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झारखंड की इस पहाड़ी पर हुई थी सभ्यता की पहली सुबह, पाषाण युग के रहस्यों की खोज में लगे पंडित अनूप वाजपेयी का दावा

Updated at : 08 Dec 2025 5:45 PM (IST)
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Dawn of Civilization Rajmahal Hills Sahibganj Jharkhand

पत्थर से बने औजार का सबसे बड़ा संग्रह है पंडित अनूप कुमार वाजपेयी के पास. फोटो : प्रभात खबर

Dawn of Civilization: पंडित अनूप कुमार वाजपेयी कहते हैं कि इस धरती के भीतर अभी भी वह इतिहास सोया है, जो मानवता के आरंभ की कथा कहता है. पंडित वाजपेयी को उनके कार्यों के लिए कई पुरस्कार और उपाधियां मिलीं हैं. उनकी सादगी और ज्ञान का संगम उन्हें एक जीवित संस्था बनाता है. वे पत्थरों में समय का संगीत सुनते हैं, मिट्टी में सभ्यता की गंध को महसूस करते हैं और अपने लेखन से झारखंड की उस धरोहर को पुनर्जीवित कर रहे हैं.

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Dawn of Civilization| दुमका, आनंद जायसवाल : कभी-कभी किसी व्यक्ति के लिए समय ठहर जाता है. वह वर्तमान में जीते हुए भी हजारों साल पीछे चला जाता है. मिट्टी, पत्थर और जीवाश्मों में इतिहास की धड़कनें सुनने लगता है. ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं पंडित अनूप कुमार वाजपेयी. उन्होंने संताल परगना की धरती से उस प्राचीन सभ्यता के निशान खोजे, जिसके बारे में आज तक इतिहास की किताबों में कुछ नहीं लिखा गया.

‘जितनी शांत हैं राजमहल की पहाड़ियां, उतनी बोलती भी हैं’

राजमहल की पहाड़ियां जितनी शांत दिखती हैं, उतनी ही भी बोलती हैं. पत्थरों की भाषा में, जीवाश्मों की स्मृतियों में. पंडित अनूप कुमार वाजपेयी ने इन्हीं पहाड़ियों की मिट्टी में अपने जीवन का सबसे बड़ा सत्य खोजा है. अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि क्षेत्र के जीवाश्म 30 करोड़ वर्ष पुराने हैं -कार्बोनिफेरस काल के. उन्होंने चट्टानों पर मानव के पदचिह्न, हिरणों के पदचिह्न, मछलियों, पक्षियों और अन्य जीवों के जीवाश्म खोज निकाले हैं.

‘पत्थरों में भी होती है स्मृति, उन्हें पढ़ने की दृष्टि चाहिए’

वाजपेयी का दावा है कि दक्षिण अफ्रीका की तरह राजमहल की धरती पर भी पृथ्वी के आरंभिक जीवन के निशान मौजूद हैं. उनकी एक प्रसिद्ध उक्ति है -पत्थरों में भी स्मृति होती है, बस उन्हें पढ़ने की दृष्टि चाहिए. इसी दृष्टि ने उन्हें विश्व पटल पर एक खोजकर्ता के रूप में पहचान दिलायी है. पंडित वाजपेयी का अध्ययन परंपरागत इतिहास की सीमाओं को चुनौती देता है. उनका कहना है कि राजमहल क्षेत्र ही विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता का जन्मस्थान रहा है, जो सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुरानी है.

झारखंड की धरती ने मानवता को दिया आकार

उनकी प्रसिद्ध कृति ‘विश्व की प्राचीनतम सभ्यता’ में उन्होंने प्रमाणों के साथ लिखा है कि इस धरती के नीचे वह सभ्यता सोयी है, जिसने मानवता को आकार दिया. उनका यह शोध इतिहास के पुनर्लेखन की दिशा में एक नये अध्याय की शुरुआत करता है.

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ज्ञान और संस्कार की परंपरा से जन्मा एक शोधक मन

2 नवंबर 1963 को गोड्डा जिले के बंदनवार गांव में जन्मे पंडित अनूप कुमार वाजपेयी के भीतर का शोधक मन किसी प्रयोगशाला में नहीं, बल्कि संस्कारों की पाठशाला में पला. उनके पिता प्रेम कुमार वाजपेयी सरकारी सेवा में रहे. अध्यवसाय और अनुशासन उनकी सबसे बड़ी विरासत थी. माता रुक्मणि देवी ने उन्हें अध्ययन, जिज्ञासा और सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया. दादा पंडित लक्ष्मीकांत वाजपेयी शिक्षाविद् थे और परदादा पंडित रामचरण वाजपेयी (काव्यतीर्थ) साहित्य के आकाश में एक दीप्त नक्षत्र. ऐसे परिवेश में पले वाजपेयी के लिए लेखन, अध्ययन और खोज एक सहज प्रवृत्ति बन गयी. उन्होंने न केवल इतिहास पढ़ा, बल्कि इतिहास को मिट्टी में टटोला, पत्थरों पर लिखा और पुस्तकों में सहेजा.

संस्कृति, समाज और भाषा के दस्तावेज सहेज रहे अनूप

पंडित वाजपेयी का लेखन सिर्फ पुरातत्व तक सीमित नहीं है. वे समाज, संस्कृति, लोक और भाषा के भी सजग इतिहासकार हैं. पहाड़िया और अन्य क्षेत्रीय समुदायों की जीवन-पद्धति, परंपराओं और आस्थाओं पर उनका शोध अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है. उनकी कृति ‘पूर्वी भारत के पहाड़िया’ में उन्होंने इस जनजाति की सांस्कृतिक अस्मिता को इतिहास की धारा में स्थान दिलाया. हिंदी और अंगिका, दोनों भाषाओं में उनका लेखन गहरी बौद्धिकता और लोक-संवेदना से भरा है.

स्नातकोत्तर में पढ़ायी जाती हैं वाजपेयी की कई किताबें

उन्होंने ‘भारतीय लोक देवता कोश’, ‘पूर्वी भारत के दुमका जिला की धार्मिक-सांस्कृतिक-पुरातात्विक झलक’ और ‘राजमहल’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा को अभिलेखों में दर्ज किया है. उनकी कई पुस्तकें इतिहास, संस्कृत के अलावा स्नातकोत्तर के कई अन्य विषयों की पाठ्यपुस्तक के रूप में शामिल हैं.

इतिहास ही नहीं, धर्म और आध्यात्मिक परंपराओं के वैज्ञानिक अध्ययन पर भी केंद्रित है वाजपेयी का अध्ययन

इतिहास के साथ-साथ पंडित वाजपेयी का ध्यान धर्म और आध्यात्मिक परंपराओं के वैज्ञानिक अध्ययन पर भी केंद्रित है. उन्होंने देवघर के बैद्यनाथ मंदिर के शिखर पर स्थित कलश पर संस्कृत में अंकित अभिलेख का गहन अध्ययन किया और प्रमाणित किया कि यह राजा चंद्रमौलेश्वर द्वारा विक्रम संवत् 14 (43 ईसा पूर्व) में श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन स्थापित कराया गया था. उनका कहना है कि इस मंदिर के स्थापत्य में प्राचीन सभ्यताओं की कलात्मक परंपरा के संकेत मिलते हैं.

आस्था जब इतिहास से मिलती है, तो सभ्यता का जन्म होता है

वाजपेयी का दृष्टिकोण केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भी है. वे कहते हैं – आस्था जब इतिहास से मिलती है, तभी सभ्यता जन्म लेती है. पंडित अनूप कुमार वाजपेयी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनायी है. उनका मानना है कि पत्रकारिता इतिहास की तात्कालिक धड़कन है और पुरातत्व उसकी स्थायी स्मृति. उन्होंने तत्काल और अनंत दोनों को अपने लेखन में जोड़ा. उनके लेख न केवल शोधपरक होते हैं, बल्कि पुरातात्विक व ऐतिहासिक शोधपरक भी होते हैं, जिनमें भाषा की एक लय, विचार की गहराई और साहित्यिक संवेदना होती है. उनकी लेखनी में मिट्टी की गंध और पत्थरों की पुकार एक साथ सुनाई देती है.

सभ्यता का उद्गम स्थल है राजमहल – पंडित वाजपेयी

यही कारण है कि उनका संग्रह विशाल है. सर्वाधिक पत्थर से बने औजारों की खोज करने वाले आजाद भारत के वे पहले पुरातत्वविद हैं. आज जब आधुनिकता की आंधी में परंपराएं बिखर रहीं हैं, पंडित वाजपेयी का कार्य एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण की तरह है. वे भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास का पुनर्लेखन कर रहे हैं. एक ऐसा इतिहास, जो केवल विजेताओं का नहीं, बल्कि मिट्टी, जनजातियों और लोककथाओं का भी है. उनकी दृष्टि में झारखंड केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सभ्यता का उद्गम-स्थल है.

झारखंड की धरती में सोया है मानवता की कथा कहने वाला इतिहास – अनूप कुमार वाजपेयी

उनका मानना है कि इस धरती के भीतर अभी भी वह इतिहास सोया है, जो मानवता के आरंभ की कथा कहता है. पंडित वाजपेयी को उनके कार्यों के लिए कई पुरस्कार और उपाधियां मिलीं हैं. उनकी सादगी और ज्ञान का संगम उन्हें एक जीवित संस्था बनाता है. वे पत्थरों में समय का संगीत सुनते हैं, मिट्टी में सभ्यता की गंध को महसूस करते हैं और अपने लेखन से झारखंड की उस धरोहर को पुनर्जीवित कर रहे हैं, जो दुनिया को यह बताती है कि सभ्यता की पहली सुबह यहीं हुई थी. सभ्यता के उदय की पहली किरण राजमहल की पहाड़ियों पर प्रस्फुटित हुई थी.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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