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शर्मनाक! सड़क-एंबुलेंस के अभाव में खटिया पर ले जाना पड़ा अस्पताल, रास्ते में ही आदिवासी महिला ने तोड़ा दम

Updated at : 15 Jul 2024 4:25 PM (IST)
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शर्मनाक! सड़क-एंबुलेंस के अभाव में खटिया पर ले जाना पड़ा अस्पताल, रास्ते में ही आदिवासी महिला ने तोड़ा दम

झारखंड के लातेहार जिला से वीडियो सामने आया है. यहां सड़क और एंबुलेंस के अभाव में एक आदिवासी महिला को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. वीडियो में तीन लोग एक महिला को खराब रास्ते में अपने कंधो पर लेकर जा रहे

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महुआडांड़, वसीम अख्तर : झारखंड के लातेहार जिला के बसेरिया गांव में सड़क नहीं होने के कारण इलाज के अभाव में एक 45 वर्षीय आदिवासी महिला कि मौत हो गई. सोमवार की सुबह बसेरिया निवासी रेमिश मिंज की पत्नी शांति कुजूर बीमार थी. सोमवार की सुबह जब महिला की हालत गंभीर हुई तब परिवार के लोग उसे खटीया की बहंगी बनाकर कंधे में ढोकर ला रहे थे. लेकिन महिला को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका जहां रास्ते में उसकी मौत हो गई.

खटिया में पीड़ित को ले जाने का वीडियो वायरल

संबंधित घटना के वीडियो में तीन व्यक्ति खटिया को लकड़ी और रस्सी की मदद से कंधे में टांग कर पैदल अस्पताल ले जा रहे हैं. यह वीडियो सभी सरकारी दावों की पोल खोलता है. सरकारें चीख-चीख कर विकास करने का दंभ भरती है लेकिन ये सभी वास्तविकता से परे है. झारखंड में सुविधाओं के अभाव में यह पहली मौत नहीं है. इससे पहले भी कई बार लोगों को अस्पताल, एंबुलेंस और सड़क के अभाव में जान से हाथ धोना पड़ा है.

सुविधाओ की बात करें तो

दूरूप पंचायत का गांव बसेरिया की जनसंख्या 200 से अधिक है. यह गांव आदिवासी बहुल है, लेकिन सड़क विहिन है. बसेरिया गांव में अन्य सुविधाओं की बात करें तो न यहां स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था है, न बिजली पहुंची है. बिजली के पोल तक नही गाड़े गए हैं. पेयजल के लिए कुंआ के पानी पर लोग निर्भर हैं. दूरूप पंचायत के मेन रोड से छह किलोमीटर दूर बसरिया गांव बसा है. यह गांव चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ है. ग्रामीण पगडंडी के रास्ते आते-जाते हैं. बरसात में बाईक एवं साईकिल तक गांव नहीं पहुंचता है. खेत एवं ताड़ पर पैदल चलना तक खतरनाक होता है. गांव पहुंचने से पहले एक पहाड़ी नदी भी पड़ती है जिसे लोगों को पार कर गांव जाना पड़ता है.

दुरूप पंचायत के पूर्व पंचायत समिती सदस्य धर्मेंद्र सिंह कहते है

कई दशको से गांव के लोग सड़क की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार एवं जिला प्रशासन ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया. आज अगर सड़क बनी होती तो महिला की मौत इलाज के अभाव में नहीं होती. इस गांव के लोग बरसात आने से पहले खाने पीने की सामग्री लेकर घर में रखते हैं. क्योंकि अधिक बारिश होने से वो गांव में महीने भर कैद हो जाते है. बच्चे स्कूल तक नहीं जा पाते है. बारिश में कुंआ का पानी दूषित हो जाता है और उसे पीकर लोग बीमार भी पड़ते हैं.

क्या कहते हैं ग्रामीण

गांव के अमित कुजूर पीटर तिर्की, संजय सिंह, बिगन नागेसिया, रविन्द्र सिंह, जोसेफ तिर्की, विनोद सिंह कहते हैं कोई गंभीर मरीज को इलाज के लिए जब गांव से मेन रोड तक लाना पड़े तो कंधे पर ढो कर ले जाते हैं. ग्राम सभा में हमेशा सड़क की मांग होती है. कई आवेदन भी दिया गया है. मुखिया को आवेदन देते रहते हैं फिर भी सड़क नही मिल पा रही है.

दूरूप पंचायत की मुखिया

मुखिया उषा खलखो कहती हैं इस गांव के लिए सड़क बहुत जरूरी है. मेरे फंड में इतना पैसा नहीं आता है कि इतनी लंबी सड़क बनाए जाये. साथ ही ग्रामीण और वन विभाग की भूमि का भी मसला है. इसे लेकर जिले को कई बार आवेदन लिख चुकी हूं. सड़क बनाने को लेकर मैं प्रयासरत हूं.

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Kunal Kishore

लेखक के बारे में

By Kunal Kishore

कुणाल ने IIMC , नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा की डिग्री ली है. फिलहाल, वह प्रभात खबर में झारखंड डेस्क पर कार्यरत हैं, जहां वे बतौर कॉपी राइटर अपने पत्रकारीय कौशल को धार दे रहे हैं. उनकी रुचि विदेश मामलों, अंतरराष्ट्रीय संबंध, खेल और राष्ट्रीय राजनीति में है. कुणाल को घूमने-फिरने के साथ पढ़ना-लिखना काफी पसंद है.

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