इनकी ताकत है इनका परिवार
Author :Prabhat Khabar Digital Desk
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Updated at :15 May 2018 6:34 AM
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देवघर : बदलते जमाने में पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने से भारत में संयुक्त परिवार की परंपरा खत्म होती जा रही है. ऐसे में बिखरते परिवारों के लिए मोहनपुर प्रखंड के डुमरथर गांव का राउत परिवार मिसाल बन गया है. तीन पीढ़ियों से राउत परिवार एकजुट है. कहा जाता है जैसे-जैसे परिवार बढ़ता जाता है […]
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देवघर : बदलते जमाने में पाश्चात्य संस्कृति के हावी होने से भारत में संयुक्त परिवार की परंपरा खत्म होती जा रही है. ऐसे में बिखरते परिवारों के लिए मोहनपुर प्रखंड के डुमरथर गांव का राउत परिवार मिसाल बन गया है. तीन पीढ़ियों से राउत परिवार एकजुट है. कहा जाता है जैसे-जैसे परिवार बढ़ता जाता है तो बिखराव भी होता है, लेकिन राउत परिवार जैसे-जैसे बढ़ा, इस परिवार में मिठास व नजदीकियां भी बढ़ी है.
डुमरथर के राउत परिवार में कुल 85 लोग हैं, जिनमें अलग-अलग जगहों पर नाैकरियों की वजह से 19 लोग बाहर रहते हैं, जबकि परिवार के 66 लोग गांव में ही एक कैंपस में रहते हैं. 66 लोगों में 15 महिला, 15 पुरुष, 13 लड़कियां व 23 बच्चे शामिल हैं. इन सभी 66 लोगों का एक साथ रोजाना भोजन बनता है. घर की महिलाएं ही भोजन तैयार करती हैं. इस परिवार में रोज एक साथ भोजन बनना व फिर एक साथ दरी पर बैठकर भोजन करना कोई त्योहार या भंडारा से कम नहीं होता है.
10 किलो चावल व आठ किलो आटा की रोज खपत : परिवार के मुखिया पंजाबी राउत बताते हैं कि उनके घर में दोपहर के भोजन में 10 किलो चावल, 12 किलो सब्जी व एक किलो दाल की रोज खपत होती है. वहीं रात के भोजन में 10 किलो आटा, 12 किलो सब्जी व 20 किलो दूध की खपत राेज होती है. सारा सामान बाजार से ही खरीदा जाता है, केवल दूध घर कर रहता है. घर में गाय है, जिससे प्रतिदिन लगभग 25 किलो दूध होता है. चाय में पांच किलो दूध की खपत हो जाती है. भोजन बनाने के लिए एक बड़ा रसोई घर है. चावल भंडारे के तर्ज पर टोपिया में बनता है. रोटी बनाने के लिए बड़ा तवा है.
सुबह व शाम में सजता है आंगन : घर के लिए एक आंगन का क्या महत्व है, यह राउत परिवार में साफ दिखता है. हर रोज सुबह व शाम में घर की महिलाएं, बच्चे व पुरुष सुबह में अपने आंगन में एक साथ बैठते हैं. इस दौरान सभी एक-दूसरे का हालचाल समेत घर की अन्य बातों पर चर्चा करते हैं. आंगन में बच्चाें के साथ हंसी-ठिठोली भी होती है.
मुखिया व राजनीतिक पहुंच वाले भी इस घर में : राउत परिवार में राजनीतिक पहुंच वाले लोग भी है. इस घर के मुखिया कांग्रेस के प्रखंड अध्यक्ष पंजाबी राउत 30 वर्षों तक दहीजोर के मनोनीत मुखिया रहे. वहीं भाई भागीराथ राउत को दहीजोर का मुखिया चुना है. इस घर से झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन का भी नाता रहा है, राउत परिवार शिबू सोरेन के नजदीकी माने जाते हैं.
44 कमरा व तीन हॉल
66 लोग कुल 44 कमरों में रहते हैं. इसमें चार बड़े हॉल व दो सुंदर आंगन भी हैं. 44 कमरों का दो बड़ा भवन कोई धर्मशाला या लॉज से कम नहीं दिखता है. एक ही प्रवेश द्वार से सभी कमरों तक जाने का रास्ता है. पानी के लिए एक पुराना कुआं है, जिससे स्नान व शौचालय में आपूर्ति होती है. पेयजल के लिए एक बाेरिंग है.
डॉक्टर, डीएसपी, डीडब्ल्यूओ तक हैं राउत परिवार में
राउत परिवार में 12 लोग सरकारी सेवा में हैं, इसमें दो बेटियां हैं. भूपेंद्र राउत गुमला में डीएसपी हैं. दशरथ प्रसाद राउत रिटायर्ड डीडब्ल्यूओ व उनकी दो पुत्री डॉ अलका व डॉ उषा प्रिया चिकित्सक हैं. डॉ अलका डेंटिस्ट, जबकि डॉ उषा प्रिया एमबीबीएस हैं. विवेक राउत रांची में सचिवालय सहायक हैं. विशेश्वर प्रसाद राउत देवघर प्रखंड में बीपीआरओ हैं. विष्णु राउत विशेष शाखा में एसआइ हैं. विनय राउत व निमाय राउत शिक्षक हैं, जबकि अवधेश राउत हवलदार, शिवाकांत राउत रोजगार सेवक व नीतीश कुमार झारखंड पुलिस में सिपाही हैं.
किसी भी आफत व परेशानी में सभी खड़े होते हैं साथ
संयुक्त परिवार का क्या फायदा है, इस पर कुशेश्वर राउत बताते हैं कि उनकी पुत्री की शादी पिछले वर्ष तय हुई थी. उनके पास पैसा बिल्कुल नहीं था. विवाह में 15 लाख रुपये तक खर्च था. उनके सभी भाइयों ने एक-एक लाख रुपये दिये, तो शादी धूमधाम से हो गयी. इसके साथ ही परिवार में कोई बीमार पड़ जाता है या अन्य कोई भी आफत आती है तो सभी मिलकर निबटा लेते हैं. इससे परेशानी का पता ही नहीं चलता है. बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के बेरोजगारों को आगे की पढ़ाई में सभी मिल कर खर्च उठाते हैं.
चाय बेच कर परिवार को बांधे रखा
इस संयुक्त परिवार की नींव दिवंगत ठाकुर राउत ने रखी थी. ठाकुर राउत, बिरजू राउत, सीताराम राउत व नकुल राउत चार भाई थे. दिवंगत ठाकुर राउत की चौपा मोड़ पर चाय दुकान थी. उन्होंने वर्षों तक चाय बेची व परिवार को बांधे रखा. चाय बेच कर 1978 में ठाकुर राउत मुखिया चुने गये. बिरजू राउत पंचायत सेवक बन गये. चारों भाइयों ने परिवार को संस्कार दिया, जो आज भी बरकरार है.
संयुक्त परिवार सुख-दुख का साथी : बिरजू
देवघर. 95 वर्षीय बिरजू राउत ने कहा कि उनके बेटे व पोते तक मिल कर घर चलाते हैं, यह देख कर बहुत खुशी होती है. संयुक्त परिवार एक सुख-दुख के साथ की तरह है. संयुक्त परिवार की वजह से ही उम्र के इस पड़ाव में भी मुझे कोई शारीरिक कष्ट नहीं है, घर के सभी सदस्य सेवा के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं. किसी को भी कोई दिक्कत होती है, सभी एक दूसरे का साथ देते हैं. परिवार में खुशहाली बनी रहती है. हंसता-खेलता परिवार एक स्वस्थ परिवार को तैयार करती है. आज की पीढ़ियों को संयुक्त परिवार में रहना चाहिए, इससे कोई नुकसान नहीं, बल्कि लाभ है. यही हमारे भारत की संस्कार भी है.
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