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चारा घोटाला : सरयू राय ने उठाया था मामला, लालू प्रसाद ने पलटा था फैसला, दो साल फाइल दबी रही

Updated at : 25 Dec 2017 6:17 AM (IST)
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चारा घोटाला : सरयू राय ने उठाया था मामला, लालू प्रसाद ने पलटा था फैसला, दो साल फाइल दबी रही

जिस मामले में लालू प्रसाद गये जेल, उस मामले को सरयू राय ने वर्ष 1994 में उठाया था राजद नेता और बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद चारा घोटाले के जिस मामले में जेल गये हैं, उस मामले में सबसे पहले राज्य के मंत्री सरयू राय ने वर्ष 1994 में मामला उठाया था. लोक नायक […]

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जिस मामले में लालू प्रसाद गये जेल, उस मामले को सरयू राय ने वर्ष 1994 में उठाया था
राजद नेता और बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद चारा घोटाले के जिस मामले में जेल गये हैं, उस मामले में सबसे पहले राज्य के मंत्री सरयू राय ने वर्ष 1994 में मामला उठाया था.
लोक नायक जयप्रकाश नारायण की जयंती के मौके पर श्री राय ने बिहार सरकार के खिलाफ एक आरोप पत्र तैयार किया था. उस आरोप पत्र में देवघर-दुमका में पशुपालन विभाग में सरकारी राशि के बंदरबांट को भी प्रमुखता से उठाया गया था.
रांची : सरयू राय ने वर्ष 1994 में ही इस ओर इशारा किया था कि लालू प्रसाद के नेतृत्व वाली सरकार में पशुपालन विभाग में बड़ा घोटाला चल रहा है. अपने आरोप पत्र के 19 नंबर पर बताया गया था कि देवघर-दुमका में कैसे पशुपालन विभाग के माफिया करोड़ों की हेरराफेरी कर रहे हैं.
देवघर-दुमका में जिस तरह से सरकारी राशि का गबन किया गया, वह लूट की नयाब कहानी है. दुमका पशुपालन विभाग के क्षेत्रीय निदेशक तब शेष मुनि राम हुआ करते थे. शेष मुनि राम क्षेत्रीय निदेशक के साथ-साथ वह देवघर के जिला पशुपालन अधिकारी भी थे.
कागज के फटे चुटका में क्षेत्रीय निदेशक के रूप में निकासी का आदेश दिया और जिला पशुपालन अधिकारी के रूप में 50 लाख रुपये निकाल लिये. शेष मुनि राम ने अकेले इस घोटाले को अंजाम दिया. तब पशुपालन माफिया भी सक्रिय था. इस भनक जब गिरोह को लगी, तो मामला बाहर आया. यह मामला तब सरयू राय के पास भी पहुंचा.
लालू प्रसाद ने दिये जांच के मौखिक आदेश
लालू प्रसाद तब बिहार के मुख्यमंत्री थे. उन्होंने इसकी निगरानी जांच के मौखिक आदेश दिये. तब निगरानी के महानिदेशक डीएन सहाय हुआ करते थे. श्री सहाय ने निगरानी जांच के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव बसाक को पत्र लिखा. निगरानी जांच की प्रक्रिया बाद में हालांकि रुक गयी.
विधानसभा की लोक लेखा समिति के सभापति जगदीश शर्मा की ओर से एक पत्र आया और जांच ने नया मोड़ ले लिया. लोक लेखा समिति ने लिखा था कि वह इस मामले में जांच कर रही है और ऐसे में निगरानी इस मामले की जांच नहीं कर सकता है. इसके बाद यह फाइल दब गयी. लालू प्रसाद के पास यह फाइल वर्षों तक रही, बाद में जब सीबीआइ जांच शुरू हुई, तो मामला सामने आया. सीबीआइ ने इस फाइल को बाद में हासिल किया. इस तरह से लालू प्रसाद ने अपने ही आदेश को पलट दिया.
निगरानी जांच रुकी तो सरयू राय ने उठाया सवाल
देवघर-दुमका में अवैध निकासी का मामले में जब निगरानी जांच की प्रक्रिया रोकी गयी, तब भी सरयू राय ने सवाल उठाया. सरयू राय ने कहा था कि 40 संबद्ध महाविद्यालय और वन विभाग के मामले में समिति के देखने के बाद भी उसकी जांच हो रही है. तत्कालीन बिहार सरकार ने इसे अनसुना कर दिया. आखिरकार निगरानी जांच नहीं हुई और बाद में मामला सीबीआइ की पकड़ में आया.
चार साल बाद सीएजी की रिपोर्ट आयी, तो सारे तथ्य सामने आये
घोटालेबाज एक लूट में व्यस्त थे. पूरा गिरोह व्यवस्था में हावी था. इधर, तीन वर्षों तक सीएजी की रिपोर्ट नहीं आयी. चार साल बाद जब सीएजी की रिपोर्ट आयी, तो घोटाला परत-दर-परत सामने आया. सरयू राय ने तब सरकार पर जो आरोप लगाये थे, वे सभी सीएजी की रिपोर्ट में दर्ज थे. पशुपालन विभाग में करोड़ों रुपये की अवैध निकासी का मामला सामने आ चुका था.
सिस्टम टूटा, तो एक लालू नहीं 10 लालू को जेल जाना पड़ेगा : सरयू
मंत्री सरयू राय का कहना है कि नियम-कानून, सिस्टम को ताक पर रखकर काम होगा, तो एक लालू नहीं 10 लालू को जेल जाना पड़ सकता है. उनकी लड़ाई सिस्टम तोड़ने वालों के खिलाफ थी.
लालू प्रसाद को जेल भेजने के लिए नहीं था. उस समय अराजक स्थिति थी. पूरी व्यवस्था पर पशुपालन माफिया हावी थे. हमने तब कई बार लालू प्रसाद को सचेत किया था. राज्य के मुखिया होने के नाते लालू प्रसाद की जिम्मेदारी थी कि वे भ्रष्ट अधिकारियों और माफियाओं पर कार्रवाई करें. लेकिन निहित स्वार्थ में सबकुछ अनदेखी की गयी. अाज लालू प्रसाद उस जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं. श्री राय ने कहा कि बाद के भी शासन में जिस किसी ने कानून के दायरे से बाहर जा कर काम करने की कोशिश की है, तो उसका परिणाम भी भुगता है.
पशुपालन घोटाले में हर स्तर पर अनैतिक हुआ. लालू प्रसाद ने दबाव के बाद एसआइटी बनायी थी, उसने भी आंख में धूल झोंकने का ही काम किया. एसआइटी ने घोटाले के कागज गायब कराये. शासन-प्रशासन में बैठे लोग अनैतिक हो गये थे. बाद में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद सच सामने आया. जांच प्रक्रिया लंबी चली, लेकिन भ्रष्ट अफसर और नेता भी नहीं बचे.
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