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शहर में धड़ल्ले से चल रहे हैं फर्जी रेडियोलॉजी सेंटर, रिपोर्ट में डॉक्टर का नाम तक नहीं होता

Updated at : 08 Sep 2018 3:57 AM (IST)
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शहर में धड़ल्ले से चल रहे हैं फर्जी रेडियोलॉजी सेंटर, रिपोर्ट में डॉक्टर का नाम तक नहीं होता

जनहित का मुद्दा. मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं फर्जी जांच घर रांची : राजधानी रांची में धड़ल्ले से कई फर्जी रेडियोलॉजी सेंटर चल रहे हैं, जहां मरीजों का अल्ट्रासाउंड, एक्सरे आदि जांच की जा रही हैं. इन जगहों से मरीजों को जो रिपोर्ट जारी की जाती है, उसमें रेडियोलाॅजिस्ट का नाम तक […]

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जनहित का मुद्दा. मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं फर्जी जांच घर

रांची : राजधानी रांची में धड़ल्ले से कई फर्जी रेडियोलॉजी सेंटर चल रहे हैं, जहां मरीजों का अल्ट्रासाउंड, एक्सरे आदि जांच की जा रही हैं. इन जगहों से मरीजों को जो रिपोर्ट जारी की जाती है, उसमें रेडियोलाॅजिस्ट का नाम तक नहीं लिखा होता है.

रिपोर्ट पर अजीब तरीके से हस्ताक्षर किया गया होता है, जिससे यह संदिग्धता के दायरे में रहता है. शहर में फर्जी रेडियोलॉजी सेंटर के संचालन की जानकारी तब होती है, जब मरीज का मर्ज ठीक नहीं होता है और वह दोबारा डॉक्टर के पास पहुंचता है. संदेह हाेने पर जब डाॅक्टर दूसरे जगह अल्ट्रासाउंड कराते हैं, तो पुरानी रिपोर्ट को देखकर फर्जीवाड़े की जानकारी होती है.

आधी-अधूरी होती है रिपोर्ट

राजधानी के ही एक रेडियाेलॉजिस्ट ने बताया कि उनके पास हर सप्ताह एक-दो एेसी संदिग्ध रिपोर्ट आती हैं. रिपोर्ट रिपोर्ट आधी-अधूरी और गलत हाेती है, जिसमें डॉक्टर का नाम तक नहीं होता है. गलत रिपोर्टिंग से कई मरीज का ऑपरेशन भी गलत हो जाता है. कई छोटे अस्पताल भी बिना रेडियाेलॉजिस्ट के जांच करते हैं और रिपोर्ट भी जारी करते हैं.

ये हाल है

फर्जी रेडियोलॉजी सेंटर में नहीं होते विशेषज्ञ रेडियोलॉजिस्ट

अक्सर जारी कर दी जाती है मरीजों की गलत जांच रिपोर्ट

ठीक नहीं होती मरीज की बीमारी, तो पकड़ में आता है फर्जीवाड़ा

पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत सदर अस्पताल से लाइसेंस जारी किया जाता है. एेसे में फर्जी क्लिनिक की जांच का जिम्मा भी उन्हीं का है. अक्सर सुनने में आता है कि सेंटर मेें कोई डॉक्टर भी नहीं रहता है.

डॉ चंद्रमोहन, अध्यक्ष, अाइआरआइए

क्या है नियम

अल्ट्रासाउंड मशीन खरीदने और संचालन करने से पहले अस्पताल व क्लिनिक को सदर अस्पताल में आवेदन करना पड़ता है. रेडियाेलॉजिस्ट का यह बताना होता है कि वह अल्ट्रासाउंड का संचालन करेंगे. इसके अलावा एमडी रेडियोलॉजिस्ट व डिप्लाेमा के डिग्री का फोटोकॉपी जमा करनी पड़ती है. इसके बाद ही अल्ट्रासाउंड के संचालन का लाइसेंस जारी होता है.

नहीं होती जांच

रेडियाे डाइग्नोस्टिक सेंटर की जांच के लिए सदर अस्पताल द्वारा एक जांच कमेटी भी बनायी गयी है. लेकिन, जांच के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति की जाती है. जांच टीम फर्जी क्लिनिक काे पकड़ नहीं पाती है. ऐसे में इनका संचालन धड़ल्ले से होता है. हालांकि, इंडियन रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग एसाेसिएशन झारखंड चैप्टर इस मामले को लगातार उठाता रहता है.

विश्वसनीय सेंटर या रिम्स में करायें जांच

इंडियन रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग एसाेसिएशन झारखंड चैप्टर के अध्यक्ष डॉ चंद्रमोहन ने आमलोगों से अपील की है कि वे किसी भी तरह की रेडियोलॉजिकल जांच शहर के विश्वसनीय रेडियोलॉजी सेंटर या रिम्स में करा सकते हैं. क्योंिक इन जगहों पर प्रशिक्षित टेक्नीशियन और विशेषज्ञ डॉक्टर मौजूद होते है, जो सही जांच कर विश्वसनीय रिपोर्ट तैयार करते हैं.

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