Giridih News :शर्म आती है मजदूरी बताते हुए हमको / इतने में तो बच्चों का गुब्बारा नहीं मिलता

Published by :PRADEEP KUMAR
Published at :30 Apr 2026 10:22 PM (IST)
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Giridih News :शर्म आती है मजदूरी बताते हुए हमको / इतने में तो बच्चों का गुब्बारा नहीं मिलता

Giridih News :संगठित क्षेत्र के मजदूर तो पे-बैंड, बेसिक, इंक्रीमेंट, डीए, वीडीए, समय-समय पर पे रिवीजन, ग्रैच्युटी, इएसआई, पीएफ-पेंशन की सुविधाओं से लैस शानो-शौकत की जिंदगी जीते हैं. और सार्वजनिक क्षेत्र हुआ तो गाड़ी-बंग्लो भी. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की सारी सुविधाएं. इसके दूसरे छोर पर हैं असंगठित मजदूर, जिनके लिए न तो वेज बोर्ड है और न न्यूनतम मजदूरी की बाध्यता का कोई कठोर नियमन.

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10 घंटे तीस दिन काम और मजदूरी संगठित क्षेत्र के मजदूरों की चौथाई भी नहीं. शायर मुनव्वर राना के एक शेर में बखूबी इनकी ट्रेजडी उभरती है : शर्म आती है मजदूरी बताते हुए हमको / इतने में तो बच्चों का गुब्बारा नहीं मिलता … हर साल को एक मई को मजदूर दिवस पर नारों से गुलजार तख्तियों के साथ निकली रैली और मंचों से गरजते भाषण जैसे इसी मजदूर का प्रहसन करते लगते हैं.

बेबस जिंदगी के फटे पन्ने

गिरिडीह जिले में मजदूर वर्ग आज भी न्यूनतम मजदूरी और अपने हक के लिए संघर्षरत है. कोयलांचल से लेकर अभ्रक खदानों तक ठेका प्रथा और शोषण के खिलाफ आवाज तो बुलंद है, पर मजदूरों को उनका पूरा हक नहीं मिल पा रहा है. अलग झारखंड राज्य बनने के 26 वर्ष बाद भी यहां के मजदूरों की जिंदगी में अच्छे दिन का उजाला नहीं आया है. यूं तो मजदूर दिवस पर कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. मजदूरों के हक की बातें कही जाती है. लंबे-चौड़े नारे लगाये जाते हैं, परंतु इन नारों के पीछे की हकीकत यह है कि गिरिडीह कोयलांचल का मजदूर तबका आज भी बेबस है.

रोड सेल में ऑफर नहीं हुआ तो निठल्ला हो जाते हैं : गिरिडीह कोयलांचल क्षेत्र में रोड सेल से जुड़े असंगठित मजदूरों की स्थिति बेहद खराब है. इन्हें जीने के लिए जरूरी ठोस सुविधा उपलब्ध है और ना ही रोजाना काम की गारंटी है. काम नहीं मिलने पर रोटी का जुगाड़ इनके लिए आफत बन जाती है. गिरिडीह कोलियरी क्षेत्र के कबरीबाद में रोड सेल से जुड़े मजदूरों को पेयजल, स्वास्थ्य सुविधा एवं प्रतिदिन काम नहीं मिल रहा है. इस इलाके में दो हजार के करीब असंगठित मजदूर हैं. इनकी आजीविका रोड सेल पर निर्भर है. रोड सेल में बारी-बारी से काम मिलता है. जब कभी कोयला रोड सेल के लिए उपलब्ध नहीं कराया जाता है तो असंगठित मजदूर निठल्ला हो जाते हैं.

न्यूनतम मजदूरी तक के लाले पड़ते हैं

रोड सेल से जुड़े सरदारों का कहना है कि सीसीएल उनलोगों को कोई सुविधा उपलब्ध नहीं कराती. मजदूरों का घर चलाना मुश्किल हो जाता है. कैला गोप का कहना है कि गर्मी में मजदूरों के लिए पानी की सुविधा नहीं है. इससे भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. डीओ होल्डर को इससे कोई मतलब नहीं है, वह सिर्फ ट्रक बुक करने से वास्ता रखते हैं. कोयला नहीं मिलने पर दिनभर मजदूर बैठकर अपने घर चले जाते हैं. न्यूनतम मजदूरी नहीं मिल पाती है. यूनियन के नेता को भी कोयला उपलब्ध कराने की कोई चिंता नहीं रहती. उन्होंने सीसीएल प्रबंधन से रोड सेल के लिए नियमित रूप से कोयला का ऑफर देने की मांग की.

काम के अभाव में कम मजदूरी पर काम करने की मजबूरी

रोड सेल से जुड़े लाला गोप एवं किशोर राम ने कहा कि उन्हें कोई सुविधा नहीं है. ना तो पानी मिलता है और ना ही बैठने के लिए छावनी की व्यवस्था है. स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर नहीं रहने से परेशानी होती है. कहा कि यूनियन नेता व अधिकारी से भी समस्या का समाधान नहीं होता. मजदूरों का कहना है कि मजदूर दिवस के दिन कई लोक-लुभावन बातें की जाती है, पर सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं. यही हाल अभ्रक मजदूरों का भी है. ठेका प्रथा के कारण मजदूरों को उनका हक नहीं मिलता है, पर जीविका चलाने की मजबूरी में कम मजदूरी पर भी काम करने की मजबूरी है. अभ्रक मजदूरों की बदहाली की सुध लेने वाला भी कोई नहीं है. आज भी तिसरी, गावां में बच्चे-महिलाएं जंगल-झाड़ से ढिबरा चुनकर 100-150 रु रोज कमाते हैं. ऐसे में गिरिडीह में एक मई की प्रासंगिकता समझी जा सकती है. समान काम-समान दाम मिले, बंद अभ्रक खदानें खुलें, सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन हो, ऐसी मांगें जरूर होती हैं, पर हालात नहीं बदलते.

शहरी क्षेत्र के प्रमुख चौक-चौराहों पर लगती है मजदूरों की मंडी

गिरिडीह शहरी क्षेत्र के मकतपुर, बड़ा चौक, अलकापुरी, पचंबा सहित कई चौक-चौराहों पर मजदूरों की मंडी लगती है. सुबह छह बजे से ही मजदूर यहां एकत्र हो जाते हैं. ये दिहाड़ी मजदूर, राजमिस्त्री, पेंटर, प्लंबर, खेतिहर मजदूर होते हैं. ठेकेदार और मकान मालिक यहां आकर बोली लगाते हैं और मजदूरों को 300-500 रु रोज पर काम कराने ले जाते हैं. गिरिडीह में कोयला-अभ्रक उद्योग के खस्ता होने और मनरेगा में काम नहीं मिलने के कारण ग्रामीण इलाकों से दर्जनों मजदूर रोज शहर का रुख करते हैं. प्रखंडों से आने वाले मजदूर काम की तलाश में शहरी क्षेत्र की इन मंडियों में खड़े हो जाते हैं. कई बार शाम तक काम नहीं मिलता है और खाली हाथ घर लौटना पड़ता है. पचंबा के कोलेश्वर शर्मा का कहना है कि वह राजमिस्त्री का काम करता है. काम की तलाश में गिरिडीह आते हैं. कुछ मजदूर भी उनके साथ रहते हैं. काम मिलने पर खुशी होती है, लेकिन जब काम नहीं मिलता तो निराश होकर लौटना पड़ता है. उन्होंने रोजगार की गारंटी सुनिश्चित करने की मांग की.

(सूरज सिन्हा, गिरिडीह)B

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