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रांची : जमीन लूट के लिए हो रहे हैं प्रयोग : दयामनी

Updated at : 15 Mar 2019 7:40 AM (IST)
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रांची : जमीन लूट के लिए हो रहे हैं प्रयोग : दयामनी

रांची : सरकार लगातार नये-नये तरीकों से सूबे के ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन लेने का प्रयास कर रही है. 2017 में विकास के नाम पर जिस जमीन अधिग्रहण कानून को लाया गया है, उसमें से सोशल असिस्मेंट इंपैक्ट अौर खाद्य सुरक्षा जैसे प्रावधानों को हटा दिया गया है. इसी के साथ प्राइवेट लैंड सेविंग एंड […]

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रांची : सरकार लगातार नये-नये तरीकों से सूबे के ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन लेने का प्रयास कर रही है. 2017 में विकास के नाम पर जिस जमीन अधिग्रहण कानून को लाया गया है, उसमें से सोशल असिस्मेंट इंपैक्ट अौर खाद्य सुरक्षा जैसे प्रावधानों को हटा दिया गया है. इसी के साथ प्राइवेट लैंड सेविंग एंड परचेजिंग एक्ट 2017, फ्री होल्ड सिस्टम, लैंड प्रोटेक्शन एक्ट, लैंड बैंक, सिंगल विंडो सिस्टम जैसे कई प्रावधानों के जरिये जमीन पर से ग्रामीणों के मालिकाना हक को खत्म किया जा रहा है. उक्त बातें गुरुवार को सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने कही.
वह गोस्सनर कंपाउंड स्थित एचआरडीसी सभागार में संवाद अौर एक्शन एड के तत्वावधान में आयोजित भूमि अधिग्रहण कानून 2013 एवं 2017 पर राज्यस्तरीय विमर्श पर बोल रही थीं. दयामनी ने कहा कि अभी जमीन को लेकर रिवीजन सर्वे चल रहा है. कहा जा रहा है कि नयी तकनीक के जरिये जमीन का सर्वे हो रहा है. इसमें आइआइटी रुड़की को एजेंसी बनाया गया है. लातेहार में सर्वे हुआ है. वहां पर कई रैयतों की जमीन इस सर्वे में कम दर्शाया गया है.
विरोध करनेवालों को देशद्रोही कहा जाता है : इससे पूर्व कांके की सामाजिक कार्यकर्ता अनीता गाड़ी ने कहा कि जमीन हड़पने के लिए भूमि अधिग्रहण कानून में कई संशोधन हुए हैं अौर अभी तक हो रहे हैं.
वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में भूमि अधिग्रहण के लिए ग्राम सभा की सहमति (वह भी 80 प्रतिशत लोगों की ) जरूरी थी. इसे खत्म कर दिया गया है. विरोध करनेवालों को देशद्रोही करार दिया जा रहा है. गांव की जिन जमीनों को चारागाह अौर सामाजिक कार्यों के लिए पूर्वजों ने छोड़ा था, उसे लैंडबैंक में शामिल कर लिया जा रहा है.
रनिया के ग्राम प्रधान उमल मुंडा ने कहा कि गांव की जमीन हमारे पूर्वजों की है अौर हम इसके मालिक हैं. अब सरकार हमें हटाना चाहती है इसलिए नये कानूनों को सामने ला रही है. उन्होंने कहा कि आज हमारा सामना बाघ (पूंजीपति/सरकार) से है अौर हमें संघर्ष करना है. लेखक अौर पत्रकार विनोद कुमार ने कहा कि पूरी दुनिया में आदिवासी समाज अौर बाहरी समाज के बीच अनवरत संघर्ष चल रहा है. हमें इन संघर्षों के कारणों को जानना होगा.
उन्होंने कहा कि बाहरी समाज या सत्ता वर्ग आदिवासी क्षेत्र की जमीन पर अपना मालिकाना हक समझता है. जबकि आदिवासी समाज में जमीन को लेकर यह सोच नहीं है. आदिवासी समाज में जमीन व्यक्तिगत संपत्ति नहीं बल्कि एक धरोहर के रूप में अौर सामूहिक उपयोग के लिए देखा व समझा जाता है. कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता घनश्याम, पोटका से आये हरीश सरदार, पलामू के जितेंद्र सहित अन्य लोगों ने भी संबोधित किया. इस अवसर पर संवाद से शेखर, श्रावणी, शशि बरला सहित अन्य उपस्थित थे.
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