jamshedpur news : बंजर खेत को बनाया आम बगीचा, अब सालाना हो रही लाखों की आमदनी

Edited by AKHILESH KUMAR
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रांगामाटिया गांव के 16 किसान एक-एक एकड़ में करते हैं आम व सब्जी की खेती

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jamshedpur news :

सरायकेला-खरसावां जिले के सरायकेला प्रखंड अंतर्गत रांगामाटिया गांव के 16 किसानों ने अपनी कड़ी मेहनत और सूझबूझ से बंजर और बेकार पड़ी भूमि की तकदीर बदल दी है. कभी आर्थिक तंगी से जूझने वाले ये किसान आज अपनी ही जमीन से ””सोना”” उगा रहे हैं. नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन के सहयोग से शुरू हुई एक छोटी सी पहल ने आज पूरे गांव के जीवन स्तर को ऊंचा उठा दिया है. रांगामाटिया गांव के किसानों के पास जो जमीन कभी बेकार और बंजर पड़ी थी, आज वह आम के लहलहाते बागों में तब्दील हो चुकी है. गांव के प्रगतिशील किसान सोनाराम सोरेन ने इस बदलाव की शुरुआत करते हुए अपने एक एकड़ बंजर खेत में आम के 100 से अधिक पौधे लगाये. बीते 4 वर्षों से उन्हें हर साल अपने बगीचे से 4 से 5 टन आम की बंपर पैदावार मिल रही है. इस आम को बेचकर वे सालाना 2 से 3 लाख रुपये तक की शानदार कमाई कर रहे हैं. उनके जैसे ही अन्य किसानों ने भी आम बगीचा लगाकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत बना ली है.इंटरक्रॉपिंग से दोगुना हुआ मुनाफाकिसानों ने सिर्फ आम के भरोसे बैठने के बजाय बुद्धिमानी दिखायी और इंटरक्रॉपिंग को अपनाया. आम के पेड़ों के बीच बची खाली जगह पर वे बैंगन, टमाटर, बंधा गोभी, भिंडी और आलती जैसी मौसमी साग-सब्जियों की खेती कर रहे हैं. आम के साथ-साथ इन सब्जियों को बेचने से किसानों को सालाना लगभग एक लाख रुपये की अतिरिक्त आमदनी हो जाती है. यह मॉडल सालभर उनकी जेब में पैसों की आमद बनाये रखता हैं.

धान के मुकाबले कम लागत, ज्यादा फायदा

किसान सोनाराम सोरेन बताते हैं कि पारंपरिक धान की खेती की तुलना में आम और सब्जियों की खेती कहीं अधिक मुनाफा देने वाली है. धान की खेती में जहां साल में सिर्फ एक बार फसल मिलती थी और महज 50-60 हजार रुपये की आय होती थी, वहीं मेहनत और लागत के हिसाब से यह मुनाफा बेहद कम था. इसके विपरीत आम की बागवानी में मेहनत कम है और बस थोड़ी बहुत देखभाल की जरूरत होती है, जबकि रिटर्न धान के मुकाबले कई गुना ज्यादा है.पलायन रुका व बच्चों को मिली बेहतर शिक्षाइस कृषि क्रांति ने किसानों के जीवन स्तर को पूरी तरह बदल कर रख दिया है. पहले धान की खेती खत्म होने के बाद पेट पालने के लिए किसानों को फैक्ट्रियों में मजदूरी करने जाना पड़ता था. लेकिन, अब सालभर अच्छी कमाई होने के कारण उन्हें आर्थिक परेशानियों से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गयी है. इस आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा फायदा नयी पीढ़ी को मिल रहा है. गांव में रहते हुए भी ये किसान अब अपने बच्चों को शहर के अच्छे स्कूल और कॉलेजों में पढ़ा रहे हैं.

नाबार्ड व टाटा स्टील फाउंडेशन ने सारथी बन किया सहयोग

किसानों की इस सफलता के पीछे नाबार्ड और टाटा स्टील फाउंडेशन का मजबूत सहयोग रहा है. वर्ष 2016 में वाड़ी प्रोजेक्ट के तहत रांगामाटिया गांव के 16 किसानों को चुना गया था. 30 मार्च 2016 से 31 मार्च 2025 तक चले इस प्रोजेक्ट के तहत किसानों को आम के उन्नत पौधों से लेकर सिंचाई की व्यवस्था और मार्केटिंग तक हर स्तर पर मदद दी गयी. हालांकि, यह प्रोजेक्ट अब समाप्त हो चुका है, लेकिन संस्थाओं के पदाधिकारी आज भी बीच-बीच में आकर किसानों को जरूरी सलाह और तकनीकी सहयोग देते हैं, जिससे यह सफलता लगातार आगे बढ़ रही है.

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