नैयाडीह में बस रही विस्थापितों की स्मार्ट कॉलोनी

Updated at : 04 Sep 2018 4:49 AM (IST)
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नैयाडीह में बस रही विस्थापितों की स्मार्ट कॉलोनी

देवघर : देवघर हवाई अड्डा के 508 विस्थापितों के लिए नैयाडीह में पुनर्वासन तेजी से किया जा रहा है. नैयाडीह में विस्थापितों को उपलब्ध करायी गयी मूलभूत सुविधाओं में बिजली, सड़क, नाला निर्माण, पथ आदि का निर्माण कराया जा रहा है. खेलकूद के लिए बड़ा मैदान है. गुलाब व अन्य फूलों की खेती के लिए […]

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देवघर : देवघर हवाई अड्डा के 508 विस्थापितों के लिए नैयाडीह में पुनर्वासन तेजी से किया जा रहा है. नैयाडीह में विस्थापितों को उपलब्ध करायी गयी मूलभूत सुविधाओं में बिजली, सड़क, नाला निर्माण, पथ आदि का निर्माण कराया जा रहा है. खेलकूद के लिए बड़ा मैदान है. गुलाब व अन्य फूलों की खेती के लिए करीब दो एकड़ पर बागवानी की जा रही है.

यह किसी स्मार्ट कॉलोनी से कम नहीं है. वर्तमान में नैयाडीह में अपने श्रमदान से 40 परिवार घर बना रहे हैं. वहीं करीब 30 परिवार अर्द्धनिर्मित घरों में रहने भी लगे हैं. हालांकि इस कॉलोनी में अब भी कई कमियां हैं. नैयाडीह गांव में प्रवेश करने वाली सड़क पूरी तरह से कीचड़मय है. नतीजा हल्की बारिश में भी लोगों को आवागमन मुश्किल हो जाता है. नैयाडीह गांव में विद्यालय नहीं है. नतीजा मंझियाना गांव छोड़ने के बाद से विस्थापित परिवार का कोई बच्चा अबतक स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है.

दो एकड़ में लगायी जा रही फूलों की बगिया
विस्थापित परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रशासन की ओर से फूलों की खेती के लिए दो एकड़ में गुलाब की बगिया बनायी गयी है. हालांकि विस्थापित परिवारों को अबतक इससे रोजगार नहीं मिल रहा है. करीब एक माह पहले ही गांव के दो दर्जन से ज्यादा महिला-पुरुषों को एसबीआइ आरसेटी द्वारा विशेष प्रशिक्षण दिया गया. लेकिन, रोजगार नहीं मिलने के कारण लोगों के चेहरे पर मायूसी छायी हुई है.
30 से ज्यादा बच्चे आठ महीनों से नहीं गये स्कूल
मंझियाना गांव छोड़ने के बाद विस्थापित परिवार के 30 से ज्यादा बच्चों ने पिछले आठ महीनों से सरकारी व प्राइवेट स्कूलों का मुंह तक नहीं देखा है. पूरा दिन घरों में खेलने व खाने में बीता रहे हैं. यहां के बच्चे राजा कुमार, सूरज, रुपेश कुमार, साेनू कुमार, संजना कुमारी, चंदा कुमारी, प्रीति कुमारी, पूजा कुमारी, काजल कुमारी आदि ने कहा कि नजदीक में स्कूल नहीं होने के कारण पढ़ाई करने नहीं जाते हैं. घर पर ही रह कर थोड़ी बहुत पढ़ाई कर लेते हैं. ऐसे में बच्चों के भविष्य की चिंता माता-पिता को सता रही है.
स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जाना पड़ता है देवघर
नैयाडीह व आसपास में कोई अस्पताल नहीं है. गांव के लोगों की तबीयत खराब होने व ज्यादा बिगड़ने पर इलाज के लिए देवघर जाना पड़ता है. नैयाडीह गांव से देवघर की दूरी पांच किलोमीटर से ज्यादा है. विस्थापितों ने कहा कि नैयाडीह में बसाने के पहले वादा किया गया था स्कूल, अस्पताल व सड़क दिया जायेगा, लेकिन जरूरी सुविधाओं से वंचित हैं.
दिहाड़ी में काम करने के लिए आना पड़ता है देवघर
विस्थापित परिवारों का भरन पोषण दिहाड़ी मजदूरी पर ही चलता है. दिहाड़ी पर काम करने वाले विस्थापित लोगों ने सोचा था कि नयी कॉलोनी बसाने में हमलोगों से काम लिया जायेगा. गांव में ही दिहाड़ी पर काम करने का मौका मिलेगा. लेकिन, विस्थापित परिवार को यह अवसर नहीं मिला. आज भी यहां के विस्थापित परिवार को दिहाड़ी पर काम करने के लिए देवघर पर आश्रित रहना पड़ रहा है.
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