रांची : सिर्फ 31% वोट नहीं हो सकता है बहुमत

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 04 Sep 2018 7:46 AM

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चुनाव में ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति’ पर सेरी का राज्यस्तरीय सम्मेलन वक्ताओं ने कहा, प्रजातंत्र को सशक्त करने के लिए अानुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति ही सार्थक रांची : देश की चुनाव प्रणाली में अानुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के विषय पर सोमवार को कैंपेन फॉर इलेक्टोरल रिफॉर्म ऑफ इंडिया (सेरी) ने राज्यस्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया. एचआरडीसी, गोस्सनर कंपाउंड […]

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चुनाव में ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति’ पर सेरी का राज्यस्तरीय सम्मेलन
वक्ताओं ने कहा, प्रजातंत्र को सशक्त करने के लिए अानुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति ही सार्थक
रांची : देश की चुनाव प्रणाली में अानुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के विषय पर सोमवार को कैंपेन फॉर इलेक्टोरल रिफॉर्म ऑफ इंडिया (सेरी) ने राज्यस्तरीय सम्मेलन का आयोजन किया. एचआरडीसी, गोस्सनर कंपाउंड में सम्मेलन हुआ.
इसमें कर्नाटक से आयी सेरी के संस्थापक सदस्यों में शामिल ज्योति राज ने कहा कि अानुपातिक प्रतिनिधित्व से ही सभी मतदाताओं को संसद में समुचित प्रतिनिधित्व मिल सकता है़ हम समावेशी शासन प्रणाली की परिकल्पना करते हैं. सिर्फ 31 प्रतिशत वोट शेयर बहुमत नहीं हो सकता़ बहुमत का अर्थ कम से कम 51 प्रतिशत होना चाहिए़ संविधान के निर्माण के समय बाबा साहब भीमराव आंबेडकर अानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि तब शिक्षा का स्तर नीचा था़
पर बाद में उन्होंने अपना विचार बदला़ विधि आयोग ने इस विषय पर विस्तृत अध्ययन के बाद लोकसभा से आनुपातिक प्रतिनिधित्व की अनुशंसा की है़ नार्वे, न्यूजीलैंड, जर्मनी सहित दुनिया के 94 देशों में यह पद्धति लागू है़ इसकी मांग के लिए लोगों और राजनीतिक पार्टियों को एकजुट होना होगा़ सेमिनार में सीपीआइ के राज्य सचिव केडी सिंह, बशीर अहमद, मतिउर रहमान, अरमान खान, बलराम, सुनील मिंज, जेरोम जेराल्ड कुजूर, राकेश रोशन किड़ो, दीपक बाड़ा, अभय खाखा, मिथिलेश कुमार, सुधीर पाल, सुशांतो मुखर्जी, गणेश रवि, आलोका व अन्य मौजूद थे़
जातिगत आधार पर चल रही हैं ज्यादातर पार्टियां : राजद के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गौतम सागर राणा ने कहा कि आज का प्रजातंत्र छद्म है़ उत्तर प्रदेश में एक भी मुसलमान चुनाव जीत कर नहीं आया़ लोगों में असंतोष बढ़ रहा है़
यह विक्षोभ विभाजन की ओर ले जायेगा़ ज्यादातर पार्टियां जातिगत आधार पर चल रही हैं. भारत जैसे बहु धर्म, बहु जाति और भिन्न आर्थिक स्थिति के लोगों वाले देश को अानुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति की जरूरत है़
दोषपूर्ण है वर्तमान चुनाव प्रणाली : माले के राज्य सचिव दयानंद प्रसाद ने कहा कि वामपंथी पार्टियां शुरू से ही आनुपातिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाती रही हैं, और यह उनके चुनावी घोषणा पत्र में भी शमिल है़ कोई पार्टी सिर्फ 31 प्रतिशत वोट हासिल कर सत्ता में आ जाती है, जो स्पष्ट दिखाता है कि यहां की चुनाव प्रणाली दोषपूर्ण है़ हर नागरिक का प्रतिनिधित्व होना चाहिए़ आज ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की बात उठायी जा रही है, जो एक भद्दा मजाक है़ संसद, विधानसभा, नगर निकाय व पंचायत चुनाव के अलग अलग चरित्र हैं.
आनुपातिक प्रतिनिधित्व से ही हो सकता है चुनाव सुधार : सुबोधकांत
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने कहा कि देश प्रेसिडेंशियल सिस्टम की ओर बढ़ रहा ह़ै प्रजातंत्र के दौर में अधिनायकवाद, शक्ति के केंद्रीकरण का शौक हो गया है़ आजादी के बाद के संसद का चरित्र प्रतिनिधित्व पर आधारित था़ दलित, अकलियत समाज के लोग, दबे-कुचले तबके को लोग भी बिना भेदभाव चुने जाते थे़ पर आज उनकी संख्या नगण्य है़ सिर्फ उतने हैं, जो आरक्षण के बल पर गये हैं. अानुपातिक प्रतिनिधत्व का चरित्र ही चुनाव सुधार का एकमात्र साधन है़
सवाल आरक्षण का नहीं, समान भागीदारी का
सेरी के राज्य संयोजक रामदेव विश्वबंधु ने कहा कि सवाल आरक्षण का नहीं, समान भागीदारी का है़ एक बड़ी आबादी प्रतिनिधित्व विहीन हो रही है़ यहां की चुनाव प्रणाली समानुपातिक नहीं है़ इसे बहुमत आधारित चुनाव प्रणाली कहा जाता है, जो व्यवहार में वस्तुत: अल्पमत अाधारित है़
पार्टियों द्वारा प्राप्त वोट और उन्हें मिली सीटों में कोई तालमेल नहीं दिखता़ कोई भी उम्मीदवार 20-30 प्रतिशत वोट हासिल कर निर्वाचित हो सकता है, जबकि स्पष्टत: उसे 70-80 प्रतिशत लोगों का समर्थन नहीं मिला है़ यह स्थिति देश में जातिवाद, क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है़
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