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आदिवासी बहुल गांव में पानी ही पानी, घरों में दुबकने को मजबूर लोग

Updated at : 17 Jul 2025 11:15 PM (IST)
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आदिवासी बहुल गांव में पानी ही पानी, घरों में दुबकने को मजबूर लोग

गंधर्व गांव के ग्रामीण 21वीं सदी में भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित

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काठीकुंड.देश जहां एक ओर आधुनिक तकनीक, डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी और हाईवे नेटवर्क से विकास की नयी ऊंचाइयों को छू रहा है, वहीं झारखंड के दुमका जिले के काठीकुंड प्रखंड स्थित आदिवासी बहुल गंधर्व गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर है. गांव के प्रधान टोला में न पक्की सड़क है और न ही जल निकासी की कोई व्यवस्था. हर बारिश में यह गांव नदी में तब्दील हो जाता है. तेज बारिश के बाद मंगलवार को गांव की कच्ची सड़कों में कमर तक पानी भर गया था. बुधवार तक भी जलस्तर कम नहीं हुआ, जिससे ग्रामीणों को रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में काफी कठिनाई हुई. बरसात में कच्चे रास्ते दलदल बन जाते हैं और पानी का बहाव इतना तेज होता है कि साइकिल, बाइक या पैदल चलना भी असंभव हो जाता है. सबसे अधिक परेशानी बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को होती है. स्कूल जाने वाले बच्चे घरों में कैद हो जाते हैं और इलाज के लिए अस्पताल पहुंचना मुश्किल हो जाता है. आपात स्थिति में ग्रामीण लकड़ी या चारपाई के सहारे पानी पार कर मरीजों को बाहर ले जाते हैं. गांव में जलजमाव के कारण गंदगी और मच्छरों का प्रकोप बढ़ रहा है, जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है. नालियों का अभाव और ऊंचाई पर निकासी की व्यवस्था न होने से पानी दिनों तक गांव में ही ठहर जाता है. ग्रामीण कई वर्षों से पक्की सड़क और सिंचाई नाले की मांग कर रहे हैं. उनका मानना है कि यदि नाले का निर्माण हो जाए तो बारिश का पानी खेतों तक पहुंचाया जा सकेगा, जिससे जलजमाव की समस्या खत्म होगी और सिंचाई का साधन भी मिल जाएगा. गंधर्व गांव की दुर्दशा यह दर्शाती है कि आज भी विकास के बड़े दावों के बीच कई इलाके बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. ग्रामीण प्रशासन से जल्द कार्रवाई की उम्मीद कर रहे हैं.

क्या कहते हैं ग्रामीण

बरसात आते ही हम लोग घरों में कैद हो जाते हैं. कच्ची सड़क पर नदी जैसी धारा बहती है. बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है. – हेमेन मरांडी

गांव से बाजार या अस्पताल जाना बेहद मुश्किल हो जाता है. कोई बीमार पड़ जाए तो चारपाई पर उठाकर पानी पार कर ले जाना पड़ता है. – दुला मरांडीबारिश के दिनों में स्कूल नहीं जा पाते. रास्ते में पानी इतना भर जाता है कि डर लगता है कि बह न जाएं. पढ़ाई का बहुत नुकसान होता है. – सोनामुनी कुमारी

स्कूल जाने की बहुत इच्छा रहती है, लेकिन पानी और कीचड़ देखकर लौटना पड़ता है. हम लोग घर में ही बैठे रह जाते हैं. – सोनाली बास्कीगांव में जगह-जगह पानी भर जाता है, उसमें मच्छर पैदा हो जाते हैं. कई बार बुखार और दूसरी बीमारियां फैल जाती हैं. – रूहिला मरांडी

बरसात में तो ऐसा लगता है कि गांव नदी बन गया हो, मवेशियों को चारा लाने तक में दिक्कत होती है. सब काम रुक जाता है. – बिटिया मुर्मूहमने कई बार पक्की सड़क और नाले की मांग की, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हुई. हर साल यही समस्या दोहरायी जाती है. – श्रीनाथ मरांडी

अगर बारिश के पानी को खेतों तक ले जाने के लिए नाला बनाया जाए तो सिंचाई की समस्या भी हल होगी और गांव में पानी भी नहीं भरेगा. – होपना हेंब्रमगांव की हालत देखकर बहुत दुख होता है. चुनाव के वक्त नेता आते हैं, वादे करते हैं लेकिन बाद में कोई मुड़कर नहीं देखता. बैठकों में समस्या रखने का भी कोई फायदा नहीं होता. – रमेश मरांडी, ग्राम प्रधान

पानी भरने से बच्चों और बूढ़ों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है. किसी जरूरत पर गांव छोड़ना हो तो घंटों जद्दोजहद करनी पड़ती है. – जूनस मुर्मूबरसात में कच्ची सड़क पर फिसलन होती है, कई लोग गिरकर चोटिल हो चुके हैं. प्रशासन को हमारी तकलीफ समझनी चाहिए. – चंदू मरांडी

चुनाव में वादे मिलते हैं. हम लोकतंत्र में अपनी भूमिका को समझते हुए मतदान कर अपना कर्तव्य निभाते हैं. चुनाव के बाद वादे खत्म, विकास की बातें खत्म हो जाती हैं. – प्रेम मरांडी

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAKESH KUMAR

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