'हमें हमारा गणेश लौटा दें', तारातला हादसे में जान गंवाने वाले मजदूर का शव पहुंचा धनबाद

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धनबाद के सालूकचापड़ा गांव में मजदूर गणेश कालिंदी के घर पर मौजूद लोग. फोटो: प्रभात खबर

Dhanbad News: कोलकाता के तारातला गोदाम हादसे में जान गंवाने वाले धनबाद के मजदूर गणेश कालिंदी का शव सालूकचापड़ा गांव पहुंचते ही मातम छा गया. परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल रहा. चश्मदीद साथियों ने हादसे की दर्दनाक कहानी सुनाई, जबकि स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने हरसंभव सहायता का भरोसा दिया.

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निरसा से अरिंदम चक्रवर्ती की रिपोर्ट

Dhanbad News: पश्चिम बंगाल के कोलकाता स्थित तारातला में निर्माणाधीन गोदाम ढहने की दुर्घटना में जान गंवाने वाले धनबाद के मजदूर गणेश कालिंदी का शव शुक्रवार सुबह उनके पैतृक गांव सालूकचापड़ा पहुंचा. शव गांव पहुंचते ही पूरे इलाके में शोक की लहर दौड़ गई. परिजनों की चीख-पुकार और ग्रामीणों की नम आंखों ने हर किसी को भावुक कर दिया. गणेश का अंतिम संस्कार गांव के समीप स्थित श्मशान घाट में किया गया.

शव पहुंचते ही फूट पड़ा परिजनों का दर्द

गणेश कालिंदी का शव लेकर उनके जीजा शिवनाथ बाध्यकर और भांजा गौतम बाध्यकर कोलकाता से गांव पहुंचे. शव देखते ही परिवार के लोग उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगे. घर में हर ओर सिर्फ एक ही आवाज सुनाई दे रही थी, “हमें मुआवजा नहीं चाहिए, हमारा गणेश वापस लौटा दो.” परिजनों का विलाप सुनकर वहां मौजूद ग्रामीण भी अपने आंसू नहीं रोक सके. पूरे गांव में मातम का माहौल छा गया और हर किसी की आंखें नम थीं.

सिर्फ 15 दिन पहले कमाने गया था कोलकाता

परिवार के अनुसार गणेश कालिंदी महज 15 दिन पहले अपने साथियों के साथ रोजगार की तलाश में कोलकाता गया था. किसी ने भी नहीं सोचा था कि वह जिंदा लौटने के बजाय ताबूत में बंद होकर वापस आएगा. परिजनों ने कहा कि परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर करने के लिए वह घर से निकला था, लेकिन अब उसके हिस्से में सिर्फ मौत आई और परिवार के हिस्से में उसका शव.

मुआवजे की घोषणा पर जताया आभार

हादसे के बाद पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से मुआवजे की घोषणा किए जाने पर परिजनों और ग्रामीणों ने सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि किसी अपने की कमी को कोई मुआवजा पूरा नहीं कर सकता. परिवार के लोगों का कहना था कि पैसे से उनका दर्द कम नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने अपने घर का कमाने वाला सदस्य खो दिया है.

विधायक ने हरसंभव मदद का दिया भरोसा

घटना की सूचना मिलते ही निरसा विधायक अरूप चटर्जी, जिला परिषद सदस्य बादल बाउरी, पंचायत प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में ग्रामीण गणेश के घर पहुंचे. विधायक अरूप चटर्जी ने शोकाकुल परिवार को सांत्वना देते हुए हरसंभव सहयोग का भरोसा दिया. उन्होंने गणेश की बेटी मोमिता समेत परिवार के बच्चों की पढ़ाई में मदद करने का आश्वासन भी दिया. वहीं सामाजिक कार्यकर्ता सरस्वती गोराई ने भी परिवार की सहायता करने की बात कही.

पत्नी और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल

गणेश कालिंदी अपने पीछे पत्नी लक्खी कालिंदी, बेटियां मोमिता, निकिता और रितिका तथा पुत्र जगरनाथ को छोड़ गए हैं. इसके अलावा बड़े भाई बामापद कालिंदी, भाभी करुणा बाध्यकर और वृद्ध माता-पिता का भी रो-रोकर बुरा हाल था. परिवार के लोग खुद को पूरी तरह बेसहारा महसूस कर रहे थे. गांव की महिलाएं परिजनों को ढांढस बंधाने का प्रयास करती रहीं, लेकिन घर का माहौल बेहद गमगीन बना रहा.

चश्मदीद साथियों ने सुनाई हादसे की पूरी कहानी

गणेश के साथ काम करने वाले मजदूर राजू बाध्यकर और विजय बाध्यकर ने हादसे की भयावह कहानी सुनाई. उन्होंने बताया कि बुधवार दोपहर करीब 12 बजे सभी मजदूर काम खत्म करने के बाद हाथ-पैर धोकर गुटखा खाने के लिए बाहर निकले थे. इसी दौरान गणेश अपने कपड़े लेने के लिए निर्माणाधीन भवन की दूसरी मंजिल पर चला गया. तभी अचानक पूरी इमारत भरभराकर गिर गई और वह मलबे के नीचे दब गया.

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पांच घंटे तक फोन पर बचाने की गुहार लगाता रहा गणेश

राजू और विजय ने बताया कि भवन गिरने के बाद भी गणेश कुछ समय तक जीवित था और मलबे के नीचे से फोन पर उनसे लगातार संपर्क में था. उन्होंने बताया कि करीब पांच घंटे तक गणेश उनसे बात करता रहा और बार-बार सिर्फ एक ही बात कहता रहा, “भाई… किसी भी हालत में मुझे बचा लो.” साथियों ने बताया कि वे लगातार राहत और बचाव दल से उसे जल्द निकालने की गुहार लगाते रहे, लेकिन भारी मलबे और कठिन परिस्थितियों के कारण समय पर उसे बाहर नहीं निकाला जा सका. अंततः उसकी मौत हो गई. गणेश कालिंदी की मौत ने न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे सालूकचापड़ा गांव को गहरे सदमे में डाल दिया है. अंतिम संस्कार के दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे और नम आंखों से उन्हें अंतिम विदाई दी.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

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कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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