कभी लोगों के अन्नदाता थे आज खुद दाने-दाने को माेहताज

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l जिंदगी ने मारी पलटी, पहुंचे वृद्धाश्रम देवघर : क्या किसी की किस्मत इतनी भी दगा दे सकती है! चांदडीह के वृद्धाश्रम में रह रहे एक बुजुर्ग दंपती अतीत के ऐसे दिनों का दर्द दिल में समाये हुए हैं, जिसे सुन कर आप भी कहेंगे कि ऐसा किसी के साथ न हो. हम बात कर […]

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l जिंदगी ने मारी पलटी, पहुंचे वृद्धाश्रम

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देवघर : क्या किसी की किस्मत इतनी भी दगा दे सकती है! चांदडीह के वृद्धाश्रम में रह रहे एक बुजुर्ग दंपती अतीत के ऐसे दिनों का दर्द दिल में समाये हुए हैं, जिसे सुन कर आप भी कहेंगे कि ऐसा किसी के साथ न हो. हम बात कर रहे हैं चांदडीह के वृद्धाश्रम में रह रहे खोखा बाबू की. 80 के दशक में देवघर के जाने-माने उद्योगपतियों में एक शंख कुमार चौधरी उर्फ खोखा बाबू एक राइस मिल के मालिक थे. व्यवसाय देवघर से कोलकाता तक फैला था.
शहीद आश्रम रोड में आलीशान मकान था. उनके मिल में सैकड़ों लोगों को रोजगार मिल रहा था. आज किस्मत ने उन्हें वृद्धाश्रम पहुंचा दिया. कभी लोगों के अन्नदाता थे, आज वे खुद दाने-दाने को मोहताज हैं. वृद्धाश्रम में पत्नी के साथ रह रहे खोखा बाबू को आज अपना घर भी नसीब नहीं है. आज वे ग्रामीण बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर किसी तरह जिंदगी गुजार रहे हैं. पुराने दिनों को याद करते हुए खोखा बाबू की आंखें आज भी डबडबा जाती हैं.
कभी लोगों के अन्नदाता…
कोलकाता दक्षिणेश्वर निवासी शंख कुमार चौधरी उर्फ खोखा बाबू के पिता चारू कृष्ण चौधरी ने देवघर में राइस मिल की आधारशिला रखी थी. उनकी खूब चलती थी. पहनावे अौर मिजाज के कारण वे शहर में उनकी अलग छवि थी. खोखा बाबू ने वर्ष 1959 में कोलकाता के बेलूर स्थित रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ से इंटरमीडिएट तथा 1961 में कोलकाता के स्कॉटिश चर्च से स्नातक की पढ़ाई की थी. कोलकाता में दो-एक जगह नौकरी भी की. मगर इस बीच 1963 में पिता की तबीयत बिगड़ गयी अौर उन्हें हर्ट में कैंसर होने का पता चला. इलाज के दौरान कोलकाता के एक बड़े चिकित्सक ने उन्हें कहा था-कैंसर हैस नो अंशर… उसके दो माह बाद पिता की मृत्यु हो गयी.
आठ वर्षों तक बिहार राइस मिल मालिक व एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे खोखा बाबू
खोखा बाबू ने बताया कि पिता की मौत के बाद न चाहते हुए भी उन्हें देवघर आना पड़ा. जहां राइस मिल संचालन की जिम्मेवारी उनके कंधों पर आ गयी. इस क्रम में सन 1975-83 के दौरान वे बिहार राइस मिल मालिक एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे. उस समय खोखा बाबू की अंगुलियों में हीरे की अंगूठी, गले में सोने की मोटी चेन, सिल्क का धोती-कुर्ता व हाथों में विदेशी सिगरेट के साथ आंखों में ब्लैक चश्मा उनकी पहचान होती थी. सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. डेढ़ दशक तक व्यवसाय में बुलंदी पर पहुंच गये.
एक गलत फैसले ने बदल दी जिंदगी
वर्ष 1983 में पूरा बिहार सुखाड़ की चपेट में आ गया. सरकार ने सभी तरह के राइस मिल को बंद करने का फरमान जारी कर दिया. शहर के दूसरे अन्य राइस मिलों की तरह खोखा बाबू की मिल भी बंद हो गयी. उसी बीच उनकी मुलाकात शहर के एक चर्चित शख्सीयत से हुई. बातों-बातों में उनसे सरकार के निर्देश व मिल बंद होने की स्थिति में मिल के कर्मचारियों की स्थिति को बयां की. इसके बाद उस व्यक्ति ने सरकार के स्तर से समस्या को सुलझा लेने का दिलासा देते हुए मिल चालू करने की बात कही.
उनके झांसे में आकर खोखा बाबू ने राइस मिल चालू कर दिया. यही फैसला उनके लिए गलत साबित हुआ. रोक के बाद भी राइस मिल संचालित करने की शिकायत जिला प्रशासन के पास पहुंची. नतीजा जिले के आलाधिकारी ने जांच शुरू कर दी. इसके बाद मिल का लाइसेंस रद्द कर दिया गया. वे किसी तरह जेल जाने से बचे. उसके बाद संकट का दौर शुरू हो गया. मिल के कर्मचारी हो-हल्ला मचाने लगे. धीरे-धीरे उनकी परेशानी बढ़ने लगी.
रिश्तेदारों ने भी दिया दगा
इस परिस्थिति से उबरने के लिए वे सपरिवार कोलकाता चले गये. वहां अपने रिश्तेदारों को मदद पहुंचाने के इरादे से 15-20 लाख की लागत से व्यवसाय शुरू किया. एक-दो वर्षों के बाद रिश्तेदारों ने भी दगा दे दी और व्यवसायी में लगी पूंजी डूब गयी. एक बार फिर वे सपरिवार देवघर के बिलासी मुहल्ले में पत्नी सुदेशना चौधरी व पुत्र इंद्रनील के साथ रहने लगे. 10-15 वर्षों तक वहां रहे. उसी बीच जीवन-यापन करने के लिए 10-12 बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने लगे. मगर उससे भी गुजारा नहीं हो रहा था. किराये के पैसे कम पड़ने लगे. अंत में उन्होंने चांदडीह स्थिति वृद्धाश्रम में शरण लेने को बाध्य हुए. आज वे दो बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर रहे हैं.
किताबों में कट रही जिंदगी
वृद्धाश्रम में जीवन काटने के लिए खोखा बाबू किताबों का सहारा ले रहे हैं. उनके पास शिव पुराण, हनुमंत रहस्य, चाणक्य नीति आदि पुस्तकें हैं. वे कहते हैं कि भगवान पर अब भरोसा नहीं रहा. अगर पहले चाणक्य नीति पढ़ा होता, तो जिंदगी में कभी धोखा नहीं खाते.
वृद्धाश्रम में खोखा बाबू
80 के दशक में थे देवघर के जाने-माने उद्योगपति
शहीद आश्रम रोड में थी राइस मिल
जिस पर विश्वास किया, उसी ने दिया दगा
सदमे को बर्दाश्त नहीं कर सका इकलौता पुत्र
खोखा बाबू के सामने रोज नहीं परेशानी सामने आ रही थी. इकलौते पुत्र इंद्रनील चौधरी सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गये. उनका कंधा टूट गया. काफी इलाज कराया गया, मगर समस्या कम नहीं हुई. उसका मानसिक संतुलन भी बिगड़ गया. बाध्य होकर शहीद आश्रम रोड स्थित 40 कट्ठा की आवासीय जमीन को टुकड़ों में बेचने को बाध्य हुए.
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