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संकट में गुरु-शिष्य परंपरा, भरोसा कायम रखना जरूरी

आज शैक्षणिक संस्थानों में माहौल बदला है. पढ़ाई का तरीका बदलने के साथ-साथ प्रतिस्पर्द्धा भी बढ़ी है. ऐसे में गुरु-शिष्य परंपरा में भी कमी आयी है. बच्चों में तनाव और आक्रामकता बढ़ी है, तो दूसरी ओर शिक्षकों की भूमिका में भी परिवर्तन दिखने लगे हैं. कारण क्या हैं कि आज शिक्षक व छात्र दोनों तनावग्रस्त […]

आज शैक्षणिक संस्थानों में माहौल बदला है. पढ़ाई का तरीका बदलने के साथ-साथ प्रतिस्पर्द्धा भी बढ़ी है. ऐसे में गुरु-शिष्य परंपरा में भी कमी आयी है. बच्चों में तनाव और आक्रामकता बढ़ी है, तो दूसरी ओर शिक्षकों की भूमिका में भी परिवर्तन दिखने लगे हैं. कारण क्या हैं कि आज शिक्षक व छात्र दोनों तनावग्रस्त हैं. क्या यह बदलाव का दौर है या फिर कहीं कोई कमी अभिभावक, शिक्षक, छात्र और समाज में आने लगी है, इन्हीं विषयों पर मंथन की कोशिश की है प्रभात खबर ने. प्रस्तुत है प्रभात खबर कार्यालय आये शिक्षकों के बीच हुई चर्चा की मुख्य बातें.
देवघर : शिक्षक दिवस की पूर्व संध्या पर प्रभात खबर कार्यालय में प्रभात परिचर्चा का आयोजन किया गया. ‘गुरु-शिष्य परंपरा में आ रही गिरावट’ विषय पर परिचर्चा में शहर के विभिन्न कॉलेजों एवं स्कूलों के शिक्षकों ने उपस्थित होकर अपनी राय दी. शिक्षकों ने भी स्वीकार किया कि बदलते परिवेश में गुरु-शिष्य परंपरा का ह्रास हुआ है. बाद में अध्यात्म और कला क्षेत्र में गुरु-शिष्य परंपरा की नींव मजबूत हुई. वर्तमान में भी कमोबेश दोनों क्षेत्रों में इसकी मर्यादा बची हुई है. मगर आज के शिक्षक-विद्यार्थी के इस दौर में गुरु-शिष्य की परंपरा को गहरा धक्का लगा है. सरकार भी शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को देखे बगैर अपने हिसाब से नीति बना देती है. इसका प्रभाव शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के रिश्तों पर पड़ता है.
आमंत्रित अतिथियों ने कहा
शिक्षकों को अपने सम्मान की रक्षा के लिए आत्ममंथन करने की जरूरत है. विद्यार्थियों को शिक्षकों के प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए. एक बार जर्मनी के प्रेसिडेंट के पास कुछ डॉक्टर व इंजीनियर, शिक्षकों के बराबर वेतन की मांग लेकर गये. प्रेसिडेंट ने कहा कि शिक्षक आपको बनाते हैं. आपका निर्माण करते हैं. उनके वेतन के बराबर आपका वेतन कैसे हो सकता है. यह सही मायने में शिक्षकों के प्रति सम्मान है.
– डॉ फणिभूषण यादव, प्राचार्य,एएस कॉलेज, देवघर
बीएड की डिग्री हासिल करने के बाद भी विद्यार्थी शिक्षक नहीं बन पाते हैं. आज विद्यार्थियों में जाॅब के प्रति असुरक्षा की भावना पैदा हो गयी है. जॉब पॉलिसी व भर्ती बड़ी समस्या बनी हुई है. यही वजह है कि अयोग्य लोग भी शिक्षक बन जाते हैं. इसका प्रतिकूल प्रभाव शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के संबंध पर पड़ता है.
– डॉ एमके झा, सेवानिवृत्त प्राचार्य, गवर्नमेंट बीएड कॉलेज, देवघर.
आज न तो शिक्षकों में गुरु की तरह त्याग और साधना की प्रवृत्ति पायी जाती है, न ही शिष्यों में समर्पण और सम्मान का भाव देखा जाता है. इस स्थिति के लिए न सिर्फ शिक्षक व विद्यार्थी बल्कि माता-पिता, सरकारी व्यवस्था व सारा समाज दोषी है.
– राम सेवक गुंजन, प्राचार्य, रेड रोज प्लस टू स्कूल, देवघर
सरकार अपने हिसाब से नीति बनाती है. हमलोगों को आत्म विश्लेषण करने की जरूरत है. सुधार के लिए लगातार प्रयास करना चाहिए, क्योंकि कोई भी विद्यार्थी खराब नहीं होता है. अभिभावकों को भी शिक्षकों के कार्यों को सराहना चाहिए.
– आरसी शर्मा, प्राचार्य, गीता देवी डीएवी पब्लिक स्कूल, देवघर
सरकार का निर्देश है कि बच्चों की पिटाई नहीं करनी है. इसके बावजूद शिक्षक पर आरोप लगाकर उच्च अधिकारियों सेे शिकायत कर दी जाती है. इससे शिक्षकों में भय व्याप्त रहता है. अभिभावकों को हम शिक्षकों पर विश्वास करना चाहिए. क्योकि शिक्षक ही बच्चों का चरित्र व भविष्य निर्माण करते हैं.
– अनिल कुमार, सहायक शिक्षक, आरएल सर्राफ हाइस्कूल, देवघर
मिशन व प्रोफेशन दो अलग-अलग चीजे हैं. पहले गुरु का मिशन शिक्षा दान होता था. लेकिन, बदलते परिवेश में शिक्षा दान प्रोफेशन बन गया है. इसमें बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों का पैसा लगा हुआ है. पैसा निवेश होगा तो वो मुनाफा खोजेगा. सामाजिक सोच में गिरावट आयी है. यही वजह है कि गुरु-शिष्य परंपरा में गिरावट आयी है.
– आेंकार सुधांशु, सहायक शिक्षक, उत्क्रमित उच्च विद्यालय
झारखंडी गुरु-शिष्य की परंपरा में ह्रास नहीं हुआ है. दो-तीन दशक पहले की स्थिति को देखें तो शिक्षकों ने अपनी गरिमा खुद खोयी है. उसे बदलने की जवाबदेही भी हमलोगों की है. जब तक दक्ष लोग इस पेशे में नहीं आयेंगे. तब तक इस क्षेत्र में गिरावट रहेगी.
– एसडी मिश्रा, निदेशक, मैत्रेयस्कूल, देवघर
पहले सरकारी विद्यालय हुआ करता था. आज गलियों में प्राइवेट स्कूल खुल गये हैं. आइएएस व सीडीए तक की तैयारी के लिए छोटे-छोटे कोचिंग सेंटर खुल गये हैं. अभिभावक उस संस्थान के बारे में कोई जानकारी लिये बगैर वहां बच्चों का दाखिला करा देते हैं. नतीजा बच्चा भटक जाता है. इसके लिए अभिभावक दोषी हैं.
– अमरेश कुमार झा, फैकल्टी,संकल्प, देवघर
शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के बीच रिश्ता प्रगाढ़ होना चाहिए, लेकिन आज हालात बदला हुआ है. माता-पिता घर पर बच्चों का समुचित ख्याल नहीं रखते हैं. माता अपने बच्चों का सभी अवगुण भी छिपा लेते हैं. ऐसे में शिक्षकों पर ही सभी प्रकार का दोष मढ़ देना गलत है. सभी का समान सहयोग मिले तो शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के बीच बेहतर रिश्ता हो सकता है.
– अशोक कुमार सिंह, ट्रांसपोर्टर, जीडी डीएवी पब्लिक स्कूल
Prabhat Khabar Digital Desk
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यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

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