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अपार्टमेंट में गुम हुआ बचपन

धनबाद : बदलते समय ने काफी कुछ बदल दिया है. सोच में बदलाव आया है. पहले लोग संयुक्त परिवार में रहते थे, लेकिन बदलते परिवेश में संयुक्त की जगह एकल परिवार का चलन ला दिया है. अब तो अपार्टमेंट कल्चर में बच्चों का मानसिक विकास तो हो रहा है, लेकिन शारीरिक विकास कहीं-न-कहीं बाधित हो […]

धनबाद : बदलते समय ने काफी कुछ बदल दिया है. सोच में बदलाव आया है. पहले लोग संयुक्त परिवार में रहते थे, लेकिन बदलते परिवेश में संयुक्त की जगह एकल परिवार का चलन ला दिया है. अब तो अपार्टमेंट कल्चर में बच्चों का मानसिक विकास तो हो रहा है, लेकिन शारीरिक विकास कहीं-न-कहीं बाधित हो रहा है. इसका कारण है बच्चों के लिए प्ले ग्राउंड न होना.

अपार्टमेंट के बच्चे कार्टून चैनल या इनडोर गेम में व्यस्त रहते हैं. जब हमने बच्चों से जानना चाहा क्या उन्हें आउटडोर गेम पसंद नहीं तो उनका जवाब था कहां खेलें. ग्राउंड है नहीं, बेसमेंट में गाड़ियां लगी रहती हैं. छत पर पेरेंट्स जाने नहीं देते. हमें मोबाइल में गेम या इनडोर गेम खेलना पड़ता है. अपार्टमेंट कल्चर में बच्चों की मासूमियत खो गयी है.

अब कबड्डी, एक पतंग कौन सा रंग, चोर-सिपाही, डेंगा-पानी जैसे खेलों के साथ-साथ अपार्टमेंट कल्चर में बच्चों का बचपन भी गुम हो गया है. प्रभात खबर ने कोयलांचल के कुछ अपार्टमेंट में रहनेवाले बच्चों और उनकी माताआें से बात की. मौजूदा स्थिति से कोई खुश नहीं. वे बदलाव के पक्षधर हैं.

बेसमेंट में गाड़ियां, छत पर जाने की मनाही
कहते हैं बच्चे
मुझे आउट डोर गेम खेलना पसंद है. स्कूल के प्ले ग्राउंड में गेम पीरियड में दोस्तों के साथ मस्ती करता हूं, लेकिन शाम में अपार्टमेंट के फ्लैट घर में कैद हो जाता हूं. कार्टून चैनल या मोबाइल गेम में समय बीतता है.
वैभव, अंपायर बिल्डिंग
हम बच्चों के खेलने के लिए अपार्टमेंट में कोई जगह नहीं है. बेसमेंट में खेल नहीं सकते, छत पर जाने को नहीं मिलता. घर में कौन सा गेम खेलें. हमें दोस्तों के साथ छूआ छुई, कबड्डी खेलना अच्छा लगता है.
कुमारी तनिष्का, गुप्तेश्वर अपार्टमेंट बेकारबांध
शाम में हमें ग्राउंड में खेलने का मन करता है. अपार्टमेंट में कैसे खेलें. बेसमेंट में गाड़ियां खड़ी रहती हैं. जगह नहीं रहता या गाड़ी के शीशा टूटने का डर रहता है. छत पर शोर होने से दूसरे को परेशानी होती है.
अर्थ केजरीवाल, सिद्धि विनायक निवास शास्त्रीनगर
इनडोर गेम में मजा नहीं आता. अपार्टमेंट में खेलने की जगह नहीं है. कार्टून चैनल देख बोर हो गये हैं. घर में कितना खेलें. स्कूल के ग्राउंड में खेल कर मजा आता है. अपार्टमेंट में प्ले ग्राउंड क्यों नहीं होता.
हर्ष मोदी, शांति भवन बैंक मोड़
कहती हैं मांएं
बच्चों को टीवी से चिपके देख मन दुखी होता है. मना करने पर कहते हैं क्या करें. अपार्टमेंट में बचपन एक तरह से कैद हो जा रहा है. बच्चों को खेलने के लिए जगह होना चाहिए.
रूबी, अंपायर बिल्डिंग टेलीफोन एक्सचेंज रोड
मेरी बिटिया शाम में बहुत अकेली हो जाती है. अपार्टमेंट के बगल वाले घर के पास बच्चों को खेलते देख उसका मन खेलने का होता है, लेकिन अपार्टमेंट में खेलने की कोई जगह नहीं है.
रिंकू चौरसिया, गुप्तेश्वर अपार्टमेंट बेकारबांध
मेरे दो आैर देवरानी के दो बच्चे हैं. चारों बच्चे घर में ही खेल लेते हैं. बच्चों की डिमांड प्ले ग्राउंड की होती है. बेसमेंट में बच्चे खेल नहीं सकते. छत पर भेजने में डर बना रहता है. बच्चों का बचपन छिनता जा रहा है.
श्वेता, सिद्धि विनायक निवास शास्त्रीनगर
खेलने के समय में बच्चे परेशान हो जाते हैं. क्या करें. खेलने की जगह बची कहां है. खाली पड़े जमीन में अपार्टमेंट बनते जा रहे है. आउट डोर गेम नहीं होने के कारण बच्चों का शारीरिक विकास सही से नहीं हो पा रहा है.
बिंदिया मोदी, शांति भवन बैंकमोड़
Prabhat Khabar Digital Desk
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यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

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