हम सच्चाई के मार्ग पर चलें : बिशप

Published at :05 Aug 2016 1:37 AM (IST)
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हम सच्चाई के मार्ग पर चलें : बिशप

श्रद्धा. गुमला धर्मप्रांत के सभी 38 चर्च में संत जॉन मेरी वियन्नी पर्व मनाया गया गुमला धर्मप्रांत के सभी 38 चर्च में संत जॉन मेरी वियन्नी पर्व पर मिस्सा पूजा हुई. बिशप व पुरोहितों ने पूजा करायी. चर्च में बड़ी संख्या में विश्वासी शामिल हुए. गुमला : गुमला धर्मप्रांत के सभी 38 चर्च में गुरुवार […]

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श्रद्धा. गुमला धर्मप्रांत के सभी 38 चर्च में संत जॉन मेरी वियन्नी पर्व मनाया गया
गुमला धर्मप्रांत के सभी 38 चर्च में संत जॉन मेरी वियन्नी पर्व पर मिस्सा पूजा हुई. बिशप व पुरोहितों ने पूजा करायी. चर्च में बड़ी संख्या में विश्वासी शामिल हुए.
गुमला : गुमला धर्मप्रांत के सभी 38 चर्च में गुरुवार को संत जॉन मेरी वियन्नी पर्व मनाया गया. सभी चर्च मिस्सा पूजा हुई. मुख्य समारोह संत पात्रिक महागिरजाघर गुमला में हुआ. यहां कई अनुष्ठान संपन्न कराये गये.
मुख्य अधिष्ठाता गुमला धर्मप्रांत के बिशप पॉल लकड़ा, सहयोगी पुरोहित विकर जनरल फादर सीप्रियन कुल्लू व संत इग्नासियुस के रेक्टर फादर ख्रिस्तोफर लकड़ा की अगुवाई में मिस्सा पूजा हुई. मौके पर बिशप ने अशिक्षा व नशापान जैसी बुराई से दूर रहने के लिए जागरूकता अभियान चलाने पर बल दिया. उन्होंने कहा कि 38 पल्लियों में 700 से अधिक पुरोहित कार्यरत हैं. पुरोहितों के कारण ही सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक विकास हो रहा है. उन्होंने कहा कि हम सच्चाई के मार्ग पर चलें, ताकि धर्मप्रांत मजबूत हो. वक्ता फादर ख्रिस्तोफर लकड़ा ने कहा कि संत जॉन मेरी बियन्नी सभी पुरोहितों के संरक्षक संत हैं.
वे मूलत: फ्रांस के हैं. साधारण परिवार में जन्मे संत जोन मेरी बियन्नी के माता-पिता धार्मिक प्रवृत्ति के थे. इसका सीधा प्रभाव उनके जीवन पर पड़ा और वे भी धार्मिक हो गये. उनकी बड़ी इच्छा थी कि सभी लोग धर्म के मार्ग पर चलें. पुरोहित बनने की भी इच्छा थी. इसके लिए उन्होंने काफी संघर्ष किया और अंतत: वे एक पल्ली पुरोहित बन गये, लेकिन जिस पल्ली का उन्हें पहला पुरोहित बनने का गौरव हासिल हुआ, वहां के लोग अधार्मिक थे.
धर्म-कर्म में रुचि नहीं लेते थे. इस पर संत जोन मेरी बियन्नी ने वहां के लोगों को धर्म के मार्ग से जोड़ा. फादर सीप्रियन कुल्लू ने कहा कि अर्स पल्ली को सुधारने का बीडा जॉन मेरी वियन्नी ने उठाया और इसके लिए उन्होंने सबसे पहले स्वयं में बदलाव लाया. इसके बाद लोगों को ईश्वर की महत्ता के बारे में जानकारी दी और धर्म से जोड़ा. इस दौरान उनमें जो बदलाव हुआ, उस बदलाव से लोग काफी प्रभावित हुए. तब संत जोन मेरी बियन्नी दिन में 18 से 20 घंटे तक काम करने लगे.
दूर देशों तक उनका नाम हुआ और लोग रोजाना काफी संख्या में उनसे मिलने के लिए पहुंचने लगे. अपनी विभिन्न प्रकार की समस्याओं को उनके समक्ष रखने लगे. संत जॉन मेरी बियन्नी भी उनकी समस्या के समाधान के लिए सुझाव देने लगे. इसके बाद वे धीरे-धीरे एक महान संत बन गये.
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