झारखंड में पोटका के दो दोस्तों ने कर दिया जादू, 10 बीघे में कर दी तरबूज की खेती

तरबूज का फल (बाएं और बीच में) और खेत में खड़े शशिकांत बिशायी (दाएं). फोटो: प्रभात खबर
Success Story: पूर्वी सिंहभूम के पोटका प्रखंड के दो युवा शशिकांत बिशायी और मलय गिरी ने 10 बीघा जमीन पर आधुनिक तरीके से तरबूज की खेती शुरू कर मिसाल पेश की है. शहरों की ओर पलायन के बीच उनकी मेहनत क्षेत्र के किसानों और युवाओं को खेती को व्यवसाय के रूप में अपनाने की प्रेरणा दे रही है. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.
जादूगोड़ा से रंजन कुमार गुप्ता की रिपोर्ट
Success Story: जहां आज के समय में बेहतर रोजगार की तलाश में अधिकांश युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. वहीं, झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के पोटका प्रखंड के आसनबनी और कुलडीहा गांव के दो दोस्तों ने तरबूज की खेती को ही अपना भविष्य बनाकर एक नई मिसाल पेश की है. बचपन के दोस्त शशिकांत बिशायी और मलय गिरी ने मिलकर 10 बीघा जमीन पर आधुनिक तरीके से तरबूज की खेती शुरू की है. उनकी मेहनत और सोच आज क्षेत्र के किसानों और युवाओं के लिए प्रेरणा बनती जा रही है.
बचपन की दोस्ती से शुरू हुआ खेती का सपना
शशिकांत बिशायी और मलय गिरी बचपन से ही एक-दूसरे के अच्छे दोस्त रहे हैं. दोनों ने गांव में ही पले-बढ़े और हमेशा कुछ नया करने की सोच रखते थे. जब आसपास के कई युवा रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जाने लगे, तब इन दोनों दोस्तों ने अलग रास्ता चुनने का निर्णय लिया. दोनों ने सोचा कि अगर खेती को आधुनिक तरीके से किया जाए और सही योजना के साथ मेहनत की जाए तो यह भी एक सफल व्यवसाय बन सकता है. इसी सोच के साथ उन्होंने खेती में नई शुरुआत करने का फैसला किया.
10 बीघा जमीन पर शुरू की तरबूज की खेती
इस वर्ष दोनों दोस्तों ने मिलकर लगभग 10 बीघा जमीन पर तरबूज की खेती शुरू की है. खेती शुरू करने से पहले उन्होंने खेत की मिट्टी को तैयार किया और वैज्ञानिक तरीके से जमीन को उपजाऊ बनाने का प्रयास किया. उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन किया गया, ताकि फसल अच्छी और अधिक उत्पादन देने वाली हो. इसके साथ ही खेत में आधुनिक कृषि तकनीकों का भी उपयोग किया जा रहा है.
खेत में दिनभर मेहनत करते नजर आते हैं दोनों किसान
यदि कोई व्यक्ति इनके खेत पर पहुंचता है तो उसे दोनों दोस्त खेत में ही काम करते हुए दिखाई देते हैं. कभी सिंचाई करते हुए, कभी पौधों की देखभाल करते हुए और कभी खेत की निगरानी करते हुए वे दिनभर मेहनत में जुटे रहते हैं. खेती में नियमित मेहनत और देखभाल बेहद जरूरी होती है. इसलिए दोनों किसान सुबह से लेकर शाम तक खेत में काम करते हैं, ताकि फसल को किसी भी प्रकार का नुकसान न हो और उत्पादन बेहतर हो सके.
गर्मियों में लाभदायक है तरबूज की खेती
तरबूज की खेती गर्मी के मौसम में किसानों के लिए काफी लाभदायक मानी जाती है. यह फसल लगभग 70 से 90 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है. गर्मियों के मौसम में बाजार में तरबूज की मांग काफी अधिक रहती है. इसी कारण किसानों को इस फसल से अच्छी आय प्राप्त हो सकती है. कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय किसानों के अनुसार एक बीघा जमीन में तरबूज की खेती करने में लगभग 20 से 30 हजार रुपये तक का खर्च आता है. वहीं अगर फसल अच्छी होती है तो एक बीघा जमीन से 60 से 80 हजार रुपये तक की आमदनी भी संभव है.
मौसम और कीटों से रहता है नुकसान का खतरा
हालांकि खेती में लाभ के साथ जोखिम भी जुड़ा रहता है. मौसम में अचानक बदलाव, अधिक बारिश, कीट या बीमारियों के कारण फसल को नुकसान पहुंच सकता है. इसी कारण शशिकांत और मलय अपनी फसल की नियमित निगरानी कर रहे हैं. समय-समय पर सिंचाई, उर्वरक और आवश्यक दवाइयों का उपयोग किया जा रहा है, ताकि पौधों का विकास बेहतर तरीके से हो सके.
किसानों और युवाओं को दे रहे नई दिशा
प्रभात खबर से बातचीत के दौरान शशिकांत बिशायी और मलय गिरी ने बताया कि अगर किसान नई तकनीकों और आधुनिक खेती पद्धतियों को अपनाएं तो खेती से अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है. उन्होंने कहा कि हमारे क्षेत्र के किसान भाई भी पारंपरिक खेती के साथ-साथ नई फसलों की खेती शुरू करें, जिससे उनकी आय बढ़ सके. दोनों युवकों ने यह भी कहा कि जो किसान या युवा तरबूज की खेती के बारे में सीखना चाहते हैं, वे उनके खेत पर आकर खेती को देख सकते हैं और जरूरी जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं.
मेहनत रंग ला रही, खेत तक पहुंच रहे व्यापारी
दोनों दोस्तों की मेहनत का असर अब उनके खेतों में दिखाई देने लगा है. तरबूज की फसल धीरे-धीरे तैयार हो रही है और खेत में हरियाली के बीच बड़े-बड़े तरबूज उगने लगे हैं. सबसे खास बात यह है कि अब व्यापारी भी उनकी फसल खरीदने के लिए सीधे खेत तक पहुंचने लगे हैं. इससे उन्हें बाजार की बेहतर कीमत मिलने की उम्मीद है.
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युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही सफलता की कहानी
शशिकांत बिशायी और मलय गिरी की यह पहल यह साबित करती है कि यदि युवा खेती की ओर लौटें और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करें तो खेती भी रोजगार और सम्मान का मजबूत माध्यम बन सकती है. आज जब अधिकांश युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, ऐसे समय में इन दोनों दोस्तों की कहानी ग्रामीण युवाओं के लिए प्रेरणा बन रही है. उनकी मेहनत, लगन और सकारात्मक सोच यह संदेश देती है कि सही दिशा और कड़ी मेहनत से गांव में रहकर भी सफलता हासिल की जा सकती है.
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लेखक के बारे में
By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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