लीज बंदोबस्ती की घोषणा के बाद हुआ जोरदार स्वागत, मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा, अब सारे लोग हो जायेंगे झारखंडी

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सरकारी स्तर पर लीज बंदोबस्ती की घोषणा के बाद पहुंचे सीएम का जोरदार स्वागत जमशेदपुर : बस्तियों की लीज बंदोबस्ती वर्ष 1985 को कट ऑफ साल बनाये जाने पर हुए संशय को लेकर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने रविवार को स्पष्ट किया कि 30वें साल पर अवैध बस्तियों को वैध कर दिया जायेगा. रविवार को लीज […]

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सरकारी स्तर पर लीज बंदोबस्ती की घोषणा के बाद पहुंचे सीएम का जोरदार स्वागत
जमशेदपुर : बस्तियों की लीज बंदोबस्ती वर्ष 1985 को कट ऑफ साल बनाये जाने पर हुए संशय को लेकर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने रविवार को स्पष्ट किया कि 30वें साल पर अवैध बस्तियों को वैध कर दिया जायेगा. रविवार को लीज बंदोबस्ती के फैसले को लेकर उनका जबरदस्त नागरिक अभिनंदन कार्यक्रम एग्रिको ट्रांसपोर्ट मैदान में आयोजित था, मगर भारी बारिश के कारण स्थगित कर दिया गया.
मुख्यमंत्री सड़क मार्ग से रांची से सीधे अपने आवास पर पहुंचे और वहां पत्रकारों के साथ बातचीत में कहा कि तकनीकी तौर पर अब 1985 के बजाय 1988 में जिसके पास अवैध दखल था, उसे अब बंदोबस्ती का अधिकार मिल जाएगा. श्री दास ने कहा कि इस तरह से साल 2020 में 1990 का साल कट ऑफ हो जाएगा. यह सिलसिला आगे बढ़ता रहेगा. उन्होंने बताया कि स्थानीयता नीति भी 1985 का ही कट अॉफ है, लिहाजा, यहां की बस्तियों के लोग भी झारखंडी हो जायेंगे और उनका भी आवासीय प्रमाण पत्र से लेकर सारा कुछ झारखंड का ही हो जायेगा.
टाटा स्टील के सबलीज एरिया जैसे सोनारी, कदमा, सीतारामडेरा में सबलीज में रहनेवाले लोग हैं, उससे भी बड़ा अधिकार बस्तियों के लोगों को मिला है, क्योंकि टाटा स्टील को लीज पर दिया गया है और कंपनी ने सबलीज पर लोगों को जमीन दी है, लेकिन यहां सरकार सीधे लोगों को लीज पर जमीन दे रही है.
मेरे जीवन का सबसे आनंद का दिन, 95 से कर रहा हूं संघर्ष, हक देकर रहा
श्री दास ने कहा कि लीज पर लोगों को जमीन देने का फैसला का दिन उनके जीवन का सबसे आनंद का दिन रहा. वर्ष 1995 में विधायक बनने के समय उन्होंने यहां के लोगों से जो वादा किया था, इस बात की खुशी है कि उसे पूरा कर दिया है.
वर्षों से बस्ती क्षेत्र में जो गरीब मजदूर रह रहे थे, सालों से उनकी लड़ाई लड़ी जा रही थी. अब अनाधिकृत बस्तियों का कलंक मिट जाएगा. उन्हें अधिकृत का दर्जा दिया जाएगा. उन्होंने कहा कि भाजपा और बस्ती विकास समिति ने इस मुद्दे पर लंबा संघर्ष किया. विधायक बनने के बाद 1995 में मैंने पहली बार बिहार विधानसभा में बस्तियों का मुद्दा उठाया था.
उस वक्त राजद और झामुमो की सरकार बिहार में थी, जिसने इस मुद्दे को दरकिनार कर दिया था. 1998 में एक ऐतिहासिक रैली उपायुक्त कार्यालय तक निकाली गई थी. मैंने देखा था कि सैकड़ों की संख्या में महिलाएं गोद में बच्चा लिये इस रैली मेंं शामिल हुई थी. वह घटना मुझे अभी भी याद है. तभी मैंने तय किया था कि इस समस्या का हर हाल में समाधान करके रहूंगा.
बाबूलाल ने लीज की फाइल तक नहीं पलटी, कांग्रेस व झामुमो की सरकार भी कुछ नहीं कर पायी : श्री दास ने कहा कि झारखंड अलग राज्य बनने के बाद तीन साल तक बाबूलाल मरांडी की सरकार रही, मगर बस्ती की समस्या का मामला तो दूर, लीज पर पन्ना तक नहीं पलटा गया.हेमंत सोरेन भी मुख्यमंत्री रहे, झामुमो के चार-चार बार मुख्यमंत्री रहे. कांग्रेस, राजद और झामुमो के सहयोग से 2006 से 2008 तक निर्दलीय मधु कोड़ा मुख्यमंत्री रहे, मगर बस्तियों के मामले पर कोई फैसला नहीं हुआ. जब-जब भाजपा की सरकार रही, लीज मामले में काम होता रहा.
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