भूमिगत कोयला खदान में जल्द दौड़ेगी मोनो रेल, 1200 करोड़ रुपये खर्च कर रही है कोल इंडिया

By Prabhat Khabar Digital Desk
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संजय रवानी

पुटकी: कोयला के लिए मशहूर झारखंड के धनबाद जिला के झरिया स्थित भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) के भूमिगत खदान में जल्द ही मोनो रेल दौड़ेगी. पहली मोनो रेल वेस्टर्न झरिया एरिया अंतर्गत मुनीडीह के शास्त्रीनगर में इंदु आउटसोर्सिंग कंपनी द्वारा संचालित भूमिगत खदान के 15 नंबर सीम में चलेगी. इसका इस्तेमाल कर्मियों एवं सामग्री के परिहवन के लिए होगा.

भूमिगत कोयला खदान में जल्द दौड़ेगी मोनो रेल, 1200 करोड़ रुपये खर्च कर रही है कोल इंडिया

डीजल इंजन से चलने वाली मोनो रेल के इस्तेमाल से लोगों की उत्पादकता बढ़ेगी. समय की भी बचत होगी. देश में अपनी तरह की यह पहली अत्याधुनिक एवं सुरक्षित तकनीक मुनीडीह खदान में लगायी जा रही है. अभी यह तकनीक ट्रायल के दौर में है. चेक-गणराज्य की कंपनी FERRIT LTDने मोनो रेल की सप्लाई की है.

भूमिगत कोयला खदान में जल्द दौड़ेगी मोनो रेल, 1200 करोड़ रुपये खर्च कर रही है कोल इंडिया

वर्तमान में 250 मीटर तक इसका परीक्षण किया गया है. खदान के अंदर 10 किलोमीटर लंबी मोनो रेल चलाने की योजना है. इसकेजरिये 30 टन तक वजनी Powered Support को सतह से खदान के अंदर Long Wall Face तक ले जाया जा सकेगा. कोल इंडिया एवं भारत कोकिंग कोल लिमिटेड की महत्वाकांक्षी मुनीडीह 15 नंबर सीम परियोजना से प्रतिवर्ष 2.5 मिलियन टन उत्पादन कालक्ष्य है.

ट्रायल सफल, टू-इन-वन वे सेवा

बीसीसीएल के वेस्टर्न झरिया एरिया के जीएम जेएस महापात्रा ने कहा कि मुनीडीह खदान में मोनो रेल का ट्रायल सफल रहा है. दो साल के भीतर हर हाल में पूरे खदान में इसे चालू कर दिया जायेगा. यह टू इन वन होगा. इसी रास्ते से मोनोरेल से कामगार खदान में उतरेंगे और इसी रास्ते ट्रॉली से कोयला भी बाहर निकालेजायेंगे.

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सुरक्षा सर्टिफिकेट का इंतजार

अगर डीजीएमएस से मोनो रेल को लेकर सुरक्षा का सर्टिफिकेट मिल जाता है, तो पूरे देश के लिए यह एेतिहासिक परियोजना होगी. इसका आने वाले समय में कोयलांचल समेत पूरे देश को लाभ मिलता रहेगा.

1200 करोड़ रुपये की परियोजना

इसपरियोजनापर 1200 करोड़ रुपये की लागत आयेगी. मोनो रेल परियोजना के अधिकारी विजय गुप्ता ने कहा कि प्रोजेक्ट पूरा होने में दो साल लगेंगे. इसी रास्ते से बड़ी ट्रॉली से कोयला भी निकाला जायेगा. देश में यह व्यवस्था सबसे पहले झरिया में शुरू हो रही है. अगले वित्तीय वर्ष में कोल इंडिया की अन्य इकाइयों में भी यह योजना शुरू होगी.

खदान में सीढ़ियों से उतरना है बेहद खतरनाक

कोयला खदानों में उतरना इस समय बहुत खतरनाक है. कामगार सिर पर टोपी और लाइट, हाथ में डंडा और पीठ पर बैटरी बांधकर सीढ़ियों के सहारे भूमिगत खदान में उतरते हैं. कामगारों को कम से कम तीन किलोमीटर तक इसी तरह अंदर जाना पड़ता है और बाहर निकलना पड़ता है. कई खदानोंमें तो पांच-पांच किलोमीटर तक जाना पड़ता है. पानी रिसने से फिसलन का डर बना रहता है,सो अलग. मोनोरेल की इस योजना से मजदूरों में खुशी है, तो स्थानीय लोग इसमें रोजगार की संभावनादेखरहे हैं.

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