गुड न्यूज : असुर जाति ने पहाड़ पर बनायी नहर
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :12 Nov 2015 2:13 AM
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गुमला : गरमी व अन्य दिनों में जल संकट को देखते हुए असुर जाति के लोगों ने पहाड़ पर श्रमदान से नहर बना कर बेकार बह रहे पानी को संग्रहित किया है. पहाड़ पर संग्रहित इसी पानी को असुर जाति के लोग पीते हैं. पीने के अलावा पशुओं को नहलाने, पानी पीलाने के अलावा कपड़ा […]
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गुमला : गरमी व अन्य दिनों में जल संकट को देखते हुए असुर जाति के लोगों ने पहाड़ पर श्रमदान से नहर बना कर बेकार बह रहे पानी को संग्रहित किया है. पहाड़ पर संग्रहित इसी पानी को असुर जाति के लोग पीते हैं.
पीने के अलावा पशुओं को नहलाने, पानी पीलाने के अलावा कपड़ा व बरतन धोने का काम भी इस पानी से होता है. यह चैनपुर प्रखंड के पहाड़ पर बसे लुपुंगपाट व भड़ियापाट गांव की है. ये दोनों गांव घने जंगलों के बीच है. यहां विलुप्त प्राय: आदिम जनजाति असुर निवास करते हैं. इस जाति के लोगों ने पहाड़ से गिर रहे पानी को पहाड़ पर ही रोक कर मिशाल पेश किया है. असुर जाति के लोगों ने पहाड़ पर मिट्टी व पत्थर से मेढ़ बांध कर बेकार बह रहे पानी को संग्रहित किया है.
चापानल व कुआं सफल नहीं :दोनों गांव में 91 परिवार हैं. यह छिछवानी पंचायत में पड़ता है. गांव में चापानल व कुआं सफल नहीं है. चापानल है तो खराब पड़ा है. कुआं गरमी में सूख जाता है. गांव के ही पहाड़ में प्राकृतिक जलस्रोत है. जहां 12 महीने पानी रहता है. गरमी में पानी के लिए लोग तरसते थे. इसलिए असुर जाति के लोगों ने पहाड़ पर ही 100 फीट लंबा मेढ़ बांध कर उसे नहर का रूप दे दिया है. यहां अब लगातार पानी बहता है. जो असुर जाति के लिए अमृत सामान है.
सरकार का ध्यान नहीं है : ग्रामीण : गांव के अमर असुर, भंवरा असुर ने कहा कि गांव में चुआं खोदे हुए हैं. बरसात में वहां पानी जमा होता है तो पीते हैं. लेकिन अन्य मौसम में झेड़िया नाला के पानी का ही उपयोग करते हैं. सरकार ने इस गांव में कुछ नहीं दिया है. हम किसी प्रकार जी रहे हैं. झेड़िया नाला का पानी हल्का प्रदूषित होता है, लेकिन कोई उपाय भी नहीं है.
प्रशासन आज तक नहीं पहुंची गांव : लुपुंगपाट व भडि़यापाट काफी खूबसूरत जगह है. जब जमीन तल से पहाड़ पर चढ़ते हैं तो नीचे घने जंगलों का जो दृश्य दिखता है, वह मनोहारी होता है. लेकिन प्रशासनिक अधिकारी गांव जाने से डरते हैं. ग्रामीण बताते हैं कि पहाड़ पर गांव है. चढ़ने में परेशानी है. इसलिए अधिकारी नहीं आते हैं. जबकि इस क्षेत्र के 91 परिवार में से कोई न कोई हर दिन 12 किमी पैदल चल कर चैनपुर आता-जाता है.
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