Bokaro News : दिशोम गुरु के नेतृत्व में बेरमो में चलाये गये थे कई आंदोलन

Published by : JANAK SINGH CHOUDHARY Updated At : 04 Aug 2025 11:55 PM

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Bokaro News : वर्ष 1974 से 1980 के बीच आंदोलनों के सिलसिले बिनोद बिहारी महतो के साथ अक्सर शिबू सोरेन बेरमो, गोमिया, नावाडीह, जरीडीह, पेटरवार, कसमार के इलाके में आया करते थे.

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बेरमो/महुआटांड़, वर्ष 1974 से 1980 के बीच आंदोलनों के सिलसिले बिनोद बिहारी महतो के साथ अक्सर शिबू सोरेन बेरमो, गोमिया, नावाडीह, जरीडीह, पेटरवार, कसमार के इलाके में आया करते थे. नावाडीह प्रखंड के उग्रवाद प्रभावित ऊपरघाट क्षेत्र के गांवों में महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन चलाया था. धनकटनी आंदोलन भी चला था. आंदोलन के क्रम में ही एक महाजन की हत्या हुई थी. इसमें शिबू सोरेन समेत कई लोगों को आरोपी बनाया गया था. बोकारो जिला के अराजू, बेलडीह भस्की में भी उनके नेतृत्व में धनकटनी आंदोलन चला था. ललपनिया क्षेत्र में 1970-80 के बीच शिबू सोरेन के नेतृत्व में महाजनी प्रथा के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन हुआ करता था. इसकी बागडोर उनके अनुज लालू सोरेन संभालते थे. झामुमो के पूर्व नेता धनीराम मांझी ने बताया कि फुटकाडीह बाजारटांड़ के समीप जारागढ़ा के बीच आंदोलन हुआ था. 13 नवंबर 1970 को शिबू सोरेन सहित 56 लोगों को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेज दिया गया था. इस आंदोलन में पुलिस की गोली से पेरो मंझियाइन की मौत हुई थी. इस आंदोलन को लेकर तैयारी के दौरान उनकी गिरफ्तारी 11 नवंबर को उनके दनिया स्थित घर से हो गयी थी. लालू सोरेन पुलिस को चकमा देकर फरार हो गये थे. झारखंड आंदोलन के समय भी इस क्षेत्र में शिबू सोरेन आते थे. जब कोरोना काल में शिबू सोरेन कोरोना संक्रमित हुए थे, तो गांव में उनकी कुशलता के लिए जाहेर स्थान में मन्नतें मांगी गयी थीं. कुछ दिन पूर्व भी दोरबार चट्टानी स्थित पूनाय थान में गुरुजी के स्वस्थ होने की कामना को लेकर विशेष पूजा की गयी थी.

टीटीपीएस निर्माण काल में तीन महीने तक चला था आंदोलन

ललपनिया में टीटीपीएस निर्माण के शुरुआत काल में चार आदिवासी गांवों के विस्थापन की बात सामने आयी थी तो उनके हक की लड़ाई शिबू सोरेन ने शुरू की थी. वर्ष 1987-88 में स्थानीय बाबूचंद बास्के (प्रिय मित्र) व जनबल के साथ तीन महीने तक जबरदस्त आंदोलन चलाया था. जब प्लांट बनाने के लिए लोहा भी जोड़ना मुश्किल हो रहा था तो प्रबंधन व सरकार से बातचीत की पहल की और पांच विस्थापितों के नियोजन व मुआवजा प्रक्रिया शुरू की गयी. इसके बाद शिबू सोरेन यहां आते रहे और विस्थापितों की समस्याओं की समाधान कराने की दिशा में पहल करते रहे. शिबू सोरेन की पुरानी जीप में शामू मिस्त्री ने लगाया था डीजल इंजन : शिबू सोरेन की एक पुरानी जीप में फुसरो के चर्चित इंजन मिस्त्री शामू मिस्त्री ने नया डीजल इंजन सेट लगाया था. इसी जीप से शिबू सोरेन अक्सर बेरमो आया करते थे.

विधायक बनने के बाद जगरनाथ महतो ने गुरुजी को सिक्कों से तौला था

वर्ष 2004 के विधानसभा चुनाव के छह माह पूर्व जगरनाथ महतो जब शिबू सोरेन के संपर्क में आये, तब वह जामताड़ा जेल में बंद थे. शिबू सोरेन ने तभी उन्हें झामुमो में शामिल करते हुए डुमरी विधानसभा सीट से टिकट देने का आश्वासन दे दिया. उस समय जगरनाथ महतो समता पार्टी में थे और वर्ष 2000 का विधानसभा चुनाव हार गये थे. शिबू सोरेन से आश्वासन मिलने के बाद जगरनाथ महतो ने डुमरी में सभा का आयोजन किया और शिबू सोरेन व उनके बड़े पुत्र दुर्गा सोरेन की उपस्थिति में झामुमो में शामिल हो गये. पहली बार विधायक बनने के बाद जगरनाथ महतो ने 23 सितंबर 2005 को भंडारीदह में आयोजित बिनोद बिहारी महतो जयंती समारोह में शिबू सोरेन को तराजू में बैठा कर सिक्कों से तौला था. इसके बाद से कभी भी डुमरी विस सीट से जगरनाथ महतो पराजित नहीं हुए.

ट्रक से जैनामोड़ आये थे गुरुजी

बेरमो के विस्थापित नेता व झामुमो उलगुलान के महासचिव बेनीलाल महतो ने बताया कि शिबू सोरेन वर्ष 1993 की आर्थिक नाकेबंदी के दौरान एक बार रांची से ट्रक से जैनामोड़ पहुंचे. इसके बाद मोटरसाइकिल से रात तीन बजे तक कई गांवों में जाकर बैठक की और आर्थिक नाकेबंदी को सफल बनाने का आह्वान किया. रात में ही सरदार के वेश में मोटरसाइकिल चला कर जामताड़ा गये. मोटरसाइकिल में उनके पीछे उनका बॉडीगार्ड बैठा था. दूसरी मोटरसाइकिल से मैं भी उनके साथ गया था. जामताड़ा में कई जगह बैठक करने के बाद मधुपुर स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली चले गये. केंद्रीय कोयला मंत्री बनने के बाद बेरमो क्षेत्र में कोयला मजदूरों की समस्याओं को लेकर शिबू सोरेन गंभीर रहे.

काशीनाथ केवट को धमकी देनेवालों को दी थी चेतावनी

झामुमो के केंद्रीय सदस्य व विस्थापित नेता काशीनाथ केवट ने बताया कि शिबू सोरेन अक्सर जैनामोड़ पुरानी जीप और बाइक से आते थे. करहरिया गांव के राजबली मियां से उनकी गहरी दोस्ती थी. जैनामोड़ आने पर राजबली मियां को जरूर बुलाते और दोनों के बीच घंटों हंसी मजाक चलता था. बेरमो में वर्ष 1984 में जब विस्थापित आंदोलन शुरू हुआ तो इसके पहले चलकरी में शिबू सोरेन की एक सभा हुई थी. इसमें उन्होंने कहा था कि अगर विस्थापित नेता काशीनाथ केवट को कुछ हुआ तो बेरमो तीन दिन तक चलेगा. मालूम हो कि विस्थापित आंदोलन के समय बेरमो के कुछ नामी गिरामी लोगों ने श्री केवट को मार कर फेंकने की धमकी दी थी.

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