अंग्रेजों से लड़े टाना भगत, आजादी के 79 साल बाद भी बदहाल जिंदगी जीने को मजबूर

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प्रतिकात्मक फोटो

आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाने वाले टाना भगत आज भी उपेक्षित जीवन जी रहे हैं. 79 साल बाद भी उनके गांवों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, जो देश के स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति सरकार की उपेक्षा को दर्शाता है.

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लोहरदगा. एक तरफ जहां पुरा देश आजादी का अन्ना अमृत महोत्सव मना रहा है तो दुसरी तरफ अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिला देने वाले टाना भगत आजादी के 79 साल बाद भी कुड़ू प्रखंड के विभिन्न गांवों में निवास करने वाले टाना भगत फांकाकासी की जीवन जीने को विवश हैं.टाना भगतों का आजादी के 79 साल बाद भी ना तो समाजिक ना ही आर्थिक ना ही शिक्षा के क्षेत्र में विकास हो पाया है.

मूलभुत सुविधाओं के लिए टाना भगत तरस रहे हैं. कुड़ू प्रखंड के आधा दर्जन गांवों बंदुवा, दुबांग,चीरी बरवाटोली, जिंगी,टाकू पतरा टोली तथा अन्य गांवों मे टाना भगत निवास करते हैं. टाना भगतों की कुल आबादी कुड़ू प्रखंड में लगभग 5000 है. टाना भगत आज भी पुरानी पद्धति तथा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बताएं अहिंसा परमो धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं. कुड़ू प्रखंड के टाना भगतों का इतिहास काफी गौरवशाली रहा है.

बताया जाता है कि साल 1914 में कुड़ू के टाना भगत देश छोड़ो आंदोलन में कुद पड़े थें. प्रखंड के बंदुवा गांव निवासी जतरा टाना भगत, आशिर्वाद टाना भगत,पुरण टाना भगत,गुदरी टाना भगत तथा चंदा टाना भगत आंदोलन में कुद पड़े थें. इस टीम का नेतृत्व जतरा टाना भगत ने किया था.

साल 1930 मे लोहरदगा में स्वतंत्रता आंदोलन कारियों का अधिवेशन बुलाया गया था जहां जतरा टाना भगत ने कुड़ू क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था. कुड़ू क्षेत्र में वर्तमान के लोहरदगा, गुमला व लातेहार जिला से लेकर चतरा जिला का कुछ हिस्सा शामिल था. इसके बाद आंदोलन ने धार पकड़ीं थी. आंदोलन में शामिल टाना भगत महाजनी प्रथा, अंग्रजों के राजस्व कर अदा करने के खिलाफ तथा अपनें जल, जंगल तथा जमीन को बचाने के लिए जवानी काल में आंदोलन की राह पकड़े थे.

आंदोलन को अहिंसा वादी बनाने तथा महात्मा गांधी को आदर्श मानने वाले टाना भगतों का आंदोलन कुड़ू से निकलकर आसपास के क्षेत्र डाल्टेनगंज,रांची, गुमला तथा चतरा तक पहुंच गया. आंदोलन को देख अंग्रेजी हुकूमत ने पांचों टाना भगतों को धोखे से साल 1939 में गिरफ्तार करते हुए बिहार के फुलवारी शरीफ जेल में डाल दिया जबकि आशिर्वाद टाना भगत तथा जतरा टाना भगत को सेल में बंद कर दिया. एक साल तक जेल मे रहने के बाद सभी बाहर निकले तथा आंदोलन को तेज कर दिया.

साल 1941 में रामगढ़ में अधिवेशन बुलाया गया जहां सुभाषचंद्र बोस से तथा हजारीबाग में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से मुलाकात हुई. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने आशिर्वाद टाना भगत तथा जतरा टाना भगत के आंदोलन को देखते हुए रांची क्षेत्र का नेता बनाया. बड़ी जिम्मेदारी मिलने से आशिर्वाद टाना भगत तथा जतरा टाना भगत का मनोबल काफी बढ़ गया.

आजादी के पहले 26 जनवरी 1942 को आशिर्वाद टाना भगत, जतरा टाना भगत, पुरण टाना भगत, लालू टाना भगत,गुदरी टाना भगत तथा चंदा टाना भगत ने अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती देते हुए कुड़ू थाना में चरखा छाप तिरंगा फहराया. तिरंगा फहराने के पहले अंग्रेजी हुकूमत ने सभी छह आंदोलनकारियों को खुब धमकाया लेकिन अहिंसा के पुजारी तथा महात्मा गांधी के अनुयायी टाना भगतों के कदम तिरंगा फहराने के लिए नहीं डिगा व घंटा बजाकर चरखा छाप तिरंगा फहराने में कामयाब रहे.

इसके बाद से हर 26 जनवरी गणतंत्र दिवस तथा 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के मौके पर चरखा छाप तिरंगा कुड़ू में फहराया जाता है. इसके बाद देश अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हुआ. साल 1965 में जब इंदिरा गांधी की सरकार बनी तो सभी टाना भगतों को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया गया. देश को आजादी दिलाने में सत्य तथा अहिंसा के पथ पर चलते हुए आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले टाना भगत आज मुलभुत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं.

प्रखंड के बंदुवा गांव निवासी तथा देश को आजादी की जंग में दक्षिण छोटानागपुर क्षेत्र का नेतृत्व करने वाले स्व० आशिर्वाद टाना भगत का गांव आज भी मुलभुत सुविधाओं से मरहुम है. गांव में ना तो पेयजल की समुचित व्यवस्था हैं ना ही गांव तक पहुंचने वाली सड़क की हालत ठीक है. राज्य सरकार को इस दिशा में पहल करने की जरूरत है.


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अपूर्व कुमार शुक्ला

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By अपूर्व कुमार शुक्ला

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