रांची : बुंडू में पैदा हो रहा मोती, आप भी कर सकते हैं इसका उत्पादन
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 12 Mar 2019 9:23 AM
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मोतियों के उत्पादन में लगे हैं रांची के ज्योति शंकर कार, मत्स्य पालकों को बतायी तकनीक रांची : भारत में मोतियों की खूब मांग है. महिलाएं व कई आभूषण पसंद पुरुष भी मोतियों के हार व दूसरे जेवर धारण करते हैं. न सिर्फ गहने बल्कि मोती का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन, दवा व अन्य चीजों में […]
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मोतियों के उत्पादन में लगे हैं रांची के ज्योति शंकर कार, मत्स्य पालकों को बतायी तकनीक
रांची : भारत में मोतियों की खूब मांग है. महिलाएं व कई आभूषण पसंद पुरुष भी मोतियों के हार व दूसरे जेवर धारण करते हैं. न सिर्फ गहने बल्कि मोती का उपयोग सौंदर्य प्रसाधन, दवा व अन्य चीजों में भी होता है.
हमारे देश में मोतियों का उत्पादन बहुत कम होता है. चीन भारत में मोतियों का सबसे बड़ा निर्यातक है. इसलिए यदि स्थानीय स्तर पर मोती के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाये, तो इससे आय के साथ-साथ रोजगार का भी सृजन होगा.
रांची के ज्योति शंकर कार मोतियों के उत्पादन में लगे हैं. उन्होंने बुंडू में एक एकड़ जमीन पर तालाब बना कर उसमें करीब 50 हजार सीप डाले हैं. मोती तैयार होने में करीब दो साल का वक्त लगता है. झारखंड में मोती उत्पादन की संभावना के मद्देनजर झारखंड सरकार के मत्स्य निदेशालय के तहत झारखंड राज्य मत्स्य सहकारी संघ लि.(झास्कोफिश) ने मोती उत्पादन संबंधी दो दिवसीय (अाठ व नौ मार्च) कार्यशाला का आयोजन किया है.
डोरंडा स्थित झास्कोफिश कार्यालय में आयोजित कार्यशाला के पहले दिन उप निदेशक आशीष कुमार ने मत्स्य संघ के प्रतिनिधियों को मोती, इसके उत्पादन तथा इसके लिए बरती जानेवाली सावधानियों के बारे बताया. इसके बाद ज्योति शंकर कार ने मत्स्य पालकों को मोती उत्पादन की पूरी तकनीक बतायी. अाशीष ने बताया कि मोती उत्पादन के लिए सीप प. बंगाल से मंगाया जाता है.
किस सीप में होता है मोती : आशीष ने कहा कि हर सीप में मोती नहीं होता. जिस तरह आदमी के जिस्म में कोई कांटा चुभ जाये, तो कांटे के अासपास पहले काला व फिर सफेद जमाव होता है. इसी तरह यदि सीप के अंदर बालू के कण या कुछ अौर समा जाये, तो सीप के अंदर इस कण के ऊपर भी प्राकृतिक जमाव (एकुमुलेशन) होता है, जो मोती का रूप ले लेता है.
मीठे जल में सीप पालन व मोती उत्पादन के लिए हर सीप का मुंह खोल कर उसमें बालू के कण या कुछ अौर डालना होता है. इस विधि से मोती उत्पादन की सफलता 40-50 फीसदी तक देखी गयी है. सीप का मुंह कितना खोले, यह भी कौशल की बात है. ज्यादा खोल देने पर सीप मर जाता है.
कृत्रिम मोती प्लास्टिक का कृत्रिम मोती प्लास्टिक का बना होता है. तुलनात्मक रूप से बेहतर कृत्रिम मोती में प्लास्टिक के ऊपर मोती के पाउडर से बना लेप चढ़ा होता है, जो मोती की कांट-छांट से निकलता है.
अाठ और नौ मार्च को डोरंडा स्थित झास्कोफिश कार्यालय में मोती उत्पादन पर आयोजित की गयी कार्यशाला के दौरान बुंडू में उत्पादित मोतियों की प्रदर्शनी भी लगायी गयी थी.
सिर्फ समुद्र का मोती गोल
प्राकृतिक रूप से पूरी तरह गोल मोती सिर्फ समुद्र में ही पैदा होता है. इसका रंग सुनहरा (गोल्डेन) होता है. मीठे पानी में सीप पालन से निकला मोती चपटा, आयताकार या किसी भी आकार का होता है. इसे काट-छांट कर बेहतर आकार (ज्यादातर अंडाकार) दिया जाता है.
मीठे पानी का मोती महंगा
ज्योति शंकर कार के अनुसार मीठे पानी का मोती समुद्र के मोती से ज्यादा महंगा होता है. दरअसल खारे पानी में बनने वाला समुद्री मोती का रंग बाहर निकलने के कुछ समय बाद धीरे-धीरे बदलने लगता है. जबकि मीठे पानी के मोती का रंग नहीं बदलता.
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