षक x 70000 रुपये/प्रशिक्षक x 12 महीने = 8400000
  • कुल खर्च = 34650000 750000 8400000 = 43800000 रुपये

डे-बोर्डिंग केंद्र

  • डे-बोर्डिंग की संख्या = 108
  • डे-बोर्डिंग के प्रशिक्षकों की संख्या = 1900
  • प्रशिक्षकों का मानदेय (12 महीने का) = 24624000 रुपये (अनुमानित)
  • खिलाड़ियों की संख्या = 2700
  • वार्षिक छात्रवृत्ति = 6000 रुपये/प्रति एथलीट सालाना
  • 2700 एथलीटों पर खर्च = 2700 एथलीट x 6000 प्रतिवर्ष = 16200000 रुपये

क्रीड़ा किसलय केंद्र

  • केंद्र की संख्या = 12
  • मानदेय प्रति केंद्र = 14000 प्रति माह
  • सालाना खर्च = 12 केंद्र x 12 महीने x 14000 रुपये प्रतिमाह = 2016000 रुपये

खेलो इंडिया सेंटर

  • केंद्र की संख्या = 24
  • प्रशिक्षक = 24
  • मानदेय = 25000 रुपये
  • सालाना खर्च = 24 x 12 x 25000 = 7200000 रुपये

आवासीय सेंटर

  • सेंटरों की संख्या = 30
  • कुल खिलाड़ी = 750 (25 एथलीट/सेंटर)
  • भोजन मद में खर्च = 350 रुपये/प्रतिदिन
  • खिलाड़ियों के भोजन मद में सालाना खर्च (330 दिन) = 750 x 350 x 330 = 86625000 रुपये
  • किट पर खर्च = 750 एथलीटों x 2500 रुपये = 1875000 रुपये
  • प्रशिक्षकों पर खर्च = 30 प्रशिक्षक x 60000 रुपये प्रतिमाह x 12 महीने = 21600000 रुपये

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 30 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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