आधुनिकता के दौर में लुप्त हुआ मांदर की धुन, 1861 से मांदर निर्माण कर रहा रूहीदास परिवार

Updated at : 14 Jan 2019 6:32 AM (IST)
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आधुनिकता के दौर में लुप्त हुआ मांदर की धुन, 1861 से मांदर निर्माण कर रहा रूहीदास परिवार

गम्हरिया : टुसू पर्व के एक माह पूर्व ही गांवों में मांदर की धुन गूंजने लगती थी, लेकिन आधुनिकता के इस दौर में मांदर की धुन लुप्त हो गयी है.बाजार में तरह-तरह के आधुनिक वाद्य यंत्र के आने से मांदर की मांग घटने लगी है. इससे मांदर निर्माताओं के बीच आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया […]

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गम्हरिया : टुसू पर्व के एक माह पूर्व ही गांवों में मांदर की धुन गूंजने लगती थी, लेकिन आधुनिकता के इस दौर में मांदर की धुन लुप्त हो गयी है.बाजार में तरह-तरह के आधुनिक वाद्य यंत्र के आने से मांदर की मांग घटने लगी है.
इससे मांदर निर्माताओं के बीच आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है. गम्हरिया प्रखंड के नारायणपुर पंचायत अंतर्गत धतकीडीह गांव में निवास करने वाले रूहीदास का परिवार अंग्रेजों के शासनकाल यानी 1861 से मांदर निर्माण कर अपना जीविकोपार्जन करते आ रहे हैं.
सरकारी उदासीनता व घटती मांग के कारण आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है, हालांकि पुरखों की परंपरा होने की वजह से वे उक्त व्यवसाय को छोड़ भी नहीं पा रहे हैं.
ये हैं मांदर के कारीगर. बलराम रूहीदास, सुपल रूहीदास, बुधुराम रूहीदास, रथु रूहीदास, गुहा रूहीदास.
इन वाद्य यंत्रों का करते हैं निर्माण. ढोल, मांग, कीर्तन मृदुल आदि.
तीन दिन में पूरा करते हैं वाद्य यंत्र. कारीगर बलराम रूहीदास ने बताया कि उनके द्वारा दिनभर कड़ी मेहनत कर तीन दिन में दो वाद्य यंत्र का निर्माण कर लिया जाता है. मेहनत के हिसाब से आमदनी नहीं हो पाती है, लेकिन पूंजी नहीं होने के कारण दूसरा व्यवसाय शुरू नहीं कर पा रहे हैं. उनके पास तीन से छह हजार रुपये तक के वाद्य यंत्र उपलब्ध हैं.
सरकार से छुटी उम्मीद. श्री रूहीदास ने बताया कि सरकार से उनकी उम्मीद खत्म हो गयी है. वोट आते ही पूर्व मुख्यमंत्री, विधायक समेत स्थानीय नेता उनके पास आते हैं और लुभावना सपना दिखाकर चले जाते हैं. उसके बाद कोई नहीं आता है.
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