15 वर्ष में भी नहीं बन सका आवास

Published at :16 Dec 2015 2:23 AM (IST)
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15 वर्ष में भी नहीं बन सका आवास

भवनाथपुर(गढ़वा) : भवनाथपुर प्रखंड में वित्तीय वर्ष 2002-03 में आदिम जनजाति परिवार के उत्थान के लिए राज्य सरकार द्वारा 110 लोगों को बिरसा आवास निर्माण के लिए 84.15 लाख रुपये का आवंटन किया गया था. इसके लिए विभागीय अभिकर्ता के रूप में कनीय अभियंता सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा को बनाया गया था. इसके बाद वर्ष 2005-06 […]

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भवनाथपुर(गढ़वा) : भवनाथपुर प्रखंड में वित्तीय वर्ष 2002-03 में आदिम जनजाति परिवार के उत्थान के लिए राज्य सरकार द्वारा 110 लोगों को बिरसा आवास निर्माण के लिए 84.15 लाख रुपये का आवंटन किया गया था. इसके लिए विभागीय अभिकर्ता के रूप में कनीय अभियंता सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा को बनाया गया था.
इसके बाद वर्ष 2005-06 में बिरसा आवास के निर्माण में काफी गड़बड़ी का मामला सामने आने के बाद तत्कालीन विधायक ने गढ़वा उपायुक्त से जांच कराने को कहा. जिसके आलोक में तत्कालीन उपायुक्त ने नगरऊंटारी के तत्कालीन एसडीओ श्रीराम तिवारी से मामले की जांच करायी. जांच के क्रम में भारी अनियिमितता का मामला उजागर हुआ. लेकिन इसके बाद मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई.
जांच के क्रम में यह मामला भी सामने आया कि कई आदिम जनजाति परिवारों का आवंटित आवास बिचौलियों के माध्यम से बेच दिया गया है. गांव के ही कुछ दूसरे संपन्न लोगों को कुछ पैसा बिचौलियों को देकर आवास को बेचा था. जांच के बाद कार्रवाई को लेकर काफी हो-हंगामा भी हुआ. लेकिन जांच फाइलों में सिमट कर रह गया.
10 वर्ष बाद भी उक्त आवास पूरे नहीं किये गये और उसकी पूरी राशि निकाल ली गयी. अब भी सैकड़ों परिवार टूटे-फूटे अथवा अधूरे घरों में रहने को विवश हैं.
अभी तक लोगों को मजदूरी नहीं मिली है : झुरही गांव के लखन कोरवा, मंगर कोरवा, सूर्यदेव कोरवा, राजकुमारी कुंवर, एतवरिया कुंवर, लराहा के किसमतिया देवी, आशा देवी, शंभू कोरवा, सूरज कोरवा आदि ने बताया कि जब उन्हें बिरसा आवास आवंटित किया गया था, तो ठेकेदार ने उनसे कहा कि आवास में लकड़ी उन्हें खुद लगाना है. वे लोग दिन भर-भूखे प्यासे रह कर जंगल से लकड़ियां काट कर लायें तथा मजदूरी की. लेकिन आज तक उन्हें उनका मजदूरी नहीं मिल पाया है.
90 फीसदी आवास अधूरा है : आदिम जनजातियों के आवंटित 110 आवासों में से 90 फीसदी आवास 15 वर्ष बाद भी पूरे नहीं किये जा सके हैं. जबकि इसकी राशि संबंधित ठेकेदार ने निकाल ली है. आधे-अधूरे भवनों में खुद से छप्पर डालकर आदिम जनजाति परिवार के लोग रह रहे हैं. कई आवास तो इतना जर्जर हो चुका है कि उसमें रहना मौत को दावत देने के समान हैं.
बावजूद उनके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है कि वे वहां से निकल कर अलग रहें. यहां के आदिम जनजाति परिवार इसे ही अपना नियति मानकर बैठे हुए हैं. पूर्व के जनप्रतिनिधि ने इनके लिए कुछ भी नहीं किया, जबकि वर्तमान के जनप्रतिनिधि जेल के सलाखों के पीछे हैं. ऐसे में इनका दर्द सुनने वाला कोई नहीं है.
प्रखंड में 525 परिवार रहते हैं
भवनाथपुर प्रखंड के कैलान, पंडरिया व मकरी पंचायत में लगभग 525 परिवार रहते हैं. इनमें झुरही में 25, अमवाडीह में 28, रक्शा टोला में 32, फूलवार में 15, करमाही में 40, लराहा में 33, घाघरा में 26, असनाबांध में 25, बरवारी में 26 घर आदिम जनजाति परिवार के लोग रहते हैं.
अमूमन अधिकतर आदिम जनजाति परिवार के लोग काफी गरीब हैं और वे जंगल के सूखी लकड़ियों को बेच कर परिवार का भरण-पोषण करते हैं. ऐसे लोगों के उत्थान के लिए सरकार द्वारा भेजी गयी 84.15 लाख रुपये की राशि भी बिचौलिये व अधिकारियों के गंठजोड़ की भेंट चढ़ गयी. इस दौरान सियासत बदला और नेता भी बदले, लेकिन इन आदिम जनजाति परिवारों का आवाज किसे ने बुलंद करने की जहमत नहीं उठायी.
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