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सिक्ख समुदाय ने सबसे पहले किया था रावण दहन

गुमला : शांति, सद्भाव व सर्वधर्म के बीच गुमला में रावण दहन की 56 वर्ष पुरानी अद्भूत परंपरा रही है. पंजाबी बंधुओं की पहल पर वर्ष 1959 पर पहली बार रावण दहन की शुरूआत हुई, जो आज भी अनवरत जारी है. इस वर्ष भी रावण दहन पीएइ स्टेडियम में होगा. 50 फीट ऊंचे रावण का […]

गुमला : शांति, सद्भाव व सर्वधर्म के बीच गुमला में रावण दहन की 56 वर्ष पुरानी अद्भूत परंपरा रही है. पंजाबी बंधुओं की पहल पर वर्ष 1959 पर पहली बार रावण दहन की शुरूआत हुई, जो आज भी अनवरत जारी है.

इस वर्ष भी रावण दहन पीएइ स्टेडियम में होगा. 50 फीट ऊंचे रावण का दहन संध्या साढ़े बजे किया जायेगा. प्रबुद्धजन बताते हैं कि बाजार टांड़ निवासी भाल सिंह व पंजाबी बंधुओं के प्रयास से रावण व कुंभकरण के पुतला दहन की नींव रखी. उस समय एक लकड़ी के ठेले में रावण का पुतला रख कर शहर का भ्रमण कराया जाता था. प्रत्येक व्यवसायी समिति को 25 पैसे की सहयोग राशि देते थे. 40 से 50 रुपये में धूमधाम से रावण का दहन किया जाता था. इसके बाद बैद्यनाथ साहू, वीरेंद्र झा व अन्य लोगों ने रावण दहन की कमान संभाली.

बाजार टांड़ की जमीन का अतिक्रमण हो गया. इसके बाद दो जगहों पर रावण दहन होने लगा. महावीर चौक स्थित पुराना बस पड़ाव (वर्तमान में पटेल चौक) के समीप रावण दहन किया जाने लगा. इसके बाद सर्वसम्मति से कचहरी परिसर में एक ही जगह पर रावण दहन की परंपरा आरंभ हुई.

1984 में तत्कालीन डीसी द्वारिका प्रसाद सिन्हा ने स्टेडियम में रावण दहन की अनुमति दी. तब से निरंतर रावण दहन की परंपरा कायम है. रावण दहन आयोजन समिति के सचिव अनिल कुमार बताते हैं कि स्टेडियम परिसर में समुचित विद्युत व सुरक्षा की व्यवस्था की गयी है. आकर्षक आतिशबाजी के बीच रावण दहन किया जायेगा.

Prabhat Khabar Digital Desk
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