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दूसरे की धन-संपत्ति हड़पने से आती है दरिद्रता या मृत्यु

दूसरे की धन-संपत्ति हड़पने से आती है दरिद्रता या मृत्यु

छोटी रणबहियार में श्रीमद्भागवत कथा में अभयानंद अभिषेक शास्त्री ने कहा प्रतिनिधि, रामगढ़ रामगढ़ के छोटी रणबहियार शिव मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन कथा व्यास अभयानंद अभिषेक शास्त्री जी ने भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह तथा भगवान श्रीकृष्ण के बाल सखा सुदामा की कथा का मार्मिक वर्णन किया. कथा में बताया गया कि भगवान शिव के विवाह में देवता, ऋषि-मुनि, दैत्य, दानव, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, बेताल आदि सभी शामिल हुए थे. जब पार्वती के पिता हिमाचल ने शिव के गोत्र के बारे में पूछा, तो शिव मौन रहे. नारद ने बताया कि शिव स्वयंभू हैं, उनका न माता-पिता है, न गोत्र. वह सृष्टि के आदिकाल से हैं, साकार भी और निराकार भी. शिव-पार्वती विवाह तारकासुर के संहार के लिए आवश्यक था, क्योंकि उसे यह वरदान था कि केवल भगवान शिव का पुत्र कार्तिकेय ही उसका वध कर सकता है. कथा में पार्वती की कठोर तपस्या, कामदेव के दहन और शिव द्वारा उन्हें इच्छित वरदान देने की कथा सुनाई गई. शिवरात्रि के दिन शिव विवाह का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो गये. कथा के उत्तरार्ध में भगवान श्रीकृष्ण के मित्र सुदामा की कथा सुनायी गयी. कथा वाचक ने बताया कि गुरुकुल में एक बार सुदामा ने कृष्ण के हिस्से का जलपान चुपके से खा लिया और झूठ बोल दिया. इस पाप का फल उन्हें गरीबी के रूप में भोगना पड़ा. उन्होंने समझाया कि दूसरों के हक पर अधिकार जमाने का परिणाम दरिद्रता या मृत्यु ही होता है. कथा वाचक ने कहा कि आप अपने जीवन में कभी भी किसी दूसरे के हिस्से का कोई भी धन-संपत्ति को कब्जे में लेने का प्रयास न करें.इस तरह के कर्म के दो फल होते हैं. आप दरिद्रता को प्राप्त करते हैं या मृत्यु को. कथा व्यास ने कहा कि ईश्वर पर विश्वास, भक्ति, माता-पिता और गुरुजनों की सेवा ही जीवन का सार है. जो भी प्राप्त है, उसे पर्याप्त मानकर संतोषपूर्वक जीवन जीना चाहिए. मनुष्य जन्म दुर्लभ है, इसलिए इसे परमार्थ और मोक्ष प्राप्ति में लगाना चाहिए. अंतिम दिन भगवान शिव एवं उनके गणों की जीवंत झांकी प्रस्तुत की गयी. आयोजन समिति ने सभी श्रद्धालुओं के लिए भंडारे की व्यवस्था भी की. गुरुवार को हवन, पूजन और कलश विसर्जन यात्रा के साथ कथा का समापन होगा.

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