झारखंड से गुवाहाटी जानेवाले ड्रग सैंपल की संख्या बढ़ेगी
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 Jun 2019 5:58 AM
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संजय झारखंड के ड्रग टेस्ट लैब में इंजेक्शन और कांबिनेशन टैबलेट जांच की सुविधा नहीं रांची : झारखंड से गुवाहाटी के रीजनल ड्रग टेस्टिंग लेबोरेटरी (आरडीटीएल) जानेवाले ड्रग सैंपल की संख्या बढ़ायी जायेगी. औषधि निदेशालय ने गुवाहाटी स्थित सेंट्रल लैब से इसकी मौखिक सहमति ले ली है. गौरतलब है राज्य गठन के करीब 19 वर्षों […]
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संजय
झारखंड के ड्रग टेस्ट लैब में इंजेक्शन और कांबिनेशन टैबलेट जांच की सुविधा नहीं
रांची : झारखंड से गुवाहाटी के रीजनल ड्रग टेस्टिंग लेबोरेटरी (आरडीटीएल) जानेवाले ड्रग सैंपल की संख्या बढ़ायी जायेगी. औषधि निदेशालय ने गुवाहाटी स्थित सेंट्रल लैब से इसकी मौखिक सहमति ले ली है. गौरतलब है राज्य गठन के करीब 19 वर्षों बाद भी झारखंड में दवाओं की जांच की पूरी सुविधा नहीं है. आरसीएच परिसर नामकुम स्थित राज्य सरकार के ड्रग लैब में इंजेक्शन या माइक्रो बायोलॉजिकल दवाओं की जांच नहीं हो सकती.
वहीं, मल्टी केमिकल कांबिनेशन वाले टैबलेट की भी पूरी जांच यहां संभव नहीं है. उधर, दुमका में चार वर्ष पूर्व तैयार ड्रग एंड फूड लैब अब तक शुरू नहीं हुआ है. यहां पद भी सृजित नहीं हैं. एेसे में जरूरी दवाअों के सैंपल जांच के लिए बाहर भेजे जाते हैं. इनमें से ज्यादातर की जांच निजी लैब में करायी जाती है.
राज्य में करीब 96 फीसदी दवाओं की जांच नहीं होती है
औषधि निदेशालय के सूत्रों के अनुसार हर वर्ष करीब तीन-चार हजार ड्रग सैंपल बाहर भेजे जाते हैं. एक ड्रग सैंपल की जांच पर अौसतन डेढ़ हजार रुपये का खर्च अाता है. वहीं, दवाओं की जांच में भी लंबा समय लगता है.
इधर, नामकुम स्थित राज्य के अपने लैब में हर माह 30-40 ड्रग सैंपल की ही जांच होती है, जो राज्य की कुल दवाअों का चार फीसदी भी नहीं है. यानी झारखंड में बिक रही या इस्तेमाल हो रही 96 फीसदी दवाअों की सैंपल जांच नहीं हो रही है. गौरतलब है कि राज्य में दवाओं का सालाना कारोबार करीब 1200 करोड़ रुपये का है. इस तरह अपना लैब सुदृढ़ न रहने से पैसे व समय दोनों की बर्बादी हो रही है. दूसरी ओर मरीजों को सुरक्षित दवाएं नहीं मिल पा रहीं.
अपनी खरीदी दवाओं की जांच की सुविधा भी नहीं
विभिन्न निजी अस्पताल व नर्सिंग होम सहित करीब 10 हजार थोक व खुदरा दवा दुकानों के ड्रग सैंपल की जांच की बात छोड़ दें, तो राज्य सरकार खुद की खरीदी दवाओं की भी जांच समय पर नहीं करा सकती है.
झारखंड राज्य मेडिकल एंड हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एंड प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड हर वर्ष करीब 70 करोड़ रुपये की दवाएं खरीदता है. इनमें से ज्यादातर बगैर जरूरी जांच के वितरित होती हैं. कॉरपोरेशन ने 2018 में एंटी रिएक्टिव इंजेक्शन (डेक्सामेथासोन सोडियम फॉस्फेट) की खरीद की थी. राज्य भर में वितरित होने के बाद जब इस दवा की जांच हुई, तो यह पूरी तरह नकली निकल गयी. ऐसे कई उदाहरण हो सकते हैं, जो बगैर जांच के सामने नहीं आ पाते.
आठ साल में भी नहीं बनी नियमावली
राज्य सरकार के रवैये से ड्रग टेस्ट लैब दोयम दर्जे का होकर रह गया है. कई जरूरी उपकरण (एचपीएलसी, जीसीइ, एइटीआइआर व अन्य) यहां हैं नहीं.
जांच प्रयोगशाला शुरू होने के बाद यहां अक्सर जरूरी केमिकल भी नहीं रहता था. मानव संसाधन की भी बेहद कमी है. लैब के लिए अभी निदेशक सहित सिर्फ 18 पद सृजित हैं. वहीं, इसके विरुद्ध सिर्फ छह लोग कार्यरत हैं. निदेशक का पद करीब छह माह से खाली है. इधर, 2012 से ही नियुक्ति नियमावली बनाने की बात हो रही है, जो अब तक नहीं बनी है.
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