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प्रभात खबर कार्यालय पहुंचे हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा, कहा : व्यंग्य विधा है, इससे समाज की कुरीतियों को बाहर लाता है कवि

Updated at : 15 Nov 2018 12:23 AM (IST)
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प्रभात खबर कार्यालय पहुंचे हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा, कहा : व्यंग्य विधा है, इससे समाज की कुरीतियों को बाहर लाता है कवि

रांची : व्यंग्य एक विधा है. इसके जरिये समाज में फैली कुरीतियों को बाहर लाने का काम किया जाता है. बल्कि यूं कहें कि हमारा काम प्रहरी का है. समाज को सजग करना है. नीति धर्म के जरिये लोगों को तोड़ा जा रहा है. धर्म का बुरा हाल है. यह कहना है हास्य कवि सुरेंद्र […]

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रांची : व्यंग्य एक विधा है. इसके जरिये समाज में फैली कुरीतियों को बाहर लाने का काम किया जाता है. बल्कि यूं कहें कि हमारा काम प्रहरी का है. समाज को सजग करना है. नीति धर्म के जरिये लोगों को तोड़ा जा रहा है. धर्म का बुरा हाल है. यह कहना है हास्य कवि सुरेंद्र शर्मा का. वे बुधवार को प्रभात खबर कार्यालय में थे.
विशेष बातचीत में कहा कि आज हम विकास के मुद्दे से चले और राम के मुद्दे तक आकर सीमित रहे गये हैं. चुनाव का समय आ गया है. यह पूछे जाने पर कि एक कवि इसे कैसे देखता है? इस पर श्री शर्मा ने कहा कि हमारे सामने शेर और चीता दोनों हैं. देखना यह है कि अब हम शेर खायें या चीता? पत्नी की बात करते हैं, तो इतना सीरियस क्यों हो जाते हैं? इस पर श्री शर्मा ने कहा कि पत्नी की बात करेंगे तो गंभीर होकर ही बात करनी पड़ती है. हम तो पत्नियों पर हास्य करते हैं, बाकी लोग तो उपहास करते हैं.
सुरेंद्र शर्मा ने अपने अंदाज में पसंदीदा रचनाएं भी सुनायी
आओ सब मिल कर एक घर में रहें, क्या पता कल तुम ना रहो क्या पता कल हम ना रहें
बात ना मंदिर की है ना मस्जिद ना कोई इमारत की
बने चाहे जो भी मिट्टी तो होगी मेरे भारत की
बहा जो लहू हिंदू का, तो अल्लाह भी शर्मिंदा रहा
मरा जो मुसलमान तो राम कब जिंदा रहा
आओ सब मिल कर एक घर मे रहें, क्या पता कल तुम ना रहो, क्या पता कल हम ना रहें
हालांकि मैं पत्नियों में ज्यादा लोकप्रिय हूं. पहले और आज के मंच के बदलाव पर कहा कि बेशक मंच पर गंभीर रचनाएं हाेती हैं, लेकिन वो तब, जब दर्शकों में भी पढ़ने की लगन थी. आज की हालत वैसी नहीं है. आज व्यक्ति का स्तर गिर गया है. अब ऑब्जेक्टिव सवाल पर केवल टिक मारने से कितना ज्ञान आयेगा. पहले तो एक सवाल का जवाब चार पन्नों में लिखा जाता था़ शिक्षा तो बढ़ गयी परंतु ज्ञान नहीं बढ़ा. लोग संपत्ति के पीछे भाग रहे है़ं इस भाग-दौड़ में संस्कृति पीछे छूटती जा रही है.
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