धनबाद : कभी राजनीति के केंद्र बिंदु थे आज एकाकी जीवन जी रहे एके राय

संजीव झा धनबाद : मार्क्सवादी समन्वय समिति (मासस) के संस्थापक एवं पूर्व सांसद एके राय एक समय कोयलांचल की राजनीति के केंद्र बिंदु थे. बीमारी के कारण अब एकाकी जीवन जी रहे हैं. हालांकि, बीमारी व तमाम परेशानियों के बाद भी उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया. सिंदरी से तीन बार विधायक तथा […]
संजीव झा
धनबाद : मार्क्सवादी समन्वय समिति (मासस) के संस्थापक एवं पूर्व सांसद एके राय एक समय कोयलांचल की राजनीति के केंद्र बिंदु थे. बीमारी के कारण अब एकाकी जीवन जी रहे हैं. हालांकि, बीमारी व तमाम परेशानियों के बाद भी उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया.
सिंदरी से तीन बार विधायक तथा धनबाद से तीन बार सांसद रह चुके एके राय के एक आवाज पर हजारों की भीड़ जुट जाती थी. उनके जुलूस से धनबाद में ट्रैफिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो जाती थी. वर्ष 1977 से लेकर 2009 के बीच हुए 10 लोकसभा चुनाव में श्री राय प्रत्याशी रहे. तीन बार जीते. हर बार चुनाव में वे लड़ाई में रहे. हालांकि, 1991 से 2009 तक लगातार छह बार चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा.
मतों में कमी आयी. इसके बाद स्वास्थ्य कारणों से राजनीति की मुख्यधारा से अलग हो गये. बीमार पड़ने के बाद कुछ दिनों तक टेंपल रोड स्थित पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में रहे. उसके बाद नुनुडीह (पाथरडीह) स्थित पार्टी के पुराने कैडर सबुर गोराईं के घर चले गये. पिछले एक दशक से श्री गोराईं के घर पर ही रह रहे हैं. यहां उनकी सेवा पार्टी के कैडर ही कर रहे हैं.
बोल नहीं पाते, लेकिन पढ़ते हैं
श्री राय स्वास्थ्य कारणों से बोलने व चलने में लाचार हैं. लेकिन, पढ़ने की आदत बनी हुई है. उनकी देखभाल करने वाले श्री गाराईं कहते हैं कि आज भी श्री राय कई अखबार व कुछ मैगजीन पढ़ते हैं. कटिंग भी करवाते हैं.
उनका भोजन से लेकर नित्य कर्म तक ललिता हाड़ीन कराती हैं. इस सेवा के पीछे क्या उद्देश्य है, के जवाब में कहती हैं जिन्होंने (श्री राय ने) अपना पूरा जीवन समाज को दे दिया. अपनी पेंशन तक नहीं ली. वैसे व्यक्ति की सेवा नहीं करेंगे, तो कोई फिर देश व समाज के लिए नहीं काम करेगा. एक फल विक्रेता अपनी तरफ से रोज फल भी देता है.
परिवार के सदस्य भी आते हैं मिलने
श्री गोराईं के अनुसार पूर्व सांसद से मिलने उनके भाई-बहन बीच-बीच में आते हैं. साथ ही निरसा के विधायक अरूप चटर्जी, झरिया के ललित शर्मा, मीराजुद्दीन भी नियमित रूप से उनके लिए कुछ सहयोग करते हैं. इस स्थिति में भी श्री राय कोई सरकारी सहायता लेना नहीं चाहते. अपनी पेंशन तक नहीं लेते.
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