डुमरदगा का टीचर ट्रेनिंग कॉलेज 35 सालों से बंद

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डुमरदगा का टीचर ट्रेनिंग कॉलेज 35 सालों से बंद

खूंटी जिले के डुमरदगा स्थित टीचर ट्रेनिंग कॉलेज कभी क्षेत्र में शिक्षक के शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था

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खूंटी, भूषण कांसी . खूंटी जिले के डुमरदगा स्थित टीचर ट्रेनिंग कॉलेज कभी क्षेत्र में शिक्षक के शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था. वर्तमान में यह संस्थान पूरी तरह बंद होकर खंडहर में तब्दील हो चुका है. करीब 35 वर्षों से कॉलेज का संचालन बंद है. जिससे न केवल भवन जर्जर अवस्था में पहुंच गया है. अपने स्वर्णिम दौर में कॉलेज से जिले के सैकड़ों गरीब, गुरबा और ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्र-छात्राओं ने टीचर ट्रेनिंग की डिग्री प्राप्त की और सरकारी शिक्षक बन कर समाज और शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण योगदान दिया. कॉलेज के बंद हो जाने का सबसे अधिक असर खूंटी जिले के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के युवाओं पर पड़ा है. आर्थिक तंगी के कारण ये छात्र बाहर के महंगे प्रशिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने में असमर्थ हैं. डुमरदगा कॉलेज के बंद रहने की अवधि में कई सरकारें आयीं और गयीं, लेकिन किसी भी नेता, विधायक, मंत्री या सांसद ने इसे पुनः चालू कराने की दिशा में ठोस पहल नहीं की. यही उपेक्षा यहां प्रस्तावित नॉलेज सिटी और पॉलिटेक्निक कॉलेज जैसी योजनाओं के लंबित रहने का कारण भी बनी है. प्राथमिक शिक्षक शिक्षा महाविद्यालय, डुमरदगा की स्थापना 1970 में की गयी थी. तब इसकी शुरुआत एक छोटे से मुर्गी फार्म से हुआ था, जो डुमरदगा से सटे गांव शिलादीन में स्थित था. महाविद्यालय को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से तौफिक पाशा द्वारा कव्वाली कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था. इन कार्यक्रमों से प्राप्त आय तत्कालीन प्राचार्य चन्द्रमोहन महतो को दी जाती थी, जिससे प्रशिक्षण महाविद्यालय की गतिविधियां संचालित होती थीं. सत्र 1970-72 बैच में रामधारी राम, पलटू राम और महेन्द्र कश्यप जैसे शिक्षक भी इस प्रशिक्षण महाविद्यालय से जुड़े थे.

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चंदन कुमार

लेखक के बारे में

By चंदन कुमार

चंदन कुमार ने करियर की शुरुआत 1996 में प्रभात खबर से की. ऑल इंडिया रेडियो, सहारा समय टीवी, इंडिया टुडे एवं राष्ट्रीय सहारा में कार्य अनुभव. यात्रा वृतांत,साहित्य, सामाजिक बदलाव एवं कानूनी मामले की खबरों में रुचि. वर्तमान में मधेपुरा से खबरों का संकलन करते हैं.

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