रांची : डॉ रामदयाल मुंडा जयंती महोत्सव का दूसरा दिन

Updated at : 26 Aug 2018 1:22 AM (IST)
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रांची : डॉ रामदयाल मुंडा जयंती महोत्सव का दूसरा दिन

जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए शोध जरूरी : कुलपति रांची : डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि के वीसी डॉ सत्यनारायण मुंडा ने कहा कि जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए इसके विभिन्न आयामों पर शोध की आवश्यकता है़ यह देखना होगा कि इसमें कला के माध्यम से कैसे सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं. इस […]

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जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए शोध जरूरी : कुलपति
रांची : डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि के वीसी डॉ सत्यनारायण मुंडा ने कहा कि जनजातीय संस्कृति के संरक्षण के लिए इसके विभिन्न आयामों पर शोध की आवश्यकता है़ यह देखना होगा कि इसमें कला के माध्यम से कैसे सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं. इस विषय पर शोध के लिए जनजातीय शोध संस्थान को नीति निर्धारित करनी चाहिए़ वे डॉ रामदयाल मुंडा के 79वें जयंती महोत्सव के उपलक्ष्य में जनजातीय शोध संस्थान में आयोजित कार्यक्रम को संंबोधित कर रहे थे़ इस तीन दिवसीय आयोजन में स्वयंसेवी संस्था रुम्बुल व टाटा स्टील ने सहयोग दिया है़
साहित्यकार डॉ अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि डॉ मुंडा ने यहां के लोगों में अपनी संस्कृति प्रदर्शित करने के प्रति झिझक व संकोच को समाप्त किया़
पूरी दुनिया को यहां की समृद्धि से परिचित कराया़ कहानीकार वाल्टर भेंगरा ‘तरुण’ ने कहा कि डॉ मुंडा के कहने पर उन्होंने अपनी हिंदी में लिखी कई कहानियों का मुंडारी में अनुवाद किया़ डॉ हरि उरांव ने कहा कि डॉ मुंडा को ग्रामीण संस्कृति, जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं और भारतीय दर्शन की गहन जानकारी थी़ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग, रांची विवि के एचओडी डॉ त्रिवेणी नाथ साहू ने भी विचार रखे.
आदि दर्शन पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन करेंगे
इससे पूर्व डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान के निदेशक रणेंद्र ने कहा कि यह महोत्सव अब हर साल होगा़ आदि दर्शन पर जल्द ही अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन किया जायेगा़ कार्यक्रम में गुंजल इकिर मुंडा, महादेव टोप्पो, सुनील मिंज, बलराम, डॉ अभय मिंज, चित्रकार सीआर हेम्ब्रम मौजूद थे़
10 शोध पत्र प्रस्तुत, डॉ सोहन मुंडा का पत्र सर्वश्रेष्ठ
उदघाटन सत्र के बाद आदि दर्शन पर शोध पत्र प्रस्तुत किये गये़ इस क्रम में आदिवासी साहित्य, संस्कृति व डॉ रामदयाल मुंडा के व्यक्तित्व पर दस शोध पत्र प्रस्तुत हुए़ इसमें डॉ सोहन मुंडा के शोध पत्र को सर्वश्रेष्ठ घोषित किया गया़ चित्रकारों ने सोहराई व कोहबर चित्रकला के माध्यम से भगवान बिरसा मुंडा के जीवनवृत्त का चित्रांकन किया़
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