गलगोटियाज यूनिवर्सिटी के चांसलर सुनील गलगोटिया ने कहा आगे भविष्य में प्रतिस्पर्धा ही बढ़ायेगी शिक्षा की गुणवत्ता
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 09 Jul 2019 8:08 AM
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नयी शिक्षा नीति को लेकर जद्दोजहद जारी है. इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि निजी शिक्षण संस्थानों को इंडस्ट्री का दर्जा और स्वायत्तता देते हुए उनके बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाए, ताकि देश के युवाओं को प्रतिस्पर्धी शुल्क पर गुणवत्तायुक्त िवश्वसनीयता शिक्षा मिल सके. शिक्षण संस्थानों को इंडस्ट्री का दर्जा […]
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नयी शिक्षा नीति को लेकर जद्दोजहद जारी है. इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि निजी शिक्षण संस्थानों को इंडस्ट्री का दर्जा और स्वायत्तता देते हुए उनके बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाए, ताकि देश के युवाओं को प्रतिस्पर्धी शुल्क पर गुणवत्तायुक्त िवश्वसनीयता शिक्षा मिल सके. शिक्षण संस्थानों को इंडस्ट्री का दर्जा देते हुए उनके बीच प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना क्यों जरूरी है, यह बता रहे हैं ग्रेटर नोएडा िस्थत गलगोटियाज यूनिवर्सिटी के चांसलर सुनील गलगोटिया.
पिछले कुछ वर्षों में देशभर में और खासकर उत्तर भारत में सैकड़ों निजी उच्च शिक्षण संस्थान बंद हो गए, जबकि कई अन्य बंद होने के कगार पर हैं.
क्या किसी ने इसके कारणों की तह में जाने की कोशिश की? शायद नहीं. आम तौर पर यही सोचा गया कि इन संस्थानों को पर्याप्त संख्या में स्टूडेंट्स नहीं मिल पा रहे होंगे, जिसकी वजह से यह नौबत आयी. यह इस मुद्दे का सामान्यीकरण है. दरअसल, इन संस्थानों को यूजीसी या एआइसीटीइ ने नहीं बंद कराया.
ये बंद इसलिए हुए, क्योंिक इन्होंने बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच अपने यहां शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की दिशा में समुचित ध्यान नहीं दिया. यही कारण रहा कि स्टूडेंट्स खुद ऐसे संस्थानों से दूरी बनाने लगे यानी मार्केट फोर्सेज ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.
इसलिए जरूरी है प्रतिस्पर्धा
आज प्राइमरी से लेकर हायर एजुकेशन तक देखें, तो इस क्षेत्र में शिक्षा उपलब्ध करानेवाले 75 फीसदी से ज्यादा संस्थान निजी क्षेत्र के ही मिलेंगे. सरकारी संस्थान बमुश्किल 15 से 20 प्रतिशत ही हैं. हमारे प्रधानमंत्री खुद कहते हैं कि सरकार को सबकुछ संचालित करने पर ध्यान देने की बजाय सुदृढ़ प्रशासन पर ध्यान देना चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में सरकार बेशक नियमन करे. कड़ी निगरानी करे. शिक्षण संस्थानों को सबकुछ अपनी वेबसाइट्स पर डालने के लिए दबाव बनाये, ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके.
हालांकि इसके लिए शिक्षा को इंडस्ट्री का दर्जा देते हुए इसे अधिक से अधिक स्वायत्तता देने की दिशा में भी जल्दी ही कदम बढ़ाने की जरूरत है. स्वायत्तता मिलने पर शिक्षण संस्थान बाजार/इंडस्ट्री की जरूरतों को समझते हुए उसके मुताबिक खुद को विकसित करने और स्टूडेंट्स को अपडेटेड गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने पर ध्यान देंगे.
जो ऐसा करने में सक्षम नहीं होंगे या इसमें उदासीनता दिखायेंगे, वे खुद-ब-खुद बाहर हो जायेंगे. अच्छे संस्थानों की उपलब्धता और प्रतिस्पर्धा होने की स्थिति में स्टूडेंट्स वहीं जायेंगे, जहां उन्हें हर तरह की सुविधा और संसाधन उपलब्ध होंगे.
रोजगार को बढ़ावा
इंडस्ट्री का दर्जा और स्वायत्तता मिलने की िस्थति में सबको फायदा होगा. इससे बाजार का जो दबाव काम करेगा, उससे सबसे बड़ा फायदा स्टूडेंट्स को ही मिलेगा. उन्हें न सिर्फ वैश्चिक मानकों के अनुसार शिक्षा उपलब्ध हो सकेगी, बल्कि प्रतिस्पर्धी फीस का लाभ भी मिलेगा. इससे उन्हें पसंदीदा रोजगार पाने में भी मदद मिलेगी.
हम सबने टेलीकॉम सेक्टर में मार्केट फोर्सेज का नतीजा देखा ही है कि कैसे जियो के आने के बाद कॉल और डाटा की दरें बेहद नीचे आ गयीं, जिससे अब करीब-करीब हर आदमी के हाथ में स्मार्टफोन है और वह चौबीसों घंटे ऑनलाइन होने का सुविधा उठा रहा है. सोसाइटी होने के कारण आज शिक्षण संस्थाएं टैक्स नहीं देतीं. अगर वे निजी संस्थान के रूप में काम करेंगी, प्रॉफिट कमायेंगी, तो उनसे सरकार को भी टैक्स लेना चाहिए. ऑटोनॉमी मिलने की स्थिति में जो कमा रहे हैं या कमायेंगे, उनसे टैक्स लिया जाये. उनकी ऑडिटिंग भी करायी जाये.
टैक्स नहीं मिलने की स्थिति में सरकार को अभी करोड़ों-अरबों रुपये का नुकसान हो रहा है. यह सोचना ठीक नहीं है कि ऐसा कर देने से फीस बढ़ेगी और शिक्षा तो जनकल्याण का विषय है. यह निराधार सोच है. इससे हमारे ज्यादातर युवा क्वालिटी एजुकेशन से वंचित हो रहे हैं. मार्केट फोर्सेज के काम करने की स्थिति में तो फीस घट भी सकती है. सबसे बड़ी बात यह कि इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइन होने के कारण कोई उससे अलग नहीं जा सकता
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गुणवत्ता पर हो फोकस
यह अच्छी बात है कि पिछली तमाम सरकारों की छद्म-समाजवाद की सोच से वर्तमान सरकार अलग है. अभी हमारे शिक्षण संस्था दुनियाभर के संस्थानों में बहुत पीछे हैं. शिक्षण संस्थानों को स्वायत्तता देने की दिशा में पहल होने से हमारे संस्थान भी वैश्विक स्तर अपनी पहचान बनाने की ओर बढ़ सकेंगे. हमारे विद्यार्थियों को भी वर्ल्ड क्लास एजुकेशन मिलने लगेगी. यूजीसी और एआइसीटीइ जैसे नियामक बेशक मानदंड बनायें और उनका कड़ाई से पालन करायें.
हां, यह न हो कि ऑटोनोमी और मदद कुछ चुनिंदा संस्थानों तक ही सीमित होकर रह जाये. जो भी संस्थान बेहतर कर रहे हैं, उन सभी को इसका फायदा मिलना चाहिए. अभी जो नियम बनाये गये हैं, मार्केट फोर्सेज उससे ज्यादा की अपेक्षा करती हैं. इसलिए इंडस्ट्री होने और इंडस्ट्री की तरह समझने की सूरत में मार्केट पर भरोसा रखने की जरूरत है. जो गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देगा, उसे बाहर जाना ही होगा.
आउटकम आधारित कोर्स बनाया जाये
यह हर किसी को देखना होगा कि जो कुछ भी स्टूडेंट्स को पढ़ाया जा रहा है, उसका आउटकम क्या है? जो करिकुलम यानी पाठ्यक्रम है, उसकी डिलीवरी क्या है?
आप जो पढ़ा रहे हैं, उसकी संबंधित इंडस्ट्री में कितनी प्रासंगिकता है? हमारी फैकल्टी को विप्रो जैसी कंपनियां प्रशिक्षित करती हैं और उन्हें सर्टिफिकेशन देती हैं. विशेषज्ञ ही बताते हैं कि इंडस्ट्री की जरूरतें किस तरह से बदल रही हैं और अब किस तरह की चीजें स्टूडेंट्स को बतायी और पढ़ाई जानी चाहिए, ताकि जब वे बाहर निकलें तो इंडस्ट्री चिंता जताने की बजाय उन्हें हाथों-हाथ ले सकें.
समय के साथ समझें इंडस्ट्री की जरूरतें
किसी भी शिक्षण संसान का प्लेसमेंट तभी बेहतर हो सकता है, जब वह इंडस्ट्री की बदलती जरूरतों के अनुसार अपने विद्यार्थियों को विकसित करने पर ध्यान देगा. विप्रो और इंफोसिस जैसी तमाम कंपनियों के एक्सपर्ट हमारी फैकल्टी और विद्यार्थियों को नियमित रूप से गाइड करते हैं. इंडस्ट्री की जरूरतों को हम कोर और इलेक्टिव विषय के रूप में कोर्स में शामिल भी करते हैं.
पहले साल ही निखारें सॉफ्ट स्किल
अच्छी इंग्लिश की बात हो या कम्यूनिकेशन की , इसे सिर्फ दो महीने के कोर्स में नहीं सिखाया जा सकता. खासकर उत्तर भारत के विद्यार्थियों की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर बात करें, तो उन्हें पहले साल से ही सॉफ्ट स्किल सिखाने की जरूरत होती है. यूजीसी मानकों के हिसाब से ऐसा करना बेशक जरूरी नहीं है, लेकिन अपने विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए शिक्षण संस्थान की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह उनका ख्याल रखे.
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