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बहुत उतार-चढ़ाव देखे बाबूलाल मरांडी ने, सहयोगी छूटे, विधायकों ने दी दगा, तीन चुनाव में झारखंड की राजनीति में बनाया कोण

Updated at : 18 Feb 2020 7:02 AM (IST)
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बहुत उतार-चढ़ाव देखे बाबूलाल मरांडी ने, सहयोगी छूटे, विधायकों ने दी दगा, तीन चुनाव में झारखंड की राजनीति में बनाया कोण

रांची : बाबूलाल मरांडी ने झाविमो के साथ 14 वर्षों का राजनीति सफर काटा़ 2006 में भाजपा के अंदर की परिस्थिति को झेल नहीं पाये और अलग हो गये़ कोडरमा से सांसद रहते हुए पार्टी छोड़ी, फिर चुनाव लड़े और जीते़ झारखंड की राजनीति में इस जीत ने बाबूलाल का इकबाल बनाया़ झाविमो का तेजी […]

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रांची : बाबूलाल मरांडी ने झाविमो के साथ 14 वर्षों का राजनीति सफर काटा़ 2006 में भाजपा के अंदर की परिस्थिति को झेल नहीं पाये और अलग हो गये़ कोडरमा से सांसद रहते हुए पार्टी छोड़ी, फिर चुनाव लड़े और जीते़ झारखंड की राजनीति में इस जीत ने बाबूलाल का इकबाल बनाया़ झाविमो का तेजी से विस्तार हुआ़
संगठन ग्रास रूट तक पहुंचा़ लोकसभा व विधानसभा के तीन चुनाव लड़े़ पूरी शिद्दत से चुनावी राजनीति में कोण बनाने का प्रयास किया़ भाजपा से बाबूलाल ने जब अलग राजनीतिक रास्ते पर चले, तो कई लोग साथ आये़ भाजपा के अंदर उस समय भगदड़ मची़ कई लोग बाबूलाल के साथ आये, लेकिन बाबूलाल के साथ लंबे समय तक चल नहीं पाये़ रवींद्र राय जैसे नेता बाबूलाल के साथ आये़ कुछ दिनों के बाद प्रदीप यादव साथ हुए़
अभय सिंह, प्रवीण सिंह जैसे नेताओं का साथ मिला़ राजनीति करवट लेती रही और झाविमो टूटता-बिखरता रहा, लेकिन बाबूलाल ने अपनी जिद नहीं छोड़ी़ विधायकों ने भी दगा-फरेब किया़ 2014 में छह विधायक झाविमो छोड़ भाजपा में शामिल हो गये़ उस चुनाव में आठ विधायक जीत कर आये थे़ बाबूलाल के लिए यह बड़ा झटका था़ पार्टी के अंदर विधायक प्रदीप यादव व प्रकाश राम बच गये थे़
दलबदल के कानून में कार्रवाई को लेकर बाबूलाल लगातार कानूनी प्रक्रिया के तहत संघर्ष करते रहे़ 2009 के विधानसभा चुनाव में बाबूलाल की पार्टी को 11 विधायक मिले़ इस दौर में पार्टी ने थोड़ी बड़ी लकीर खींची, लेकिन कांग्रेस के साथ सरकार नहीं बना सके़ भाजपा-झामुमो ने सरकार बनायी़ बाबूलाल विपक्ष में रहे़ कांग्रेस के साथ रिश्ते भी दरकते रहे़
झाविमो के 14 वर्ष : संगठन टूटा-बिखरा, पर बाबूलाल मैदान में डटे रहे
14 वर्षों तक भाजपा के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज रहे
झाविमो की राजनीति करते हुए बाबूलाल के निशाने पर भाजपा ही रही़ पूरे राजनीतिक दौर में वह भाजपा से ही मुकाबला करते रहे़ भाजपा के वोट बैंक में ही सेंधमारी की रणनीति पर काम करते रहे़ राज्य भर में खास कर संताल परगना को भी अपनी राजनीतिक जमीन बनाने में जुटे रहे़ यहां झामुमो ने बाबूलाल को कड़ी टक्कर दी़
बाबूलाल मरांडी के लिए 2014 का चुनाव अच्छा नहीं रहा़ इस चुनाव में पार्टी सुप्रीमो के रूप में बाबूलाल मरांडी ने दो-दो विधानसभा सीट से हार का मुंह देखा़ वह गिरिडीह व राजधनवार से चुनाव हार गये़ दुमका संसदीय सीट लोकसभा का चुनाव हार गये़ मोदी लहर में झाविमो को झटका लगा, लेकिन बाबूलाल ने मैदान नहीं छोड़ा़ अपने सांगठनिक कौशल से झाविमो के कार्यकर्ताओं को चार्ज किया़ गांव-गांव घूमे़
झाविमो की पाठशाला में ट्रेनिंग लेकर दूसरे दल जाते रहे
पिछली बार झाविमो से जुड़े रहे 20 से अधिक विधायक विधानसभा में थे़ 2014 के चुनाव से पहले झाविमो में भगदड़ मची़ झाविमो के 11 में से आधे विधायक चुनाव से पहले भाजपा का दामन थाम लिया़ भाजपा ने झाविमो के कई दावेदारों को टिकट भी दे दी़ इसके साथ छह विधायकों ने दलबदल किया़ वह दौर था, जब बाबूलाल के झाविमो की पाठशाला से दर्जनों विधायक सदन में थे़
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