फर्जी निकासी विवाद पर वित्त सेवा संघ ने कहा, 'ट्रेजरी में छेड़छाड़ असंभव, डीडीओ ही जिम्मेदार'

प्रतीकात्मक तस्वीर
Ranchi News: झारखंड में फर्जी निकासी मामलों पर वित्त सेवा संघ ने स्पष्ट किया कि कोषागार स्तर पर छेड़छाड़ संभव नहीं है. संघ ने डीडीओ को जिम्मेदार ठहराया और निष्पक्ष जांच की मांग की. कई जिलों में सामने आए मामलों से वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं और कार्रवाई की जरूरत बताई गई है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
रांची से विकास चंद्रा की रिपोर्ट
Ranchi News: झारखंड की राजधानी रांची में वेतन मद में फर्जी निकासी के मामलों को लेकर झारखंड वित्त सेवा संघ ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि कोषागार स्तर पर किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ संभव नहीं है. संघ ने राज्य के वित्त विभाग के मंत्री को पत्र लिखकर यह स्पष्ट किया कि हाल में सामने आए मामलों में ट्रेजरी की कोई भूमिका नहीं है.
कई जिलों में सामने आए हैं फर्जी निकासी के मामले
संघ ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि बोकारो, हजारीबाग और रांची समेत विभिन्न जिलों में अवैध निकासी के मामले सामने आए हैं. इन घटनाओं के बाद कोषागार व्यवस्था पर सवाल उठने लगे थे. हालांकि, संघ ने कहा कि इन मामलों को ट्रेजरी घोटाला बताना पूरी तरह से भ्रामक और तथ्यहीन है.
डीडीओ स्तर पर तैयार होता है पूरा विपत्र
संघ के अनुसार, झारखंड ट्रेजरी कोड 2016 और वित्त विभाग के दिशा-निर्देशों के तहत ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (डीडीओ) ही भुगतान से संबंधित विपत्र तैयार करता है. यही वह स्तर है जहां से भुगतान की पूरी प्रक्रिया की शुरुआत होती है और इसकी जिम्मेदारी भी पूरी तरह डीडीओ की होती है.
कोषागार केवल सत्यापन कर करता है भुगतान
वित्त सेवा संघ ने स्पष्ट किया कि कोषागार कार्यालय की भूमिका केवल दस्तावेजों के सत्यापन तक सीमित होती है. इसमें भुगतान राशि, लाभुक का नाम, बैंक खाता संख्या और आईएफएससी कोड जैसी जानकारियों की जांच की जाती है. यदि सभी दस्तावेज सही पाए जाते हैं, तभी भुगतान स्वीकृत किया जाता है, अन्यथा आपत्ति दर्ज कर फाइल वापस कर दी जाती है.
डीडीओ लॉगिन से ही होता है अंतिम अनुमोदन
संघ ने बताया कि विपत्र का अंतिम अनुमोदन डीडीओ लॉगिन से ही होता है. इस प्रक्रिया में कोषागार कर्मियों का कोई हस्तक्षेप नहीं होता. इसका मतलब यह है कि यदि कहीं गड़बड़ी हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी संबंधित विभाग और डीडीओ स्तर पर ही तय की जानी चाहिए.
जांच में विभागीय स्तर पर गड़बड़ी के संकेत
संघ ने यह भी कहा कि प्रारंभिक जांच में यह सामने आया है कि कई मामलों में विभागीय स्तर पर ही गलत आंकड़े और फर्जी विवरण देकर विपत्र तैयार किए गए. इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर अवैध निकासी को अंजाम दिया गया. ऐसे में कोषागार को दोषी ठहराना उचित नहीं है.
‘ट्रेजरी घोटाला’ को बताया भ्रामक
वित्त सेवा संघ ने साफ तौर पर कहा कि इन मामलों को ‘ट्रेजरी घोटाला’ कहना न केवल तथ्यहीन है, बल्कि इससे कोषागार की छवि भी प्रभावित हो रही है. इससे आम लोगों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है, जिसे दूर करना जरूरी है.
सरकार से निष्पक्ष जांच की मांग
संघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए. साथ ही, जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए. इससे न केवल दोषियों को सजा मिलेगी, बल्कि व्यवस्था में पारदर्शिता भी बनी रहेगी.
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर
संघ का मानना है कि इस पूरे प्रकरण से यह स्पष्ट हो गया है कि वित्तीय प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत करने की आवश्यकता है. यदि प्रत्येक स्तर पर जिम्मेदारी तय हो और निगरानी सख्त हो, तो इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकता है.
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प्रणाली सुधार की जरूरत पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना के बाद वित्तीय प्रणाली में सुधार के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है. डिजिटल निगरानी, ऑडिट प्रणाली को मजबूत करना और अधिकारियों की जवाबदेही तय करना जरूरी है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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