तीन दिवसीय प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य महोत्सव-2026 का शुभारंभ
jamshedpur news :
बिष्टुपुर स्थित गोपाल मैदान में शुक्रवार को तीन दिवसीय प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य महोत्सव-2026 का भव्य शुभारंभ हुआ. साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजन का शुभारंभ अतिथियों ने सामूहिक रूप से दीप प्रज्वलित व पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ किया. डीडीसी नागेंद्र पासवान ने अतिथियों एवं साहित्यकारों का स्वागत करते हुए विषय प्रवेश कराया. उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का संदेश पढ़कर सुनाया, जिसमें साहित्य को समाज की आत्मा और परिवर्तन का माध्यम बताया गया. यह संदेश उपस्थित साहित्य प्रेमियों के लिए प्रेरणास्रोत बना. महोत्सव के प्रथम दिन विचारों की विविध धाराएं एक साथ प्रवाहित हुईं. “झारखंड के आदिवासी भाषा-साहित्य की विश्व दृष्टि” सत्र में आदिवासी भाषाओं की दार्शनिक गहराई और वैश्विक प्रासंगिकता पर विमर्श हुआ. आदिवासी इतिहास पर केंद्रित सत्र ने हाशिये पर पड़े आख्यानों को केंद्र में लाने का प्रयास किया. वहीं, पालीएटिव केयर पर जेरी पिंटो की नयी पुस्तक ने मानवीय संवेदना और करुणा के पक्ष को साहित्यिक दृष्टि से उभारा. ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष, मिट्टी की भाषा और रानी लक्ष्मीबाई की दास्तान जैसे सत्रों ने भाषा, संस्कृति और इतिहास को एक साझा मंच पर पिरो दिया. साहित्यकारों ने सूक्ष्म विश्लेषण और आत्मीय शैली में अपने विचार रखे, जिससे श्रोताओं को नयी दृष्टि और गहरी समझ प्राप्त हुई.आदिवासी भाषा-साहित्य है एक समग्र जीवन-दर्शन : डॉ अनुज लुगुन
साहित्य उत्सव के प्रथम सत्र में झारखंड के आदिवासी भाषा-साहित्य की विश्व दृष्टि विषय पर चर्चा हुई. इसमें डॉ अनुज लुगुन ने कहा कि आदिवासी भाषा और साहित्य केवल किसी समुदाय की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक समग्र जीवन-दर्शन है, जो प्रकृति, समाज और मनुष्य के आपसी संबंधों को संतुलित रूप में प्रस्तुत करता है. आदिवासी भाषाओं में रचित साहित्य में जंगल, पहाड़, नदी, पशु-पक्षी और मानव जीवन एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व के सूत्र में बंधे दिखायी देते हैं. उन्होंने कहा कि यही दृष्टि आज के वैश्विक संकट-पर्यावरण विनाश, उपभोक्तावाद और सामाजिक असमानता के समाधान की दिशा दिखाती है. उन्होंने कहा कि आदिवासी साहित्य में इतिहास केवल सत्ता और संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि सामूहिक स्मृति, लोक अनुभव और पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान का संकलन है. यह साहित्य मौखिक परंपरा के माध्यम से विकसित हुआ, जिसमें गीत, कथा, नृत्य और अनुष्ठान शामिल हैं. यदि इन भाषाओं और साहित्य को संरक्षण नहीं मिला, तो मानव सभ्यता अपनी सबसे मानवीय और प्रकृति-केंद्रित दृष्टि से वंचित हो जायेगी. इसलिए आदिवासी भाषा-साहित्य को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाना आज की आवश्यकता है.
आदिवासी भाषाओं में समानता की मिलती है झलक : डॉ पार्वती तिर्की
डॉ पार्वती तिर्की ने झारखंड की आदिवासी भाषा-साहित्य की विश्व दृष्टि विषय पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि आदिवासी भाषा-साहित्य की विश्व दृष्टि समानता, सहभागिता और सामूहिकता पर आधारित है. यह साहित्य किसी एक व्यक्ति के अनुभव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे समाज की संवेदना को अभिव्यक्त करता है. आदिवासी भाषाओं में नारी, प्रकृति और समाज के बीच गहरा आत्मीय संबंध दिखायी देता है, जहां शोषण के बजाय संरक्षण और सम्मान की भावना प्रमुख होती है. उन्होंने कहा कि वैश्वीकरण के दौर में आदिवासी भाषाएं संकट में हैं, लेकिन इनके भीतर निहित मूल्य आज के आधुनिक समाज के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं. आदिवासी साहित्य में विकास का अर्थ केवल भौतिक प्रगति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक न्याय और प्रकृति के साथ संतुलन है. जब तक आदिवासी भाषा-साहित्य को शिक्षा, शोध और साहित्यिक विमर्श का हिस्सा नहीं बनाया जायेगा, तब तक इसकी विश्व दृष्टि को सही रूप में समझा नहीं जा सकता.मुख्यधारा के इतिहास लेखन में आदिवासी हाशिये पर : डोबरो बुढ़िउलि
साहित्य उत्सव के द्वितीय सत्र में साहित्यकार डोबरो बुढ़िउलि ने “आदिवासी इतिहास का अध्याय” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आदिवासी इतिहास को अब तक मुख्यधारा के इतिहास लेखन में हाशिये पर रखा गया है. उन्होंने कहा कि आदिवासियों का इतिहास केवल विद्रोहों और आंदोलनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक समृद्ध सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था की कहानी है, जो आधुनिक राज्य व्यवस्था से पहले से अस्तित्व में थी. आदिवासी समाज में स्वशासन, सामूहिक निर्णय प्रणाली और प्रकृति आधारित जीवन शैली सदियों से प्रचलित रही है. डोबरो ने बताया कि पारंपरिक इतिहास लेखन ने अक्सर आदिवासियों को “पिछड़ा” या “असभ्य” बताकर उनके ज्ञान, कौशल और सामाजिक संरचना को नजरअंदाज किया. जबकि सच्चाई यह है कि आदिवासी समाज ने जंगल, जमीन और जल के संरक्षण की ऐसी पद्धतियां विकसित की, जो आज भी प्रासंगिक हैं. उन्होंने कहा कि आदिवासी इतिहास मौखिक परंपरा में सुरक्षित है-लोककथाओं, गीतों, नृत्यों और अनुष्ठानों के माध्यम से. यदि इन स्रोतों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो आदिवासी इतिहास अधूरा ही रहेगा.अपने इतिहास को स्वयं पढ़ें, लिखें व शोध करें : देवेंद्र नाथ चांपिया
देवेंद्र नाथ चांपिया ने कहा कि आदिवासी इतिहास का अध्याय भारतीय इतिहास का वह पक्ष है, जिसे लंबे समय तक उपेक्षा और विकृति का शिकार होना पड़ा है. उन्होंने बताया कि औपनिवेशिक काल में इतिहास लेखन का उद्देश्य सत्ता को मजबूत करना था, इसलिए आदिवासी समाज की स्वायत्त व्यवस्था और प्रतिरोध परंपरा को दबाकर प्रस्तुत किया गया. बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव जैसे नायकों को केवल विद्रोही के रूप में दिखाया गया, जबकि वे अपने समाज और संसाधनों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे थे. उन्होंने कहा कि आदिवासी इतिहास केवल संघर्ष का नहीं, बल्कि रचनात्मकता और निर्माण का भी इतिहास है. खेती, वन प्रबंधन, औषधीय ज्ञान और सामाजिक समरसता में आदिवासियों का योगदान अमूल्य रहा है. इतिहास को समझने के लिए दस्तावेजों के साथ-साथ आदिवासी समाज की स्मृति, परंपरा और अनुभव को समान महत्व देना होगा. उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे अपने इतिहास को स्वयं पढ़ें, लिखें और शोध करें. जब आदिवासी अपनी आवाज में अपना इतिहास लिखेंगे, तभी इतिहास का यह अध्याय पूर्ण और न्यायसंगत बन सकेगा.जिसमें आपकी रुचि हो, उसी को लेकर आगे बढें : जेरी पिंटो
साहित्य उत्सव के तीसरे सत्र में पालीएटिव केयर पर आधारित जेरी पिंटो की नयी पुस्तक ने मानवीय संवेदना और करुणा के पक्ष को गहरायी से उभारा. इस दौरान जेरी पिंटो ने अपने संबोधन में कहा कि बच्चों को बचपन से ही अनजाने में झूठ बोलना सिखाया जाता है. वास्तव में बच्चे पढ़ना-लिखना नहीं चाहते, लेकिन माता-पिता के डर से वे कभी सच कहने का साहस नहीं कर पाते. पूछे जाने पर वे वही उत्तर देते हैं, जो उनके अभिभावक सुनना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि बच्चों को वही कार्य करना चाहिए, जिसमें उनकी वास्तविक रुचि हो और जिसमें वे स्वयं को दक्ष महसूस करते हों, तभी उनका सर्वांगीण विकास संभव है.साहित्य, कला व संस्कृति का संगम बना साहित्य महोत्सव
साहित्यिक सत्रों के साथ-साथ महोत्सव में दर्शकों के लिए विविध कलात्मक प्रस्तुतियां भी आकर्षण का केंद्र रहीं. लाइव ग्लिटर आर्ट, लाइव पेंटिंग और लाइव पॉटरी ने रचनात्मकता को सजीव रूप में सामने रखा, जहां कलाकारों की उंगलियों से कला आकार लेती दिखायी दी. वहीं, लाइव बैंड परफॉर्मेंस और जनजातीय नृत्य ने पूरे आयोजन में सांस्कृतिक रंग भर दिया. साहित्य उत्सव में आने वाले लोगों ने न केवल विचारों को सुना, बल्कि कला और संस्कृति को महसूस भी किया. कार्यक्रम स्थल पर पुस्तक प्रदर्शनी सह बिक्री का भी आयोजन किया गया था. साहित्य प्रेमियों ने अपनी पसंदीदा पुस्तकों की खरीदारी की. इसके साथ ही आदिवासी पारंपरिक व्यंजनों के स्टॉल भी लगाये गये थे. खान-पान के शौकीनों ने स्थानीय स्वाद और पारंपरिक पकवानों का भरपूर आनंद लिया.ओलचिकी लिपि शताब्दी वर्ष पर संक्षिप्त परिचय दिया
साहित्य उत्सव के चौथे सत्र में ओलचिकी लिपि के शताब्दी वर्ष पर रवींद्र नाथ मुर्मू, जोबा मार्डी, रानी मुर्मू और वीर प्रताप मुर्मू ने संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया. उन्होंने लिपि के ऐतिहासिक महत्व, सांस्कृतिक पहचान और संताली भाषा के संरक्षण में इसकी भूमिका पर प्रकाश डाला. इस अवसर पर जोबा मुर्मू ने बिदू-चांदन पर आधारित एक मधुर संताली गीत प्रस्तुत किया. उनके गीत में आदिवासी जीवन, प्रकृति और परंपरा की झलक देखने को मिली.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

