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रांची : नौ वर्षीय बच्चे के दिल में था छेद, रिम्स के डॉक्टरों ने बिना चीरा लगाये ही बंद किया

Updated at : 29 Dec 2018 12:00 AM (IST)
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रांची  : नौ वर्षीय बच्चे के दिल में था छेद, रिम्स के डॉक्टरों ने बिना चीरा लगाये ही बंद किया

रांची : रिम्स सीटीवीएस विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ अंशुल कुमार ने बताया कि गिरिडीह निवासी नौ वर्षीय मनीष रजक के दिल में छेद था. बच्चा पहले उनके ओपीडी में आया था, लेकिन विभाग में ओपेन हार्ट सर्जरी शुरू नहीं होने के कारण पीडीए विधि से दिल का छेद बंद करने के लिए उसे कार्डियोलॉजी में […]

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रांची : रिम्स सीटीवीएस विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ अंशुल कुमार ने बताया कि गिरिडीह निवासी नौ वर्षीय मनीष रजक के दिल में छेद था. बच्चा पहले उनके ओपीडी में आया था, लेकिन विभाग में ओपेन हार्ट सर्जरी शुरू नहीं होने के कारण पीडीए विधि से दिल का छेद बंद करने के लिए उसे कार्डियोलॉजी में रेफर कर दिया गया.
रिम्स के कार्डियोलॉजिस्ट डाॅ प्रशांत ने बताया कि मेडिकल भाषा में सर्जरी की इस विधि को पेटेंट डक्टस आर्टिओसस (पीडीए) कहा जाता है. डॉ प्रशांत के मुताबिक दिल में छेद होने से आयोटा (खून को शुद्ध करनेवाली नली) का जुड़ाव पल्मनरी आर्टरी से हाेता है. यह आर्टरी खराब खून को फेफड़ा में साफ कर शरीर के पहुंचती है.
पीडीए डिवाइस छाते की तरह होता है, जो उस छेद को दुरुस्त करता है, जिससे मरीज को परेशानी हो रही होती है. यह प्रोसेज्योर बिना बेहोश के किया गया है, जिसके कारण मरीज पूरी तरह ठीक है. उन्होंने कहा कि रिम्स में ऐसी पहली प्रक्रिया थी, जिसके कारण हम सब काफी उत्साहित थे. डॉ प्रशांत ने बताया कि इस प्रोसेज्योर में डॉ प्रकाश कुमार का भी सहयोग रहा.
  • सीटीवीएस में ओपेन हार्ट सर्जरी शुरू नहीं हुई है इसलिए कार्डियोलॉजी में भेजा गया था बच्चे को
  • कार्डियोलॉजी और सीटीवीएस विभाग के डॉक्टरों की टीम ने बंद किया दिल का छेद
  • डॉ प्रशांत कुमार और डाॅ अंशुल कुमार लीड कर रहे थे बच्चे का ऑपरेशन करनेवाली टीम को
  • दिल के ऑपरेशन के बाद गिरिडीह निवासी मनीष रजक पूरी तरह
  • स्वस्थ है. विशेषज्ञ डॉक्टर उसकी सेहत पर नजर बनाये हुए हैं.
पांच लाख रुपये दिये थे केंद्र सरकार ने सर्जरी में 75 हजार रुपये ही खर्च हुए
बच्चे का ऑपरेशन राष्ट्रीय बाल सुरक्षा कार्यक्रम (आरबीएसके) के तहत किया गया है, जो राज्य का इस योजना के तहत की गयी पहली सर्जरी है. आरबीएसके के तहत पांच लाख रुपये केंद्र सरकार से सहयोग मिला, लेकिन बच्चे के इलाज में 75 हजार रुपये ही खर्च आया है. निजी अस्पताल में इस प्रक्रिया का डेढ़ से दो लाख रुपये खर्च हो जाते हैं.
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