देवघर: संताल परगना के छह जिले में जितने भी सीबीएसइ व आइसीएसइ स्कूल हैं, प्राय: सभी स्कूलों में हर वर्ष कमीशन के चक्कर में किताबें बदल जाती हैं. कमीशन के इस खेल में अभिभावकों का आर्थिक शोषण किया जाता है. ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी राज्य सरकार और सक्षम ऑथोरिटी को नहीं है. सरकार की नाक के नीचे करोड़ों रुपये की पुस्तक व कॉपी में कमीशन का खेल पूरे संताल में चल रहा है. अकेले देवघर में ही 25 करोड़ से अधिक का व्यवसाय हो रहा है.
सभी सीबीएसइ स्कूल नहीं चलाते एनसीइआरटी की किताबें : कई सीबीएसइ स्कूल एनसीइअारटी की किताब की जगह निजी प्रकाशकों की किताबें चलाते हैं. प्रकाशकों से लेकर पुस्तक विक्रेताओं तक सभी से कमीशन पहले ही फिक्स हाे जाता है. स्कूलों को जनवरी से ही ऑफर मिलने लगते हैं. जिन किताबों पर ज्यादा कमीशन मिलता है, उसी को कोर्स में शामिल किया जाता है. कक्षा एक से आठ तक के कोर्स में सीबीएसइ स्कूल हिंदी, गणित, विज्ञान के विषय के अलावा जनरल नॉलेज, मोरल साइंस, कंप्यूटर, अभ्यास पुस्तिका, ड्राइंग बुक आदि की किताबें शामिल कर निजी प्रकाशन और बुक सेलरों से लाखों रुपये का कमीशन का खेल चलता है. यही वजह है कि देवघर में स्कूली किताब का कारोबार लगभग 25 करोड़ पार है. कमीशन के इस खेल की भरपाई अभिभावकों को एक कोर्स के लिए अपनी जेब से दो हजार से लेकर छह हजार रुपये तक चुका कर करनी पड़ रही है.
दो से छह हजार तक हैं किताबों के दाम
निजी स्कूलों में कक्षा प्रेप के लिए दो हजार रुपये व 11वीं व 12वीं कक्षा के लिए छह हजार रुपये तक किताबों की खरीद करनी पड़ती है. स्कूल से किताबों की सूची मिलती है. हर स्कूल प्राय: खास किस दुकान में किताब मिलेगा, उसका नाम भी अंकित रहता है. काउंटर या किताब दुकानों पर क्लास वाइज पैकेट बना होता है. स्कूल और क्लास बताते ही किताबें दे दी जाती हैं. किताबों के साथ पेंसिल, कलर भी अभिभावकों को जबरदस्ती थमाया जाता है. जो अभिभावक कॉपी नहीं लेना चाहते हैं, उन्हें किताब नहीं दी जाती है.
ऐसे समझें किताबों के कारोबार का गणित
देवघर जिले में 20 स्कूल सीबीएसइ से मान्यता प्राप्त हैं, जबकि चार स्कूल आइसीएसइ से मान्यता प्राप्त हैं. लगभग 50 से अधिक प्ले स्कूल और 50 से अधिक गैर मान्यता प्राप्त निजी स्कूल संचालित हैं. अगर सभी स्कूलों को जोड़ा जाये तो देवघर जिले में करीब 100 से अधिक निजी स्कूल हैं. सीबीएसइ व आइसीएसइ के कुल 24 स्कूलों में कम से कम 12 स्कूलों में तकरीबन एक से दो हजार छात्र अध्ययनरत हैं. जबकि शेष 12 स्कूलों में पांच सौ तक छात्र हैं. वहीं निजी स्कूल व प्ले-स्कूलों में कम से कम औसत 200 छात्र पढ़ाई करते हैं. जिले में कुल मिला कर 56 हजार से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं. एक स्कूल में किताब-कॉपी आदि के लिए औसतन दो से तीन हजार रुपये एक छात्र पर खर्च करना पड़ रहा है. वहीं 10, 11, 12 क्लास की किताबों के लिए तो छह से आठ हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. सीबीएसइ व आइसीएसइ से मान्यता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाले तकरीबन 36 हजार छात्रों की किताब-कॉपी की खरीद से 15 करोड़ अधिक और शेष स्कूलों के छात्रों की किताब-कॉपी की खरीद से आठ करोड़ से अधिक का कारोबार होता है.
ऐसे चलता है कमीशन का खेल
सीबीएसइ स्कूलों में नये सत्र की शुरुआत अप्रैल से होती है, लेकिन निजी प्रकाशकों के डीलर स्कूलों में जनवरी-फरवरी से ही चक्कर लगाने लगते हैं. स्कूल और निजी प्रकाशकों के डीलर आपस में बैठ कर ये तय कर लेते हैं कि किस कोर्स में कौन-कौन से प्रकाशकों की कितनी किताबें लगायी जाये. निजी प्रकाशकों की किताबें कोर्स में चलाने के एवज में स्कूलों को करीब 30 प्रतिशत तक का कमीशन मिलता है.
डबल मुनाफा कमाते हैं स्कूल
किताब बिक्री के इस खेल में स्कूल प्रबंधन डबल मुनाफा कमाता है. निजी प्रकाशक अपनी किताब लगाने के एवज में स्कूल प्रबंधन को 20 से 30 प्रतिशत तक कमीशन देते हैं, जबकि बुक सेलर भी स्कूलों को विद्यार्थियों के अनुपात के अनुसार कमीशन तय करते हैं. बुक सेलर इसलिए कमीशन देते हैं कि स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को उनकी चुनिंदा दुकानों में किताब खरीदने के लिए भेजें.
