खटिया में लाद मरीज को अस्पताल ले जाते हैं

Updated at : 29 Jun 2017 10:34 AM (IST)
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खटिया में लाद मरीज को अस्पताल ले जाते हैं

कुड़ू (लोहरदगा) : आजादी के 70 साल हो गये. देश को कैशलेस करने, स्वच्छ करने करने का काम हो रहा है, लेकिन कुड़ू प्रखंड के बड़कीचांपी पंचायत के मसुरियाखांड़ गांव के लोग स्वास्थ्य सुविधा से कोसों दूर है. गांव से आठ किलोमीटर दूर बड़कीचांपी मे एक स्वास्थ्य उपकेंद्र है . जहां कुड़ू में कार्यरत चिकित्सकों […]

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कुड़ू (लोहरदगा) : आजादी के 70 साल हो गये. देश को कैशलेस करने, स्वच्छ करने करने का काम हो रहा है, लेकिन कुड़ू प्रखंड के बड़कीचांपी पंचायत के मसुरियाखांड़ गांव के लोग स्वास्थ्य सुविधा से कोसों दूर है. गांव से आठ किलोमीटर दूर बड़कीचांपी मे एक स्वास्थ्य उपकेंद्र है . जहां कुड़ू में कार्यरत चिकित्सकों को रोस्टर के आधार पर सप्ताह में एक दिन ड्यूटी करनी है. , मगर बड़की चांपी स्वास्थ्य उपकेंद्र में डॉक्टर नहीं आते हैं. गांव से 18 किलोमीटर दूर कुड़ू में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है, इसके अलावा गांव से 15 किलोमीटर दूर चंदवा में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है. गांव से बड़की चांपी एंव चंदवा के जिलिंग तक की दूरी छह-छह किलोमीटर दूर है. गांव में जब कोई बीमार पड़ता है, तो पहले जंगली जड़ी-बूटी से इलाज किया जाता है. ज्यादा खराब होने पर ओझा-गुनी से झाड़-फूंक कराया जाता है.
जब ज्यादा हालत खराब हो जाती है, तो खटिया मे लाद कर बड़की चांपी या फिर जिलिंग ले जाते हैं, यहां से गाड़ी के बाद चंदवा या कुड़ू ले जाते हैं. गांव के ग्रामीणो ललका गंझू, लालजीत गंझू, कबूतरी देवी, मनतोरणी देवी, भुनेशवर गंझू, फुलमनी देवी, विश्राम गंझू, प्रदीप गंझू, बिछिया देवी, नंदू गंझू, लोचन गंझू, शिवव्रत गंझू समेत अन्य ने बताया कि आज तक गांव में विधायक, सांसद से लेकर कोई भू जनप्रतिनिधि गांव नहीं आया है, एक बार कुड़ू के निवर्तमान बीडीओ विजय कुमार गांव आये थे.
गांव के ग्रामीणों ने अपनी समस्या से अवगत कराया था. तीन साल हो गया, एक भी समस्या का समाधान नहीं हो पाया. ग्रामीणों ने छह माह पहले श्रमदान करते हुए दो किलोमीटर तक सड़क का निर्माण कराया था. पहली बारिश में सड़क बह गयी. गांव तक पहुंचने का कोई सड़क नहीं है. सड़क के नाम पर जंगली एवं पहाड़ी पगडंडी, उबड़-खाबड़ रास्ते हैं.
ग्रामीणो ने बताया कि लोहरदगा डीसी से लेकर मुख्यमंत्री को लिखित रूप से गांव की समस्या से अवगत कराया गया है लेकिन कोई पहल नहीं हुई. बताया जाता है कि मसुरियाखांड गांव की आबादी 225 है, लेकिन गांव में मूलभूत सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं है. आजादी के 70 साल बाद बाद भी गांव के लोग आदिम युग में जीने को विवश है.
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