One Two Cha Cha Chaa: बिहारी का प्रेम उसकी मूल प्रकृति है. यहां के लोग जब प्रेम करते हैं तो पूरी निष्ठा के साथ करते हैं. जीवन भर के लिए, जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी. लेकिन बिहारी से प्रेम करवा लेना आसान नहीं होता. यह बातें एक्शन-कॉमेडी फिल्म ‘वन टू चा चा चा’ के प्रमोशन के सिलसिले में प्रभात खबर कार्यालय पहुंचे अभिनेता आशुतोष राणा बोल रहे थे. उन्होंने ‘बिहार’ शब्द का अर्थ ही भ्रमण बताया. कहा ऐसा भ्रमण, जहां मन के भ्रम का भी निवारण हो जाए. यह समस्याओं के समाधान की भूमि है, जहां लोग कठिन परिस्थितियों में भी शांतचित्त रहना जानते हैं. साथ ही, देश के किसी भी हिस्से में डिजिटल मीडिया पर जितने कंटेंट हैं, 40 फीसदी हिस्सा बिहार का है.
प्रोमोशन में हर्ष मायर, अनंत जोशी, ललित प्रभाकर, अशोक पाठक व नायरा बनर्जी भी पहुंचे थे.नायरा बनर्जी ने बताया कि वह फिल्म में एक गांव-गांव घूमकर नाचने वाली परफॉर्मर के किरदार में नजर आएंगी, जिनके ठुमकों की चर्चा दूर-दूर तक है. लोग उन्हें देखने उमड़पड़ते हैं और मजाक में कहा जाता है कि उन्हें देखकर 440 वोल्ट का झटका लग जाता है. पढ़ें उनके साथ बातचीत के अंश..
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Q. फिल्मों में बिहारी किरदार को आप किस तरह ढालते हैं?
आशुतोष राणा: आज डिजिटल मीडिया पर जितना कंटेंट है, उसका बड़ा हिस्सा बिहार से जुड़ा हुआ है. ऐसे में यहां की संस्कृति, बोली और जीवनशैली को समझना किसी भी अभिनेता के लिए कठिन नहीं है. बिहार की भाषा में गमक है, मिठास है, खुशबू है. यहां के लोगों की सहजता और सरलता बहुत आकर्षक है. टीवी और सोशल मीडिया पर जिन चेहरों की सबसे ज्यादा चर्चा होती है, उनमें बड़ी संख्या बिहार से जुड़े लोगों की होती है. यही सब देखकर, सुनकर और महसूस कर अभिनेता अपने किरदार को गढ़ता है.
Q. साहित्य और अभिनय के बीच आप किस तरह संतुलन बनाते हैं?
आशुतोष राणा: मेरे लिए साहित्य और अभिनय एक-दूसरे के पूरक हैं. स्वानुभूति को संसार की अनुभूति बनाना साहित्य है और संसार की अनुभूति को स्वानुभूति बनाकर प्रस्तुत करना अभिनय. एक यात्रा ‘स्व’ से संसार की है और दूसरी संसार से ‘स्व’की. लेकिन दोनों में ही मूल तत्व अभिव्यक्ति है. कभी हम किताबों के माध्यम से बोलते हैं, कभी कविता से, कभी सिनेमा से और कभी संवाद के ज़रिये. मनुष्य की पूरी यात्रा अभिव्यक्ति की यात्रा है.
Q. आज के युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?
आशुतोष राणा: समय के क्षण का, अन्न के कण का, धन के पण का और स्वयं के प्रण का आदर करना चाहिए. जो इनका सम्मान नहीं करता, समय भी उसका सम्मान नहीं करता. इसलिए समय को पहचानिए, समय को पकड़िए और उसका सदुपयोग कीजिए.
Q. कोई प्रेरणादायक पंक्ति या शेर जो आप साझा करना चाहें?
आशुतोष राणा: कविता नहीं, लेकिन एक शेर जरूर कहूंगा, जो आज के समय पर बिल्कुल फिट बैठता है.
ढूंढिए मत आदमी में आदमी सौ फीसदी, क्योंकि जब चलता है सिक्का कुछ न कुछ घिसता तो है. गम न कीजे जो नहीं है घर तलक पक्की सड़क, धूल-मिट्टी से सना जैसा भी है रस्ता तो है.
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Q. आप कॉमेडी फिल्म ‘वन टू चा चा चा’ के प्रमोशन के सिलसिले में पटना आई हैं. इस फिल्म को लेकर आपका उत्साह कितना है?
नायरा बनर्जी: मैं इस फिल्म को लेकर बेहद उत्साहित हूं. वन टू चा चा चा एक हल्की-फुल्की, मस्ती से भरपूर कॉमेडी है, जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ एक अलग तरह की एनर्जी भी है. पटना आकर दर्शकों से मिलना मेरे लिए खास है, क्योंकि यहां के लोग सिनेमा को दिल से अपनाते हैं. मुझे उम्मीद है कि यह फिल्म दर्शकों को रोजमर्रा की भागदौड़ से निकालकर हंसी और खुशी के पल देगी.
Q. आप टीवी की तुलना में फिल्मों और वेब सीरीज की गति को ज्यादा पसंद करती हैं. वन टू चा चा चा ने आपको कैसे आकर्षित किया?
नायरा बनर्जी: हां, क्योंकि टीवी में कलाकार रोज दर्शकों के सामने होते हैं और वहां कहानी की रफ्तार बहुत तेज होती है. फिल्मों में किरदार को समझने और उसे जीने का समय मिलता है. वन टू चा चा चा ने मुझे इसलिए आकर्षित किया क्योंकि इसमें कॉमेडी के साथ-साथ किरदार की परतें भी हैं. इसमें केवल हंसाना ही मकसद नहीं है, बल्कि दर्शकों से एक जुड़ाव भी बनता है, और यही चीज मुझे सबसे ज्यादा पसंद आई.
Q. आपने ग्लैमर से हटकर भी कई प्रोजेक्ट्स किए हैं, जैसे बिना मेकअप काम करना. क्या ऐसे रोल आपको ज़्यादा संतुष्टि देते हैं?
नायरा बनर्जी:बिल्कुल. एक कलाकार के रूप में मैं हमेशा ऐसे किरदार करना चाहती हूं जो मुझे अंदर से चुनौती दें. जब आप बिना मेकअप या ग्लैमर के किसी किरदार को निभाते हैं, तो पूरा फोकस भावनाओं और सच्चाई पर होता है. ऐसे रोल मुझे खुद को बेहतर कलाकार के रूप में समझने का मौका देते हैं. मेरे लिए अभिनय सिर्फ खूबसूरत दिखना नहीं, बल्कि ईमानदारी से किरदार को जीना है.
Q. आपने फिल्मों से करियर शुरू किया, लेकिन टीवी ने आपको बड़ी पहचान दिलाई. इस सफर को आप कैसे देखती हैं?
नायरा बनर्जी: टीवी ने मुझे सीधे दर्शकों से जोड़दिया. फिल्मों में पहचान मिलने में वक्त लगता है, जबकि टीवी आपके किरदार को घर-घर तक पहुंचा देता है. दिव्य दृष्टि जैसे शो ने मुझे बहुत प्यार दिलाया. मैं मानती हूं कि हर माध्यम की अपनी अहमियत है और अगर कलाकार दिल से काम करे, तो हर प्लेटफॉर्म उसे आगे बढ़ने का मौका देता है.
Q. आखिर में, पटना के दर्शकों के लिए आपका क्या संदेश है?
नायरा बनर्जी: पटना के दर्शकों का प्यार और अपनापन हमेशा खास रहा है. मैं यही कहना चाहूंगी कि वन टू चा चा चा जरूर देखें और हंसी के इस सफर का हिस्सा बनें. आपका प्यार ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है.
फिल्म ‘वन टू चा चा चा’ के स्टारकास्ट ने क्या कहा?
हर्ष मायर: इस फिल्म में मैं भतीजा का रोल निभा रहा हूं. इसमें चाचा जी ने जो उलट-पलट किया है, उसे समेटने में मैं भी लगा हूं. आशुतोष सर व अभिमन्यु सर और बाकी वरिष्ठ कलाकारों के साथ काम करना बहुत सीखने वाला अनुभव रहा. सेट पर उनका अनुशासन, तैयारी और किरदार में डूबने का तरीका हर कलाकार के लिए प्रेरणा है. उनके साथ काम करके मैं खुद को और बेहतर महसूस कर रहा हूं.
अनंत जोशी: मुझे वैसी फिल्में करना बहुत पसंद है, जिसे पूरा परिवार एक साथ बैठकर देख सकें व हंस सकें. मैं बहुत खुश हूं कि इस फिल्म को पूरा परिवार थिएटर में एक साथ देख सकेंगे. वहीं, बीच में मत टोक्यो.., को लेकर कहा कि यह फिल्म का एक मजेदार संवाद है. यह स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं था. शूटिंग के दौरान जब चाचा (आशुतोष) ने अपने भतीजे सड्डा (अनंत) को टोक्यो जाने का इंतजाम करने को कहा और भतीजे ने हैरानी से ‘टोक्यो’ दोहराया, तब आशुतोष के मुंह से अचानक यह लाइन निकल पड़ी. बीच में मत टोक्यो.., यह दर्शकों के बीच काफी पॉपुलर हो रहे हैं.
ललित प्रभाकर: अपने अनुभव साझा करते हुए ललित प्रभाकर ने कहा कि ‘वन टू चा चा चा’ सही मायनों में खुशनुमा पागलपन है, जहां हर सीन में अलग तरह का हास्य है. यह ऐसी कॉमेडी है, जिसमें कन्फ्यूजन ही असली हीरो है. वहीं, हमारे फिल्म के डॉयरेक्टर व प्रोड्यूशर बिहार से हैं. उनसे एक्सेंट को समझने में काफी मदद मिली. फिल्म 16 जनवरी से सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है और दर्शकों के लिए हंसी, मस्ती और पागलपन से भरा एक संपूर्ण मनोरंजन पैकेज लेकर आई है.
अशोक पाठक: फिल्म में नारकोटिक्स ऑफिसर का किरदार निभा रहा हूं.‘वन टू चा चा चा’ की सबसे बड़ी खासियत इसकी सिचुएशनल कॉमेडी है. यहां हंसी जबरदस्ती नहीं कराई गई है, बल्कि हालात ऐसे बनते हैं कि दर्शक खुद-ब-खुद हंस पड़तेहैं. किरदारों की उलझन, गलतफहमियां और तेजी से बदलती परिस्थितियां ही फिल्म की कॉमेडी की जान हैं. मैं दर्शकों का दिल से धन्यवाद करता हूं जिन्होंने ‘पंचायत’ में विनोद को इतना प्यार दिया. लेकिन, ‘वन टू चा चा चा’ में मैं यही उम्मीद करता हूं कि दर्शक मुझे एक नए किरदार और नए अंदाज में स्वीकार करें.

