प्रकृति और संस्कृति की रक्षा का लिया गया संकल्प

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प्रकृति और संस्कृति की रक्षा का लिया गया संकल्प

बसिया-कोनबीर स्थित सरहुल अखड़ा में रविवार को सरना धर्म महासम्मेलन सह एक दिवसीय प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया

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बसिया. बसिया-कोनबीर स्थित सरहुल अखड़ा में रविवार को सरना धर्म महासम्मेलन सह एक दिवसीय प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित राजी पड़हा प्रार्थना सभा भारत के महासचिव विद्यासागर केरकेट्टा ने कहा कि हम प्रकृति के पूजक हैं और प्रकृति की रक्षा करना ही हमारा मूल धर्म है. उन्होंने पूर्व के कोरोना काल का उदाहरण देते हुए कहा कि उस संकट के समय जब सारे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च बंद हो गये थे, तब प्रकृति ने ही मानव जीवन की रक्षा की. जहां लोगों को हजारों रुपये खर्च कर ऑक्सीजन खरीदनी पड़ रही थी, वहीं प्रकृति रूपी पेड़-पौधों से हमें यह जीवनदायिनी गैस हमेशा निशुल्क मिलती रहती है. उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में हमें अपनी संस्कृति और धर्म के साथ-साथ प्रकृति को भी सहेजने और बढ़ाने की जरूरत है, ताकि हम आने वाली पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति और प्रकृति की रक्षा के गुण सिखा सकें. श्री केरकेट्टा ने समाज को जागरूक करते हुए कहा कि हमें किसी के बहकावे या प्रलोभन में आकर अपना धर्म नहीं बदलना है, बल्कि अपनी समृद्ध संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सदैव प्रयासरत रहना है. इस महासम्मेलन में राष्ट्रीय सरना धर्म प्रचारिका सीला उरांव, चिंतामणि उरांव, राजी पड़हा सरना सभा गुमला के अध्यक्ष संजय उरांव, उपाध्यक्ष बुधमनिया उरांव, सचिव सुनीता उरांव, गंदुर भगत, विनोद भगत, लक्ष्मण भगत, संत कुमार उरांव, विनय पहान और कार्तिक भगत सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे.

17 गुम 5 में मंच पर अतिथि

बसिया. बसिया-कोनबीर स्थित सरहुल अखड़ा में रविवार को सरना धर्म महासम्मेलन सह एक दिवसीय प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित राजी पड़हा प्रार्थना सभा भारत के महासचिव विद्यासागर केरकेट्टा ने कहा कि हम प्रकृति के पूजक हैं और प्रकृति की रक्षा करना ही हमारा मूल धर्म है. उन्होंने पूर्व के कोरोना काल का उदाहरण देते हुए कहा कि उस संकट के समय जब सारे मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च बंद हो गये थे, तब प्रकृति ने ही मानव जीवन की रक्षा की. जहां लोगों को हजारों रुपये खर्च कर ऑक्सीजन खरीदनी पड़ रही थी, वहीं प्रकृति रूपी पेड़-पौधों से हमें यह जीवनदायिनी गैस हमेशा निशुल्क मिलती रहती है. उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के समय में हमें अपनी संस्कृति और धर्म के साथ-साथ प्रकृति को भी सहेजने और बढ़ाने की जरूरत है, ताकि हम आने वाली पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति और प्रकृति की रक्षा के गुण सिखा सकें. श्री केरकेट्टा ने समाज को जागरूक करते हुए कहा कि हमें किसी के बहकावे या प्रलोभन में आकर अपना धर्म नहीं बदलना है, बल्कि अपनी समृद्ध संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सदैव प्रयासरत रहना है. इस महासम्मेलन में राष्ट्रीय सरना धर्म प्रचारिका सीला उरांव, चिंतामणि उरांव, राजी पड़हा सरना सभा गुमला के अध्यक्ष संजय उरांव, उपाध्यक्ष बुधमनिया उरांव, सचिव सुनीता उरांव, गंदुर भगत, विनोद भगत, लक्ष्मण भगत, संत कुमार उरांव, विनय पहान और कार्तिक भगत सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे.

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Vikash Nath

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