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Bindiya Ke Bahubali-2: जब कहानी मजबूत होती है, तब अभिनय को चमकने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती, बोले दिब्येंदु भट्टाचार्य

Bindiya Ke Bahubali-2: वेब सीरीज बिंदिया के बाहुबली-2 के प्रमोशन के दौरान अभिनेता दिब्येंदु भट्टाचार्य ने अभिनय, थिएटर, एनएसडी और आज की ओटीटी इंडस्ट्री में कहानी की अहमियत पर खुलकर बात की. बिहार से अपने जुड़ाव, पसंदीदा व्यंजन और ‘बिदेसिया’ जैसे किरदारों को लेकर भी अनुभव साझा किया.


Bindiya Ke Bahubali-2:
वेब सीरिज बिंदिया के बाहुबली-2 के प्रोमोशन में अभिनेता दिब्येंदु भट्टाचार्य व निर्देशक राज अमित कुमार पटना पहुंचे. यह सीरिज 21 जनवरी को ओटीटी पर रिलीज हो रही है. मालूम हो कि यह सीरीज एक काल्पनिक डॉन परिवार की कहानी बताती है, जिसमें डॉन के गिरफ्तार होने के बाद उसके बेटे और भाई के बीच सत्ता के लिए संघर्ष और परिवार के अंदरूनी कलह को दिखाया गया है.

प्रभात खबर से बातचीत में अभिनेता दिब्येंदु (Dibyendu Bhattacharya) ने बताया कि सफल अभिनय और कहानी का संबंध एक नींव और इमारत जैसा है. यदि कहानी (नींव) मजबूत है, तो अभिनय की इमारत अपने आप शानदार खड़ीहोगी. पढ़ें हिमांशु देव के साथ हुई बातचीत के अंश..

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Q. आपकी अभिनय की यात्रा कैसे शुरु हुई और रंगभेद का कितना सामना करना पड़ा?
– मैंने 12वीं के बाद खुद का ग्रुप बनाया था और एक्टिंग, स्टेज क्राफ्ट, मेकअप और म्यूजिक सब खुद संभालता था. वे कहते हैं कि बचपन से ही कोलकाता में ग्रुप थिएटर जॉइन किया. 1988 में थिएटर ग्रुप से जुड़ने के बाद 1993 में उन्हें इपीटीआइ का बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिला. हम लोग थिएटर वाले हैं, हमें टपरी पर चाय पीना और स्ट्रीट फूड खाना बहुत पसंद है.

Q. सेट पर क्रांति प्रकाश व विनीत कुमार के साथ कैसा माहौल रहता था?
– विनीत कुमार के बारे में बात करें तो वे बहुत ही उत्तम कलाकार हैं. वे बाहर से कड़क लगते हैं, लेकिन अंदर से एक छोटे बच्चे जैसे हैं. एनएसडी में विनीत मेरे सीनियर थे. हमेशा सेट पर खुशनुमा मौहाल रहता था. वहीं, क्रांति उनसे बिलकुल अलग हैं. क्रांति बहुत शांत हैं और विनीत जी पूरे सेट को एंटरटेन करके रखते हैं.

Q. आप हमेशा कहते हैं कि कहानी सर्वोपरि है. इसका क्या मतलब है?
– मेरा मानना है कि अगर कहानी में दम नहीं है, तो कलाकार कुछ नहीं कर सकते. हमारी भारतीय सिनेमा परंपरा साहित्य से निकली है. प्रमुख रूप से प्रेमचंद, शरतचंद्र, रेणु जी जैसे लेखकों की कहानियों से. आज इंडस्ट्री में जल्दी-जल्दी सीजन बनाने का दबाव है, लेकिन असली मेहनत कहानी पर होनी चाहिए. मजबूत कहानी ही किसी भी प्रोजेक्ट की रीढ़ होती है.

Q. आपके अभिनय पर थिएटर और एनएसडी का कितना असर रहा है?
– बहुत गहरा असर है. मैंने 1988 से थिएटर शुरू किया था और फिर एनएसडी में प्रशिक्षण लिया. लोग कहते हैं कि थिएटर और फिल्म अभिनय अलग होते हैं, लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूं. अगर आपकी बॉडी नहीं चलेगी, तो आंखें भी नहीं बोलेंगी. थिएटर ने मुझे अनुशासन और गहराई सिखाई है.

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Q. बिहार से आपका जुड़ाव कैसा है? यहां का कोई किरदार या कहानी जो आपको पसंद हो?
– बिहार से मेरा बहुत पुराना रिश्ता है. हिंदी रंगमंच में बिहार का योगदान बहुत बड़ा रहा है. मेरे कई साथी बिहार से थे. मुझे यहां का ठेकुआ, लिट्टी-चोखा और चंपारण मटन बहुत पसंद है. मैथिली भाषा का मेरी मातृभाषा बांग्ला पर भी प्रभाव है, यह बात मुझे हमेशा आकर्षित करती है. वहीं, भिखारी ठाकुर रचित नाटक ‘बिदेसिया’ की कहानी बहुत पसंद है. मैं नाटक में ‘बटोहिया’ का किरदार भी निभाता हूं.

Q. बिहार में सब्सिडी की शुरुआत हुई है आप लोग कब आएंगे यहां?
– यह बहुत सकारात्मक कदम है. अगर यहां फिल्म सिटी बनेगी तो स्थानीय कलाकारों और रंगमंच से जुड़े लोगों को बड़ा मंच मिलेगा. मेरी भी बहुत इच्छा है कि बिहार में आकर काम करूं. यहां की मिट्टी, यहां के लोग और कहानियां बहुत समृद्ध हैं. भारत के इतिहास को आप समझ गये और बिहार को नहीं समझे तो इतिहास पढ़ने का कोई फायदा नहीं.

मुजफ्फरनगर ने लेखन और सोच को दिया आकार: निर्देशक व लेखक राज अमित कुमार ने कहा कि उनका जन्म मुजफ्फरनगर में हुआ और वहीं का माहौल उनके सोचने-समझने और लिखने की शैली को गढ़ गया. जब वे बड़े हो रहे थे, उस समय मुजफ्फरनगर दुनिया में वायलेंस के मामलों में मेक्सिको सिटी के बाद दूसरे नंबर पर था. चारों तरफ हिंसा और अपराध का माहौल था, जिसका असर उनके भीतर कहीं न कहीं दर्ज होता गया.

अमित ने कहा कि जब कोई क्रिएटर कुछ बनाता है, तो वह अपनी जिंदगी में देखी और महसूस की गई बातों से ही प्रेरणा लेता है. उन्होंने बताया कि यह शो कोविड से बहुत पहले लिखा गया था और इसके दो सीजन बनाने में जीवन का लंबा समय निकल गया.

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