पढ़नी है--पहले व्यक्तत्वि की पहचान थी अब पैसे की बढ़ गयी अहमियत

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पढ़नी है–पहले व्यक्तित्व की पहचान थी अब पैसे की बढ़ गयी अहमियत 9कोडपी18पूर्व सरपंच परशुराम सिंह.9कोडपी19पूर्व मुखिया अर्जुन साहू.———-यादों सेपंचायत चुनाव———प्रतिनिधिमरकच्चो : झारखंड अलग राज्य होने के बाद राज्य में दूसरी बार पंचायत चुनाव कराने के लिए आयोग द्वारा चार चरणों में अलग-अलग तिथियां तय करने के साथ ही राज्य में आदर्श आचार संहित लागू […]

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पढ़नी है–पहले व्यक्तित्व की पहचान थी अब पैसे की बढ़ गयी अहमियत 9कोडपी18पूर्व सरपंच परशुराम सिंह.9कोडपी19पूर्व मुखिया अर्जुन साहू.———-यादों सेपंचायत चुनाव———प्रतिनिधिमरकच्चो : झारखंड अलग राज्य होने के बाद राज्य में दूसरी बार पंचायत चुनाव कराने के लिए आयोग द्वारा चार चरणों में अलग-अलग तिथियां तय करने के साथ ही राज्य में आदर्श आचार संहित लागू हो गया. आज के चुनाव को देखने से लगता है कि दशकों पूर्व हुए पंचायत चुनाव से बिल्कुल अलग है. एक ओर जहां माडर्न किस्म के उम्मीदवार चुनाव मैदान में आ गए हैं. वहीं दूसरी ओर मतदाताओं में भी काफी बदलाव आया है. इन्हीं बदलावों को लेकर प्रभात खबर प्रतिनिधि ने पंचायत के पूर्व सरपंच व मुखिया से पंचायत चुनाव के बारे में जानने का प्रयास किया. बच्छेडीह पंचायत के पूर्व मुखिया 75 वर्षीय अर्जुन साहू व पूर्व सरपंच 87 वर्षीय परशुराम सिंह बताते है कि एकीकृत बिहार के समय अंतिम पंचायत चुनाव 1978 में कराया गया था. जिसमें दोनो जीतकर मुखिया व सरपंच चुने गये थे. मगर उस समय आज के चुनाव जैसा माहौल नहीं था. आज के चुनाव में पैसेवालो की पूछ होती है मगर हमलोगों के जमाने में व्यक्तित्व की पूछ होती थी. जनता व मतदाता उम्मीदवारो के व्यक्तित्व व सामाजिक प्रतिष्ठा को देखकर मतदान करते थे. उसमें जो भारी पड़ता था उसे जीताने का काम करती थी. पहले के मुखिया सरपंच की अपनी छवि के अनुरूप प्रतिष्ठा होती थी. बैठको में हमारे पहुंचने के बाद पूरा चौपाल खामोश हो जाता था परंतु दुर्भाग्य से आज ऐसा नहीं है. सही बात में भी लोग मुखिया, सरपंच की बातो को अहमितय नहीं देते. इसके पीछे मुख्य कारण है कि जमाना आर्थिक युग की ओर बढ रहा हे. जनता का विश्वास भी जन प्रतिनिधियों पर से उठता जा रहा है. चुने गये प्रतिनिधि अपने निजी एवं आर्थिक लाभ की ओर पहले कम ध्यान देते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. आज के चुनाव काफी खर्चीले हो गये है. पहले के जमाने में नगद राशि नाममात्र खर्च होता था उन्होंने कहा कि एक बात जरूर है कि उम्मीदवारो के घरो में चुनाव के दौरान 15 से 20 दिनो तक दर्जनों लोगों का भोजन बनता था. पंचायत के विभिन्न गांव के ग्रामीण अपनी चौपाल में ही मतदान के लिए अपना उम्मीदवार चुन लेते थे. इसमें मुखिया सरपंच की सहमति भी रहती थी. जिसके कारण क्षेत्र का चौतरफा विकास होता था. आज के दिनो में दूर दूर तक यह बात नहीं है. पंचायत प्रतिनिधियों में तालमेल का अभाव है. इसका गलत फायदा पदाधिकारी उठाते है. उनके समय में हजारीबाग जिला से काम हुआ करता था. उस समय पंचायत में खुल अदालत लगती थी जिसमें विभिन्न समस्याओं और गांवों के विकास के मामले में जनता व अधिकारी के बीच आमने सामने बात होती है थी और तीन माह के अंदर जनता की समस्याओं का समाधान होता था. पूर्व में पदाधिकारीगण मुखिया व सरपंच की अनुमति के बगैर सरकारी काम को आगे नहीं बढाते थे. आज पदाधिकारी बेलगाम होकर अपनी मरजी से काम करते है. उनके जमाने में पुलिस भी गांव आती थी तो पहले गांव के मुखिया सरपंच को खोजा जाता था तब आरोपी के घर पहुंचकर कार्रवाई होती थी. पूर्व के चुनाव में ज्यादा प्रचार प्रसार की आवश्यकता नहीं होती थी. आज के चुनाव में दिन भर गांव में भोपू का शोर गुंजता रहता है. छवि के आधार पर जीतते थे चुनाव : पूर्व मुखियापूर्व मुखिया अर्जुन साहू ने कहा कि पहली बार कम उम्र में ही उन्होंने अपने पिता पूर्व मुखिया स्व. डेगन साव की छवि के आधार पर 1970 में चुनाव जीता था. वही दूसरी बार 1978 में पिछले कार्यकाल का लेखा जोखा कर जनता ने पुन: उन्हें चुनकर सेवा का मौका दिया था. व्यक्तित्व के आधार पर जीता था चुनाव : पूर्व सरपंचपूर्व सरपंच परशुराम सिंह ने कहा कि पहली बार उन्होंने अपने व्यक्तित्व के आधार पर चु नाव जीता था. इस चुनाव में उन्होंने एक चवन्नी भी नगर खर्च नहीं किया था. दूसरी बार 1978 में पूर्व के कार्यों के आधार पर जनता ने बैठक कर चौपाल में चुनाव के पूर्व ही मेरे सर पर जीत का सेहरा बांध दिया था.

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