Mines Bill से झारखंड को कितना नुकसान? 7,110 करोड़ के राजस्व पर क्यों मंडरा रहा खतरा, समझें पूरा मामला

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Mines Bill से झारखंड को कितना नुकसान?

झारखंड की खनिज संपदा पर केंद्र सरकार के नये Mines Bill का असर पड़ सकता है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ₹7,110 करोड़ के संभावित राजस्व नुकसान पर चिंता जताई है. जानें इस बिल से राज्य की वित्तीय स्थिति पर क्या पड़ेगा असर.

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Mines Bill: झारखंड की खनिज संपदा एक बार फिर केंद्र और राज्य के बीच बड़े विवाद की वजह बन गयी है. संसद से पारित Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पुनर्विचार करने की मांग की है. मुख्यमंत्री का कहना है कि नये प्रावधानों से राज्य के खनिज आधारित राजस्व पर असर पड़ सकता है और इससे विकास व कल्याणकारी योजनाओं के लिए राज्य की वित्तीय क्षमता प्रभावित होगी.

मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि झारखंड की अर्थव्यवस्था में खनन से मिलने वाले राजस्व की बड़ी भूमिका है. झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार 2024-25 में खनन राजस्व राज्य के अपने गैर-कर राजस्व का 84.9 प्रतिशत था. सर्वेक्षण में 2025-26 के लिए भी इसकी हिस्सेदारी 84.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है.

क्या है ₹7,110 करोड़ का मामला

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि Mineral Bearing Land Cess से राज्य को करीब ₹7,110 करोड़ सालाना मिलने की उम्मीद थी. उनका तर्क है कि खनिज संपदा से होने वाली आय झारखंड के लिए सिर्फ सरकारी राजस्व का स्रोत नहीं है, बल्कि खनन प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, पुनर्वास और सामाजिक सुरक्षा जैसी जरूरतों को पूरा करने में भी इसका इस्तेमाल होता है.

हालांकि, ₹7,110 करोड़ को सीधे तौर पर 'Mines Bill से होने वाला नुकसान' कहना सही नहीं होगा. यह वह अनुमानित सालाना राजस्व है, जिसे राज्य सरकार Mineral Bearing Land Cess के जरिये जुटाना चाहती थी. असल नुकसान कितना होगा, यह बिल के लागू होने के तरीके और आगे बनने वाले नियमों पर निर्भर करेगा.

आखिर Bill में ऐसा क्या है?

नये विधेयक में राज्यों की ओर से mineral rights और mineral-bearing land पर कर, cess या अन्य लेवी लगाने की शक्ति पर सीमाएं प्रस्तावित की गयी हैं. राज्यों की ऐसी लेवी केंद्र सरकार की ओर से तय शर्तों और प्रतिबंधों के अधीन होगी. विधेयक में mineral-bearing lands को लेकर केंद्र की नियामक भूमिका भी बढ़ाने का प्रावधान है.

यही प्रावधान झारखंड सरकार की चिंता का मुख्य कारण है. राज्य सरकार का मानना है कि खनिज संपदा वाले राज्यों को अपने प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े राजस्व पर पर्याप्त अधिकार मिलना चाहिए.

झारखंड के लिए क्यों अहम है खनन राजस्व?

झारखंड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में शामिल है. राज्य सरकार के खनन विभाग के अनुसार झारखंड के पास देश के करीब 40 प्रतिशत खनिज संसाधन हैं. कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, तांबा, यूरेनियम और कई अन्य खनिज यहां बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं.

राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण में भी खनन राजस्व को राज्य के अपने गैर-कर राजस्व का सबसे महत्वपूर्ण आधार बताया गया है. ऐसे में खनिजों से जुड़े किसी भी बड़े राजस्व बदलाव का सीधा असर राज्य के वित्तीय प्रबंधन पर पड़ सकता है.

सरकार का तर्क क्या है?

केंद्र सरकार का कहना है कि अलग-अलग राज्यों की ओर से अलग-अलग कर, cess और लेवी लगाने से खनन क्षेत्र में लागत और अनिश्चितता बढ़ती है. केंद्र के अनुसार समान और पूर्वानुमेय व्यवस्था से खनन क्षेत्र में निवेश तथा कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है. सरकार ने इसे देश में खनिजों के लिए अधिक एकरूप व्यवस्था बनाने की दिशा में कदम बताया है. यानी विवाद सिर्फ पैसे का नहीं है. इसके केंद्र में यह सवाल भी है कि खनिज संपदा से जुड़े राजस्व और उस पर कर लगाने का अधिकार आखिर राज्य के पास कितना रहे और केंद्र की भूमिका कितनी हो.

झारखंड और केंद्र के बीच क्यों बढ़ सकता है विवाद?

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में कहा है कि झारखंड दशकों से देश के औद्योगिक विकास और ऊर्जा जरूरतों में महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है, लेकिन खनन का सामाजिक और पर्यावरणीय बोझ भी राज्य को उठाना पड़ता है. इसमें विस्थापन, भूमि पर दबाव, प्रदूषण, पर्यावरणीय क्षति और स्थानीय बुनियादी ढांचे पर बढ़ता दबाव शामिल है.

राज्य सरकार का तर्क है कि खनिज आधारित राजस्व का इस्तेमाल इन समस्याओं से निपटने के लिए किया जाता है. इसलिए यदि राज्य की अतिरिक्त राजस्व जुटाने की क्षमता सीमित होती है, तो खनन प्रभावित इलाकों में विकास और कल्याणकारी योजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों पर असर पड़ सकता है.

अब आगे क्या होगा?

Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 को संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिल चुकी है. इसके बाद झारखंड सरकार ने केंद्र से इस पर पुनर्विचार की मांग तेज कर दी है.

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि नये प्रावधान लागू होने के बाद राज्यों की मौजूदा और भविष्य की खनिज आधारित लेवी पर वास्तविक असर कितना पड़ेगा. इसका जवाब विधेयक के अंतिम लागू होने और उसके तहत बनने वाले नियमों से और स्पष्ट होगा.

इसलिए फिलहाल इतना तय है कि मामला केवल ₹7,110 करोड़ का नहीं है. यह झारखंड की खनिज संपदा, राज्य के राजस्व अधिकार और केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़ा बड़ा आर्थिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुका है.


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वैभव विक्रम

लेखक के बारे में

By वैभव विक्रम

वैभव विक्रम डिजिटल पत्रकार हैं. बीते 5 सालों से झारखंड की सामाचार, खेल, लाइफस्टाइल, एजुकेशन, धर्म में रुचि है और इसी विषय पर अपने विचार प्रकट करना पसंद है. वर्तमान में प्रभात खबर के झारखंड डेस्क के रांची एडिशन के जिलों की खबरों को कवर कर रहे हैं. इससे पहले वह साल 2023-24 में प्रभात खबर के खेल डेस्क की खबरें लिखा करते थे.

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