रांची : ट्रांसमिशन लाइनें तैयार होती, तो रांची में नहीं होता बिजली संकट

Updated at : 10 Jun 2019 9:11 AM (IST)
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रांची : ट्रांसमिशन लाइनें तैयार होती, तो रांची में नहीं होता बिजली संकट

ग्रिड का काम पूरा न होने से राजधानीवासियों को नहीं मिल रही पर्याप्त बिजली इनलैंड पावर और टीवीएनएल के ठप पड़ने से चरमरायी विद्युत आपूर्ति व्यवस्था भीषण गर्मी से सौ मेगावाट खपत बढ़ी, डिमांड 230 की जगह 300 के पार पहुंची रांची : प्रदेश की ट्रांसमिशन लाइनों के निर्माण में देरी का खामियाजा जनता भयंकर […]

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ग्रिड का काम पूरा न होने से राजधानीवासियों को नहीं मिल रही पर्याप्त बिजली
इनलैंड पावर और टीवीएनएल के ठप पड़ने से चरमरायी विद्युत आपूर्ति व्यवस्था
भीषण गर्मी से सौ मेगावाट खपत बढ़ी, डिमांड 230 की जगह 300 के पार पहुंची
रांची : प्रदेश की ट्रांसमिशन लाइनों के निर्माण में देरी का खामियाजा जनता भयंकर बिजली संकट रूप में भुगत रही है. इनलैंड पावर के ठप पड़ने और तेनुघाट विद्युत निगम लिमिटेड (टीवीएनएल) की एक यूनिट से शनिवार को उत्पादन ठप पड़ने से राजधानी और आसपास के कई जिलों में विद्युत व्यवस्था चरमरा गयी है. बिजली उपलब्ध होने के बाद भी इसकी कमी के चलते राजधानी को बिजली मुहैया नहीं हो पा रही है. कम बिजली मिलने से घंटों लोड शेडिंग के जरिये रोटेशन सिस्टम से लोगों को बिजली उपलब्ध हो रही है.
पिछले दो दिनों से जारी बिजली संकट की पड़ताल के बाद यह जानकारी सामने आयी कि लोगों के अंधाधुंध खपत के चलते हटिया, नामकुम और कांके तीनों ग्रिड अपनी क्षमता से ज्यादा लोड लेकर चल रहे हैं. पीजीसीआइएल नामकुम के ग्रिड की अधिकतम क्षमता 150 मेगावाट लोड वहन करने की है, जबकि अधिकतम मांग के चलते इसकी दोनों यूनिट से 160-160 यानी कि यहां से 320 मेगावाट बिजली की आपूर्ति की गयी.
ट्रांसमिशन लाइन के जानकारों की मानें, तो यह कभी ज्यादा खतरनाक हाे सकता है, ग्रिडों पर ज्यादा दबाव इसमें बड़ी खराबी का कारण बन सकता है, फिर हालात इससे भी ज्यादा खराब हो सकते हैं. ट्रांसमिशन लाइनों के न बनने से एक तरफ जहां बिजली प्रदेश की जनता को नहीं मिल पा रही है. दूसरी तरफ बिना बिजली मिले ही प्रदेश की जनता को करोड़ों रुपये फिक्स कॉस्ट के रूप में बिजली कंपनियों को चुकाने पड़ेंगे.
विफल साबित हो रहे प्रयोग
आइपीएल से गोला-सिकिदरी होते हुए पावर नामकुम और हटिया दो बड़े ग्रिडों को जाती है. राजधानी सहित लोहरदगा, गुमला, कामडारा और लातेहार जिला को भी इन्हीं ग्रिडों से सप्लाई मिलती है. पीटीपीएस से अभी फिलहाल 220-132 का एक यूनिट से सप्लाई होती है. टीवीएनएल के एक यूनिट से ही रांची ग्रिडों को मूलत: बिजली उपलब्ध होती है.
इसकी दूसरी यूनिट से बिजली सीधे बिहार शरीफ को चली जाती है. शनिवार को जब दूसरी सोर्स लाइन को ओपेन कर बिजली लेने का प्रयास किया गया तो यह पैंतरा उल्टा पड़ गया. ग्रिडों को बिजली प्राप्त होने के बजाय उल्टे दूसरी ओर डायवर्ट होने लगी. इसके बाद आनन-फानन में उसे रोका गया.
ट्रांसमिशन लाइन के तैयार होने से राजधानी को 200 मेगावाट अतिरिक्त बिजली मिलती
सेंट्रल पूल और अन्य सोर्स में बिजली उपलब्ध है. मगर ट्रांसमिशन लाइन के तैयार न होने से पावर कॉरपोरेशन अन्य पावर प्लांट से 200 मेगावाट बिजली नहीं ले पा रहा है. अगर ट्रांसमिशन लाइनें तैयार होती, तो पावर कॉरपोरेशन को विभिन्न सोर्स से राजधानी को 200 मेगावाट बिजली अतिरिक्त मिलती.
डिमांड 230 की जगह पहुंची 300 के पार
भीषण गर्मी और उमस के चलते राजधानी और इसके आस-पास में बिजली की मांग 300 से 315 मेगावाट तक पहुंच गयी है. बिजली की मांग बढ़ने के कारण वितरण शेड्यूल के मुताबिक सप्लाई नहीं हो पा रहा है. गांवों से लेकर शहरों तक में भयंकर कटौती करनी पड़ रही है. बिजली की कमी के चलते शहरों में दो से चार घंटे की कटौती हो रही है. इसी तरह गांवों में तो पांच से 10 घंटे से ज्यादा की कटौती हो रही है.
ये हैं संकट की वजहें
फॉरेस्ट क्लियरेंस नहीं मिल पाने के चलते नामकुम, हटिया, बुढ़मू, खूंटी और लोहरदगा के ग्रिड लंबे समय से बन कर खड़ा होने के बाद भी ऑपरेशनल नहीं हैं. पिछले दो दिनों से टीवीएनएल से 160 मेगावाट और इनलैंड पावर से 60 मेगावाट सप्लाई में कटौती जारी है. एक तरफ भीषण गर्मी में बिजली खपत बढ़ गयी, जबकि दूसरी ओर सप्लाई में 220 मेगावाट की कमी आ गयी.
आंखों में धूल झोंक रहा विभाग
स्टेट लोड डिस्पैच सेंटर (एसएलडीसी) की ओर से रोजाना जेबीवीएनएल के अधिकारियों और आमलोगों को लोड शेडिंग की सूचना दी जाती है. इसमें बताया जाता है कि हर दिन कितनी लोड शेडिंग की जा रही है. पिछले दो दिनों से एसएलडीसी की ओर से भेजी जा रही रिपोर्ट के मुताबिक पूरे राज्य में शून्य लोड शेडिंग बतायी जा रही है.
यानी दो दिनों से विभाग की ओर से किसी भी तरह से बिजली नहीं काटी गयी है. जबकि सच्चाई यह है कि शहरी इलाकों में पूरे दिन में कम से कम तीन घंटे की लोड शेडिंग की ही जा रही है. यानी विभाग अपने अधिकारियों और आमलोगों की आंखों में धूल झोंक रहा है.
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