मासूम नीरज को 16 माह बाद मिला माता-पिता का प्यार
Updated at : 09 Jul 2019 1:07 AM (IST)
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गुमला : मासूम नीरज उरांव को 16 माह बाद अपने माता-पिता का प्यार मिला. सोमवार को नीरज अपने माता-पिता को देखने के बाद भी उनके पास जाने को तैयार नहीं था. लेकिन जब प्यार से बात की, तो नीरज अपने माता-पिता की गोद में आया और खिलखिलाने लगा. क्या है मामला. गुमला प्रखंड के खोरा […]
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गुमला : मासूम नीरज उरांव को 16 माह बाद अपने माता-पिता का प्यार मिला. सोमवार को नीरज अपने माता-पिता को देखने के बाद भी उनके पास जाने को तैयार नहीं था. लेकिन जब प्यार से बात की, तो नीरज अपने माता-पिता की गोद में आया और खिलखिलाने लगा.
क्या है मामला. गुमला प्रखंड के खोरा भकुवाटोली निवासी साखू उरांव गरीबी के कारण अपने चार बच्चों व पत्नी की जीविका चलाने के लिए मजदूरी करने पलायन कर गया. वह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के एक ईंट भट्ठा में काम करता है. इधर, साखू की पत्नी ललिता देवी अपने गांव खोरा भकुवाटोली में चार बच्चों की देखरेख कर रही थी.
लेकिन 16 माह पहले अचानक ललिता की दिमागी स्थिति खराब हो गयी. ललिता अक्सर इधर-उधर घूमने भाग जाती थी. ललिता की मानसिक स्थिति को देखते हुए उसकी मां बिरसी देवी उसे भरनो प्रखंड के गढ़ाटोली गांव ले गयी. वहां एक भगत से उसका झाड़ फूंक कराया, ताकि उसकी दिमागी स्थिति में सुधार हो सके. लेकिन ललिता की दिमागी स्थिति ठीक होने की बजाय और खराब हो गयी.
वह गढ़ाटोली गांव में ही दो माह के नीरज (अब 16 महीने) को अपनी मां बिरसी की गोद में देकर भाग गयी. इसके बाद वह इधर-उधर भटकने लगी. पैदल घूमती हुई रांची फिर जमशेदपुर चली गयी. मां के अर्द्धविक्षिप्त होने व पिता के पलायन करने के बाद नीरज व उसके अन्य भाई-बहन के परवरिश का जिम्मा बिरसी पर आ गया. चूंकि अन्य तीन बच्चे अमृता उरांव, संतोष उरांव व धीरज उरांव समझदार थे. इसलिए उन्हें खाना खिला कर रखा जा सकता था, लेकिन नीरज की उम्र उस समय दो माह थी. वह बिना दूध के रह नहीं सकता था.
ऊपर से गरीबी के कारण दूध कहां से खरीदे, यही चिंता थी. इसलिए बिरसी ने अपने दामाद साखू उरांव को फोन कर उत्तर प्रदेश से बुलाया और पूरी घटना की जानकारी दी. नीरज की अच्छी परवरिश व देखरेख के लिए साखू ने अपने बेटे को सीडब्ल्यूसी को सौंप दिया. सीडब्ल्यूसी ने बच्चे की स्थिति को देखते हुए उसे मिशनरीज ऑफ चैरिटी में परवरिश के लिए रख दिया. बेटे को सीडब्ल्यूसी को सौंपने के बाद साखू अपना काम छोड़ कर अपनी पत्नी ललिता को खोजने में लग गया. काफी खोजबीन व विभिन्न पुलिस थानों में संपर्क के बाद ललिता को बुंडू-तमाड़ की सड़कों पर भटकते देखा गया.
साखू ने ललिता को वापस अपने गांव लाया. यहां इलाज कराया. 10 महीने के इलाज के बाद ललिता की दिमागी स्थिति में सुधार हुआ. जब ललिता ठीक हुई, तो मां की ममता जाग उठी. वह अपने बेटे नीरज को खोजने लगी. सोमवार को साखू व ललिता गुमला में सीडब्ल्यूसी कार्यालय पहुंचे और अपने बेटे की मांग की. कागजी कार्रवाई के बाद सीडब्ल्यूसी ने नीरज को उसके माता-पिता को सौंप दिया.
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