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दवा नहीं, नाम है जन औषधि केंद्र

प्रधानमंत्री के रुचि लेने के बाद स्थिति में सुधार की उम्मीद धनबाद : धनबाद का एकमात्र जेनरिक दवा केंद्र बदहाल है. वर्ष 2012 में पीएमसीएच में खोले गये इस केंद्र में कभी भी पर्याप्त दवा नहीं रही. जेनरिक दवा को लेकर पीएमसीच के डॉक्टरों ने भी कोई रुचि नहीं दिखायी. अब प्रधानमंत्री ने जन औषधि […]

प्रधानमंत्री के रुचि लेने के बाद स्थिति में सुधार की उम्मीद
धनबाद : धनबाद का एकमात्र जेनरिक दवा केंद्र बदहाल है. वर्ष 2012 में पीएमसीएच में खोले गये इस केंद्र में कभी भी पर्याप्त दवा नहीं रही. जेनरिक दवा को लेकर पीएमसीच के डॉक्टरों ने भी कोई रुचि नहीं दिखायी. अब प्रधानमंत्री ने जन औषधि केंद्र को लेकर रुचि दिखायी है. इसे परियोजना के तौर पर केंद्र सरकार ने चलाने की घोषणा की है. केंद्र का नाम बदलकर प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्र रखा गया है. सरकार इसके लिए कानून बना रही है. अब देखना है कि गरीबों को सस्ते दर पर दवाएं मुहैया का लाभ कितना मिल पाता है.
375 में से मात्र छह दवा : पीएमसीएच के केंद्र में 375 की जगह मात्र छह प्रकार की दवाएं ही बची हैं. कुछ दवाएं एक्सपायरी भी हो गयी थी. यहां के कुछ डॉक्टर ही जेनरिक दवा मरीजों को लिखते थे. इस कारण जेनरिक दवा का लाभ आम लोगों को नहीं मिल पा रहा था. मजबूरी में गरीबों को ब्रांडेड दवाएं लेनी पड़ रही थी, इसके उन्हें काफी आर्थिक परेशानी होती थी.
फार्मासिस्ट के कारण वापस हो गये थे 50 आवेदन : वर्ष 2015-16 में धनबाद में जेनरिक दवा की दुकानें खोलनी थी, इसके लिए ड्रग कार्यालय ने लाइसेंस के लिए आवेदन लेना शुरू किया था. इस दौरान दुकानों में फार्मासिस्ट का होना अनिवार्य बताया गया. इसके बाद आवेदन देने वाले लोग पीछे हट गये. लोगों ने आवेदन वापस ले लिया. अब नयी सरकार ने प्रखंडों में केंद्रों को खोलने की घोषणा की है, लेकिन फाॅर्मासिस्ट की अनिवार्यता को लेकर फिर मामला फंस सकता है.
जानें जेनरिक व ब्रांडेड दवाओं को : जेनरिक दवाइयां ब्रांडेड दवाइयों की तुलना में औसतन पांच गुना सस्ती होती है. जेनेरिक दवाएं उत्पादक से सीधे रिटेलर तक पहुंचती हैं. इन दवाओं के प्रचार-प्रसार पर कंपनियों को कुछ खर्च नहीं करना पड़ता. एक ही कंपनी की ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के मूल्य में काफी अंतर होता है. चूंकि जेनेरिक दवाओं के मूल्य निर्धारण पर सरकारी अंकुश होता है, इसलिए वे सस्ती होती हैं. जबकि ब्रांडेड दवाओं की कीमत कंपनियां खुद तय करती हैं, इसलिए वह महंगी होती हैं. कमीशन के लिए ब्रांडेड दवाओंको ही डॉक्टर अधिकांश लिखते हैं.
ब्रांडेड का आर्थिक बोझ : एक मरीज को डायबिटीज, ब्लड प्रेशर एवं गैस की समस्या है और डॉक्टर ब्रांडेड दवा लिखता है, तो मेटफार्मिन पर उसे 48 रुपये, टेल्मीसार्टन पर 95 एवं गैस की दवा पेंटेप्राजोल पर 348 रुपये खर्च करने पड़ेंगे. एक माह की दवा पर 591 रुपये का खर्च. इसी की जेनरिक दवा लेने पर मेटफार्मिन के िलए 21 रुपये, टेल्मीसार्टन 42 एवं पेंटेप्राजोल पर 30 रुपये खर्च होता है. यानी मात्र 93 रुपये का खर्च आता है.
Prabhat Khabar Digital Desk
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